अक्तुबर-2017

अध्ययन -कक्षसोचने को विवश करती लघुकथाएँ     Posted: February 1, 2017

हरी- भरी वादियाँ, दूर दूर तक फैला वितान,एक सुनहरी आभा में मिलते धरती गगन, और उस आभा में आलोकित हो क्षितिज को पकड़ने दौड़ते बालकों से हम। हरी भरी वादियों में दौड़ते हुए कहीं किसी पत्थर से ठोकर हो जाती है, किसी मृदु भूमि पर पाँव पड़ जाता है, धँसता चला जाता है, तो कहीं किसी और के खोदे गड्ढे में गिर पड़ते हैं, आँखों के आगे अँधेरा छा जाता है, मन उद्वेलित हो जाता है। जीवन के यही BHAWNA SAXENAउद्वेलित करने वाले पल लघुकथा के उस खास पल को जन्म देते हैं जो उसकी आत्मा होती है। जिसके बिना लिखी गई लघु कथा आत्माहीन होती है। उस एक पल को शिल्प के चमकते सुनहरे पिंजरे में कसना, शब्दों में उतारना ही लघुकथा को जन्म देता है। कई बार उस पल के हम से टकराने के बाद लघुकथा के कागज पर उतरने में बरसों लग जाते हैं किंतु  उस पूरे अंतराल में भीतर ही भीतर मनन मंथन चलता रहता है। आत्मा से प्रत्यक्ष शरीर बनने की यह प्रक्रिया या रचना प्रक्रिया लघुकथा में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।

आज बहुत सी लघु कथाएँ  लिखी जा रही हैं ;किंतु सभी शायद लघु कथा की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। किसी संवेदनशील विषय को लेकर उस पर कलम चलाना और प्रकाशित करा लेना किसी लघुकथाकार को स्थापित नहीं करता। एक सशक्त लघुकथा की अनिवार्यता है उसमें निहित आत्मा, सुस्पष्ट शिल्प  और इन सबसे ऊपर एक दायित्वबोध।

प्रतिष्ठित लघुथाकार सुकेश साहनी जी की लघुकथाएँ  इसी आत्मा  को स्पष्ट दायित्वबोध के साथ शिल्प कौशल से सुगठित देह प्रदान करती हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक से लघुकथा–लेखन में सक्रिय सुकेश साहनी जी की प्रत्येक रचना के साथ गहन चिंतन जुड़ा हुआ है, उनका सतत तर्कपूर्ण लेखन वास्तव में  लघुकथा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। आपने न केवल हिन्दी  लघुकथा साहित्य को समृद्ध किया है अपितु इन लघुकथाओं के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद से अन्य भाषा साहित्य को भी समृद्ध किया है।

साहनी जी ने अपने लेखन में जीवन के हर क्षेत्र को स्पर्श किया और लघुकथा की मर्यादा को एक नई ऊँचाई प्रदान की है। आपने अपनी रचनाओं के अद्भुत बिम्ब व भाषा शक्ति से बहुत सटीकता के साथ आज हो रहे सामाजिक मूल्यों के ह्रास के प्रति चिंता व्यक्त की है, भोले-भाले ग्रामीणों के जीवन का, शहरों में खोखले अहम् से  पीड़ित लोगों व निम्न मध्यवर्ग की बेचारगी, पीड़ा और निराशा का चित्रण किया है और साथ ही समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार किया है। आपकी लघुकथाएँ  कथ्य, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद के माध्यम से अपना निहित उद्देश्य प्राप्त करती हैं और ऐसे स्थान पर छोड़ देती है, जहाँ से पाठक के मंथन की यात्रा शुरू होती है।

साहनी जी की लघुकथाएँ  हल्के फुलके पठन के लिए नहीं हैं। संवेदनाओं का सैलाब लिए ये गहरा आघात करती हैं, पाठक को झकझोर कर रख देती हैं, सोचने को विवश करती हैं औऱ कई बार पाठक को समाज के बौनेपन का अहसास कराती हैं, ये पाठक के मन में यह विचार नहीं छोड़ती…… लेकिन हम कर क्या सकते हैं अपितु यह भाव जागृत करती हैं कि कुछ करना होगा, बदलाव जरूरी है। लगभग हर लघुकथा को पढ़ने के बाद संकलन को बंद करके वैचारिक मंथन का सामना करना पड़ता है, कई को पढ़कर अकस्मात् मुँह से निकलता है – उफ्फ!

