जनवरी-2018

देशपागल     Posted: October 1, 2016

बेटे ने अपने व्यापार के लिए चालीस लाख रुपयों के बैंक लोन का आवेदन किया था। जमानत उसके पिता रिटायर्ड मेजर विक्रम सिंह ने दी थी। उन्होंने इसके लिए अपने मकान–मिलकियत के मूल कागजात भी बैंक को सौंप दिए थे। फिर भी बैंक नियमों के अंतर्गत उनके मकान की बाजार  कीमत का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक था। मेजर ने यह बात सुनी तो उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा।

‘‘सर, क्या आप ही मेजर विक्रम सिंह जी है ? मूल्यांकन अधिकारी ने रोबदार मूँछों वाले निक्कर–टी-शर्ट पहने बगीचे में खुरपी कर रहे प्रौढ़ से पूछा।’’

‘‘यस, व्हाट केन आई डू फोर यू, यंग मैन’’ मेजर ने अपने काम में मशगूल रहते हुए पूछा।

‘‘सर मैं आपके इस मकान का वेल्यूएशन करने आया हूँ।’’

मेजर ने उस पर एक नजर डाली और मन ही मन मुस्करा दिए। साथ ही वे मूल्यांकन अधिकारी की नीयत भी भाँप गए थे।

‘‘ठीक है, मकान का नाप–जोख बाद में कर लेना पहले इधर आओ।’’ मेजर उसे अपने बगीचे में उगे मधुयामिनी, हरसिंगार, रातरानी  बादाम, आँवला, जूही, रातरानी, मोगरा आदि के पेड़–पौधों की तरफ ले गया।

‘‘अहा! कितना सुन्दर !, क्या खुशबू है!’’ अधिकारी विभिन्न रंगों के गुलाब की क्यारी को देखते हुए बोला।

‘‘चलो यही से शुरू करते हैं। इस क्यारी में खिल रहे चार तरह के गुलाब सिर्फ़ हिल नहीं रहे है मिस्टर! आपको झुक कर सलाम कर रहे हैं। इनकी कीमत दस लाख समझिए… और हाँ,इस मधुयामिनी के यंग पेड़ को देखिए। सबसे ज्यादा महक इस पर खिले दर्जनों फूलों की ही है। यह बेशकीमती हैं। पन्द्रह लाख की तो खाली इसकी महक ही हैं….. एक मिनट एक मिनट…. इस हरसिंगार के नीचे बिछी नन्हे फूलों की यह चादर कम से कम पाँच लाख की तो होगी ही…..

अचंभित अधिकारी सम्मोहित- सा कभी मेजर को तो कभी पेड़–पौधों को देखता रहा।

‘‘इधर, इस बादाम के पेड़ की डालियों की ओर भी देखो यंग मैन! एक, दो, तीन, चार… चार कमेड़ी, पांच कबूतर बैठे हैं और इनके आस–पास कोई दस–बारह गौरेया फुदक रही हैं…. बोलो, इस दृश्य की क्या कीमत लगाओगे। तीन लाख तो होगी ही….. रुको, रुको, नाप जोख का सामान अभी मत निकालो। मकान की दीवार और इस छप्पर के नीचे लटक रहे यह बारह मिट्टी के घरौंदे देख रहे हो ? इनमें सात में गौरेया अपने छोटे बच्चों के साथ रहती हैं, तीन में कल ही अण्डे दिए हैं….. एक एक लाख का एक–एक घरौंदा है मिस्टर !’’

अब अधिकारी मेजर को विस्फारित नेत्रों से देखने लगा।

‘‘इधर आओ… एक ओर कोना दिखाता हूँ तुम्हें. इस नीम के पेड़ की डालों पर तीन बड़े छीकें लटक रहे देख रहे हो। एक में चिड़िया के लिए बाजरी, दूसरे में कबूतर–कमेड़ी के लिए ज्वार–गेहूँ और तीसरे में तोतों के लिए चने की दाल, मिर्ची, फल रखे हैं और हाँ…इनके पास ही इनके लिए पानी के कुण्डियाँ भी लटक रही हैं। …बोलो… क्या कहते हो दस लाख तो इसके भी लगाओगे ही।

अब मेजर ने पास ही पड़ी अपनी गन उठा ली, ‘‘उधर जंगल हैं न! कभी–कभी इसके इस्तेमाल की भी जरूरत पड़ जाती है।’’

मूल्यांकन अधिकारी गन देखकर घबरा गया। वह बगीचे से बाहर आया और अपनी मोटरसाइकिल के किक लगाने लगा।

‘‘मकान का नाप जोख नहीं करोगे ?’’ मेजर मुस्कराते हुए बोला।

‘‘सर नहीं… बस हो गया’’…..‘आज सुबह–सुबह किस पागल से पाला पड़ा,है’मन ही मन बड़बड़ाते हुए उसने मोटरसाइकिल की स्पीड बढ़ा ली।

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