इनमें बहुत सी लघुकथाएँ  ऐसी हैं भी हैं जिन्हें पढ़ना अच्छा नहीं लगता। एक सामान्य पाठक जिसे लघुकथा के मर्म व निहित प्रयोजन का ज्ञान नहीं ,वह निश्चित ही इनमें से कुछ लघुकथाओं को किनारे रख देगा ; क्योंकि यह समाज के उस वीभत्स रूप को सामने लाती हैं ,जो गल -सड़ रहा है, जिस पर समाज निगाह डालना ही नहीं चाहता या यों कहें कि उसमें उलझना नहीं चाहता । जो चीजें इंसान को प्रत्यक्ष प्रभावित नहीं करती वह उनसे दूरी बना कर रखना चाहता है चाहे उसके कारण दूसरों का कितना भी अहित हो रहा हो ; लेकिन यह सब एक सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को उद्वेलित करता है, वह उसके निराकरण के लिए प्रयासरत रहता है। साहनी जी ने इस निराकरण हेतु अपनी सशक्त लेखनी को अपना हथियार बनाया है। साहनी जी ने राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक तथा धार्मिक व समसा‍मयिक समस्त विषयों को अपने लेखन की परिधि में रखा है। समाज के मध्यवर्ग में  और बड़े प्रभावशाली ढंग से उनसे जुड़ी कुरीतियों को उकेरा और उनका समाधान प्रस्तुत किया है।

उनका संवेदनशील हृदय अपने आसपास घट रहे घटनाक्रम से प्रभावित होता है, वह समाज में व्याप्त रूढ़ियों की पीड़ा अनुभव करते हैं, उनके खोखलेपन से द्रवित होते हैं और गोश्त की गंध जैसी क्लासिक लघुकथा की रचना कर उस पर प्रहार करते हैं, और यह प्रहार भी उस दामाद के माध्यम से जिस पर पूरा परिवार न्योछावर हुआ करता है और एक पैर पर सेवा के लिए खड़ा रहता है। दामाद को होने वाला दायित्वबोध नैतिक मूल्यों का दायित्वबोध है, एक बेहतर समाज की ओर कदम लौटाने की सकारात्मक पुष्टि है।

आदमजाद में घिसी-पिटी मान्यताओं और स्त्री के प्रति पुरुष के प्रताड़नापूर्ण व्यवहार पर प्रहार किया गया है।  स्त्री अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्ष कर  रास्ता तय करते हुए चाहे कितना आगे आई हो, किंतु आज भी एक बड़ा हिस्सा सदियों से सामाजिक अन्याय का शिकार है। स्त्रियों को न जाने कितने रीति-रिवाजों, परम्पराओं पौराणिक आख्यानों की दुहाई देकर दोयम दर्जे का जीवन जीने पर विवश कर दिया जाता है। कुछ शहरों में भले ही जागरूकता आई हो और स्त्रियों के प्रति सोच बदली हो ; लेकिन तब भी समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो ऐसे दकियानूसी विचारों के साथ  हाँफ-हाँफकर  घिसटता हुआ जी रहा है और इसी तथ्य को आदमजाद में उजागर किया गया है।  मृत्युबोध, स्कूटर और लाफिंग क्लब में भी लेखक ने लघुकथाओं के द्वारा न सिर्फ समाज की बुराइयों की ओर ध्यानाकर्षित किया है अपितु ऐसे ढंग से किया है कि पाठक के मन में वितृष्णा उत्पन्न होती है।

लघुकथा मृत्युबोध में जड़ हो चुके रिश्तों की संवेदनहीनता को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। माँ के बीमार होने पर बड़े भाई द्वारा जल्दी बुला लिये जाने से अन्य भाई बहन खिन्न हैं और वहाँ पहुँ चने के कारण होने वाले नुकसान गिनाते बिनाते मां के प्राण निकलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अवचेतन अवस्था में पड़ी मां उनका सभी वार्तालाप सुन लेती हैं और आंखें खोलने पर सब बच्चों के चेहरों पर लिखी निराशा पढ़कर चुचाप आंसू बहा देती है। वृद्धावस्था की यह दयनीयता पाठक के मन पर गहरा विषाद छोड़ती है। वास्तव में यह बहुत से मध्यम वर्गीय परिवारों की वास्तविकता है कि आगे बढ़ चुकी पीढ़ी सफल मुकाम पर पहुँचकर अपने माता-पिता द्वारा उस हेतु किए गए परिश्रम और उनके द्वारा झेली गई कठिनाइयों को भूल जाती है। इस लघुकथा में साहनी जी ने खोखले व दिखावटी रिश्तों की संवेदनहीनता पर गहरा प्रहार किया है और बच्चों के स्वार्थ को रेखांकित किया है। लाफिंग क्लब में भी वृद्धावस्था में स्वार्थी व संवेदनहीन बच्चों से मिली पीड़ा को बारीकी से दर्शाया गया है।

बिरादरी में समाज के तथाकथित संपन्न लोगों के संपन्नता आधारित खोखले संबंधों को दर्शाया है, जो हमारे समाज की सच्चाई है।

आधी दुनिया में पुरुष की रुग्ण मानसिकता का चित्रण किया गया है। यह लघुकथा एक स्त्री द्वारा विवाह पूर्व से लेकर जीवन भर झेली जाने वाली मानसिक प्रताड़ना को कम से कम शब्दों में उकेरती है। एक छोटी समाज की गिरी हुई सोच और घिसी-पिटी मान्यताओं  के साथ- साथ आवश्यकतानुसार बदलते चेहरे का भी चित्रण करती है। इस कूड़े- कबाड़े की जगह कार ही दे देते और सस्ते में निपटा दिया बुढ़उ ने में दहेज लोलुपता दर्शाकर दहेज की विभीषिका पर प्रहार किया है ; तो तुम्हारे खानदान में किसी ने बेटा जना है ,जो तुम जनोगी में पुत्र लालसा है एक महिला के जीवन भर के समर्पण की परिणति- निकल जा मेरे घर से  में, अंतिम प्रहार है जो पाठक को एक ऐसे क्षण पर लाकर छोड़ता है जहाँ उसकी चेतना सुन्न हो जाती है।

हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं हमारे बच्चे, जिन पर आने वाला कल आश्रित है किंतु कई बार सुविधा और संसाधन जुटाने की कोशिश में लगे माता-पिता बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते। वे दिन-भर दफ्तर में या अपने आय उत्पन्न करने वाले कार्यों में व्यस्त रहते हैं। दूसरी ओर बच्चे पहले स्कूल फिर क्रेच या ट्यूशन और वह भी दिन में कई कई ट्यूशन या स्पर्धा के लिए ऐसी कोई अन्य कक्षाओं में व्यस्त रहते हैं। माता-पिता सुविधा-संसाधनों को पाने के लिए उतावलापन दिखाते हैं और बालक से चाहते हैं वह बस पढ़ता रहे ,ताकि वे अपने अधूरे सपनों को पूरा कर सकें। साहनी जी ने इस समस्या को पहचाना है और कई लघुकथाएँ  ऐसी लिखी हैं ,जो बालकों की इन्हीं समस्याओं को उजागर करती हैं। दौड़ती -भागती जिंदगी के माता-पिता पर हावी होने से उनके पास बच्चों के लिए समय की कमी को ग्रहण में बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया है। जहाँ एक ओर समय के अभाव में बच्चों की अनदेखी होती है ,वहीं  उन्हें एक खूबसूरत वस्तु की तरह प्रदर्शित किया जाता है।जिस परिवेश से उसको वस्तविक ज्ञान मिलता है , ग्रहण में उसी से वंचित करके उसे शिक्षा की अव्यावहारिक  रटन्त प्रणाली से जोड़ दिया जाता है। मैं कैसे पढ़ूँ में बाल हृदय की इन समस्याओं का मार्मिक व हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। कक्षा में पढ़ाना जितना महत्त्वपूर्ण है उस  अधिक महत्त्वपूर्ण  है बच्चे की मानसिकता को  पहचानना और समझना  तथा तदनुरूप शिक्षण करना । बच्चे के मन पर घर में शिशु की आकस्मिक मृत्यु इस कदर हावी है कि वह सशरीर तो कक्षा में है, पर उसका मन दु:खद घटना से बाहर नहीं आ सका है। शिक्षक बच्चों के मन को पढ़ना सीखें तो तभी सफल शिक्षण कर सकेंगे।ये लघुकथाएँ हमारी आँखें खोलती हैं और बालकों के प्रति अपने व्यवहार पर गौर करने को बाध्य करती हैं। त्रिभुज के कोण, इमिटेशन, ग्रहण लघुकथाएँ  इसी द्वंद्व को आगे ले जाती हैं। बैल में बच्चे पर अपनी अपेक्षाएँ  थोपने और उन्हें अपनी ट्रॉफी की तरह प्रदर्शित करने की मानसिकता दर्शाई गई है। बच्चों के अनुशासन के नाम पर उन्हें प्रताड़ना की हद तक दंडित करना कितना सही है? आज हालत यह हो गई है कि बच्चों को भयावह मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा है। आधुनिकता के नाम पर जिस शहरी जीवनशैली में हम जी रहे हैं ,वहाँ बच्चों का बचपन सबसे ज्यादा खतरे में है। ये कथाएँ इसी के प्रति आगाह करती हैं। आज अभिभावकों से लेकर शिक्षकों तक को बच्चों के प्रति अपने व्यवहार को सुधारने की आवश्यकता है, किंतु इसा अर्थ यह कदापि नहीं कि उन्हें खुली छूट दी जाए अथवा उच्छृंखल होने दिया जाए। शिक्षा के नाम पर बर्बरता की सीमा तक पहुँचा जाए यह नितांत निन्दनीय  और अस्वीकार्य  है। समाज को उसकी आने वाली पीढ़ी के प्रति संतुलित व्यवहार अपनाना होगा यही साहनी जी का मर्म है।

भौतिक जीवन में धन कमाने और आगे बढ़ने की होड़ में व्यक्ति अकसर सही गलत का भेद भूल जाता है, आगे बढ़ने के लिए वह जी तोड़ श्रम के साथ साथ कई बार गलत राह अख्तियार कर लेता है, किंतु एक समय ऐसा आता है जब कोई घटना, कोई बात उसे आत्ममंथन व आत्मविश्लेषण की राह पर ला खड़ा करती है। वापसी  चेतना-जागृति उम्मीद की यही नई रोशनी लाती हैं, कि अभी भी वापसी संभव है। वापसी उस अभियंता की कथा है जिसे याद आया कि कैसे उन दिनों वह ईमानदारी से काम करने के लिए अपने उच्चाधिकारियों से भिड़ जाया करता था। निर्माण कार्यों में जरा भी घपला नहीं होने देता था। वही बीस वर्ष बाद अपने ही बनाए पुल की मरम्मत और निरीक्षण का कार्य देखने पहुँचता है। इन बीस वर्षों में अपने भीतर हुए परिवर्तनों पर वह उदास  होता है किंतु अपनी तरह बनने का सपना देखने वाले बालक की अभिशंसा उसे झकझोर देती है और उसमें अपने पुत्र की छवि देखते हुए वह आत्मग्लानि से भर आत्मनिरीक्षण पर पहुँच जाता है। अभियंता की प्रतिक्रिया – उसका स्वयं से नफरत होना, मुट्ठियां भिंच जाना और लंबे लंबे डग भरकर मरम्मत स्थल पर पहुँचना, में शब्दों के माध्यम से एक सशक्त चित्र उभरकर सामने आ जाता है, और प्रतीत होता है कि हम एक लघुकथा नहीं पढ़ रहें हैं अपितु सिनेमा देख रहे हैं। “काम स्पेसिफिकेशन के हिसाब से होगा”  कहना काफी नहीं है, साहनी जी उसमें चिल्लाकर कहता है जोड़ते हैं, और प्रभाव दोगुना हो जाता है, यह साहनी जी का शिल्प है। शिल्प के साथ ही यह आशा भी है कि समाज में कहीं कहीं वे बिंदु हैं जो इसके अवमूल्यन को रोक सकेंगे। संस्कार में भी इसी तथ्य की पुष्टि है।

वापसी, नपुंसक, इमिटेशन, आखिरी पड़ाव का सफर, संस्कार, स्वीकारोक्ति और घंटियाँ आत्मबोध की कथाएँ  हैं। घंटियाँ दर्शाती है कि इंसान दुनियाभर से अपना कुकर्म छुपा ले ,लेकिन उसका अपराधबोध जीवन भर उसका पीछा नहीं छोड़ता।

समाज का ही एक और हिस्सा है हमारे देश का राजनैतिक व प्रशासनिक तंत्र। साहनी जी अद्भुत संवाद योजना के माध्यम से भ्रष्ट प्रशासनतंत्र को चित्रित करते हैं और उनपर करारी चोट करते हैं। यह एक जोखिम भरा कार्य है, प्रशासन पर कलम चलाना साधारण बात नहीं है, किन्तु वह किसी भी तरह अपने लेखकीय दायित्व से पीछे नहीं हटते और समाज में सुधार की आशा लिए यह जोखिमपूर्ण कार्य करते हैं। डरे हुए लोग, यम के वंशज, सोडावाटर, चतुर गाँव और दीमक में इस भ्रष्ट समाज का प्रतिबिंब हैं। दीमक लघुकथा तो आज के दफ़्तरी निकम्मेपन और  भ्रष्टाचार की कलंक –कथा प्रस्तुत करती है, जिसकी दलदल में आपाद मस्तक सारी व्यवस्था निरन्तर धँसती जा रही  है

यम के वंशज में सरकारी अस्पतालो में अनपढ़ एवं गरीब तबके के प्रति संवेदनहीनता और उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार को नग्न रुप में प्रस्तुत किया है। इस लघुकथा का शीर्षक बहुत सटीक व प्रभावशाली है। जच्चा की थकी -थकी सी आवाज सुन कर भी नर्स का ना उठना अमानवीयता की सारी सीमाएँ  पार करता है।आज इससे भी अधिक घोर अमानवीयता अस्पतालों में देखने को मिलती है।

भ्रष्टतंत्र और उस में होने वाली जाँच कैसी होती है ,इस का चित्रण किया गया है सोडावाटर , जिसमें फाइव स्टार में , घर पर भोजन, तमाम उपहारों और लड़की की शादी के लिए 10,000 की व्यवस्था से अधिकारी की जाँच का उबाल तुरंत शांत हो जाता है। चीफ केवल प्रसन्न होकर ही नहीं रह जाता ,अपितु उसे ईमानदार भी घोषित कर देता है और यह खुराफाती लोगों से बचने की नसीहत दे डालता है। यहाँ भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा दिखाई देती है।

कॉलेज में कुछ शरारती तत्त्व किस प्रकार अन्य छात्रों को प्रभावित करते हैं और उन पर इस तरह हावी हो जाते हैं कि वह न सिर्फ आत्मग्लानि से भरते हैं ;अपितु उनकी क्षमता भी प्रभावित होती है। इसका चित्रण लेखक ने नपुंसक में किया है। इसके साथ ही उन लोगों पर व्यंग्य भी किया है जो अपनी झूठी शान बनाए रखने और अपनी मित्रों के उपहास पात्र बनने के डर से अपने आस-पास हो रहे कुकृत्यों को देखकर शांत रहते हैं। लघुकथा धीमे से यह भी कह जाती है कि  अपराध का विरोध न करना भी सबसे बड़ा अपराध है।

धन व सुख के लोभ में रिश्तो को नकारते भाई की कथा मोहभंग बदलते सामाजिक मूल्यों पर करारी चोट करती है। छोटे भाई की भावनाओं के प्रति उदासीनता और छोटे की हताशा एक ऐसे समाज का चित्रण करती है, जहाँ पिता की लाखों की फैक्टरी में छोटे भाई को हिस्सा न देने की मंशा से बड़ा भाई सीधा ही पूछ लेता है “कब जा रहे हो?” गिरते सामाजिक मूल्यों के साथ इस लघुकथा में मानवीय संवेदनाओ का चित्रण भी बखूबी किया गया है>

आखिरी पड़ाव का सफर उस व्यक्ति की कहानी है ,जो जीवन भर भ्रष्टाचार में लिप्त रहा और अपनी अंतरात्मा की आवाज को नकारता रहा। यहाँ साहनी जी ने बहुत ख़ूबसूरती से भ्रष्ट व्यक्ति का अंत दर्शाया है ,जहाँ अंत में हर तरफ अँधेरा और उदासी है।

संग्रह की लघुकथा उजबक बड़े सुंदर ढंग से दर्शाती है कि जब अन्याय व अत्याचार की अति हो जाती है तो सामान्यतया शांत व चुप रहने वाला व्यक्ति भी उसका विरोध करने को मजबूर हो जाता है। गाँव प्रधान व उसके मित्रों द्वारा सीधे साधे और गर्मी से बेहाल चेतू को उसी प्रकार परेशान करते दिखाया गया है, जैसे कम उम्र के नादान लड़के मक्खियों व तितलियों को पकड़कर सताया करते हैं। किंतु चेतू ने “नवल का घूँसा पड़ने से पहले झोंपड़े में एक तरफ पड़ा रुई का  बड़ा सा झोला देख लिया था।   अमीरी गरीबी के इस व्यापक अंतर में साहनी जी ने व्यक्ति की परिस्थितिजन्य आवश्यकताओं को उकेरा है जो चेतू के लिए रुई का थैला मात्र है।

चादर नामक लघुकथा में लेखक में अंधविश्वास और अंधभक्ति में सांप्रदायिक तत्त्वों पर व्यंग्य किया है, जिसमें, चलते हुए कई दिन बीत जाने पर भी वह कहीं नहीं पहुँचे ।यहाँ वह हमें स्पष्ट रुप से कहना चाहते हैं कि अपना कद बढ़ाने के लिए व्यक्ति को किसी भौतिक ऊँचाई पर चढ़ने की आवश्यकता नहीं है। ऊँचाई का अर्थ सिर्फ अपने विचारों और व्यवहार को उन्नत करना है। कथा का आरंभिक वाक्य “दूसरे नगरों की तरह हमारे यहाँ भी खास तरह की चादरें लोगों में मुफ्त बाँटी जा रही थी जिन्हें ओढ़कर टोलियाँ पवित्र नगर को कूच कर रही थी” यह एक गहन व्यंग्य है जहाँ यह दर्शाया जा रहा है कि किस प्रकार व्यक्ति दूसरों के विचारों को ओढ़कर अपना मत बनाता है और बिना सोचे समझे सांप्रदायिकता की आग में कूद पड़ता है और जिसे यह सब नहीं पसंद वह भी अनजाने में उन विचारों को ग्रहण कर लेता है जो कि बाद में उसे प्रभावित करती हैं। सांप्रदायिक ठेकेदारों पर करारा व्यंग्य करते साहनी जी कहते हैं देखने की बात यह थी कि जिस की चादर जितनी ज्यादा खून से सनी हुई थी वह उसके प्रति उतना ही बेपरवाह हो मूँछे ऐंठ रहा था। अंततः कथा नायक अंधी सांप्रदायिकता की खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंकता है। आज का भेड़चाल वाला धर्म  जन सामान्य के लिए केवल शोषक का काम करता है , उसका सुख –चैन छीनता है।

लघुकथा ‘कंम्प्यूटर’ में वर्तमान राजनीति व जनता की मानसिकता का सशक्त उदाहरण दिया गया है। इस कथा में साहनी जी ने उत्कृष्ट शिल्प का सहारा लेकर कम्प्यूटर को विभिन्न शक्लों में ढालकर दो सम्प्रदायों के बीच हुई दंगे की घटना पर कटाक्ष किया है और दिखाया है कि जैसे कंप्यूटर में जितना डेटा फीड होगा  वह उतना ही काम करेगा उसी प्रकार सरकार के बर्खास्त होते ही संपूर्ण तंत्र चरमरा जाता है, वफादारी बदल जाती है। लेखक ने कम्प्यूटर को प्रतीक के रूप में प्रयोग कर यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार मीडिया भी राजनीतिक पार्टियों के प्रभाव में रहता है। सांप्रदायिक हिंसा के बावजूद इमाम और महंत सरकार के प्रयासों की सराहना करते हैं किंतु फिर भी सरकार गिर जाती है। विवरणात्मक व संवादात्मक शैली में कथानक को घटना व प्रतीकों में लेखक ने सफलतापूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन किया है किंतु कई बातें पाठकों के स्वयं समझने के लिए छोड़ दी हैं ।

नरभक्षी एक ऐसे युवक की कहानी है जो व्यवस्था में नया है और वहाँ के भ्रष्ट अधिकारियों से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है, एक साल की नौकरी में उस पर अनेक हमले हुए हैं। पत्नी का तुम मर क्यों नहीं जाते और हम इसे जल्दी मार देंगे एक व्यक्ति की ईमानदारी को दारुण अंत की ओर जाते दर्शाते हैं। स्पष्ट है कि जो अपनी ईमानदारी के कारण समाज के भ्रष्ट रवैये को नहीं अपना पाते उनको लीलने  लिए अपने पराए सब नरभक्षी बन बैठते हैं। इसी सब से बचने के लिए भेड़िए का नायक इस्तीफा देते हुए कहता है कि मैं जिंदा लोगों का ताजा खून नहीं पी सकता, जिसके लिए आप सब पंद्रह वर्षों से प्रयासरत हैं। किंतु अच्छी खासी सरकारी नौकरी से यों ही इस्तीफा दे देने के कारण सब उसे विचित्र ढंग से देखते हैं और उसे पागल समझने लगते हैं, यहाँ तक कि उसे आगरा ,बरेली एडमिट कराने की बातें करने लगते हैं। वह जानना चाहता हैं कि क्या नौकरी में खून पीना जरुरी है ;किंतु उसके स्थान पर आने के लिए लालायित व्यक्ति का संवाद, देखिए…. मुझे नहीं मालूम था कि नौकरी में क्या क्या करने को कहा जाता है, मैं बहुत परेशान हूँ…. मुझे बस नौकरी से मतलब है, बेरोजगारी के दर्द से परेशान व्यक्ति के भ्रष्टता के आगे घुटने टेकने की बेचारगी दर्शाता है। आवश्यकता मनुष्य को क्या कुछ करने पर मजबूर कर देती है इसका जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है।  यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि एक भ्रष्ट तंत्र से स्वयं को अलग कर लेना समस्या का समाधान नहीं है। पाठक को इस समझ व दायित्व से भर देना लेखकीय सफलता है।

दु:ख की बात यह है की इस भ्रष्टाचार से हमारा शिक्षातंत्र भी मुक्त नहीं है। शिक्षाकाल में लेखक ने शिक्षा संस्थाओं में व्याप्त इसी कुष्ठ को अनावृत्त किया है। गरीब घर से आए एक जिम्मेदार और गंभीर शोधार्थी के साथ एक प्रोफ़ेसर का बर्ताव और उसी की महिला सहपाठी के प्रति अत्यंत नरम रवैया तथा रिसर्च नोट्स उसे दिलाने की जिद्द दर्शाती है कि किस प्रकार शोध संस्थानों में शिक्षा का मजाक बना दिया जाता है शोधार्थी के मना करने पर प्रोफेसर का चेहरा विकृत हो जाता है और वह उसे धमकी देता है। अंत में माइक्रोस्कोप में झाँकने पर प्रोफेसर शर्मा के आग्नेय नेत्र और उसके बाद आशा भरी नजरों से अपनी ओर ताकते बूढ़े माँ बाप के सिवाय कुछ और न देख पाना बेचारे शोधार्थी की विवशता को दर्शाता है । पाठक सहज ही अनुमान लगा सकता है कि शोधार्थी का अगला कदम क्या होग।

हारते हुए एक ऐसे पिता की कहानी है, जो सभी आर्थिक परेशानियों के बावजूद अपने बेटे को शहर के नंबर वन कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा दिला रहा है, किन्तु जब वही बेटा हिकारत भरी नजरों से सीता राम की तरफ देखता है और फटाक से कार का दरवाजा बंद कर लेता है ,तो सभी मुश्किलों में खुश रहने वाला सीताराम अपनी आर्थिक स्थिति के कारण अपने आपको हारता हुआ महसूस करता है। इस कथा में साहनी जी ने बड़ी तल्खी से शिक्षा और आर्थिक स्थिति की दूरी को दर्शाया गया है जो आज हर स्कूल, कॉलेज में विद्यमान है। पढ़ने वाले बच्चे अकसर अपने दोस्तों से तुलना करते हैं और अपने आसपास के माहौल से सामंजस्य न बिठा पाने  कारण अपना क्षोभ अपने अभिभावकों पर उड़ेल देते हैं और ऐसा करने में अपने उस माहौल में होने के उद्देश्य को और माता-पिता द्वारा उठाए गए कष्टों भी भुला बैठते हैं। कथा के माध्यम से इस घिनौने तथ्य को उकेरा गया है कि एक अच्छे स्कूल में पढ़ाने का सपना सिर्फ वही व्यक्ति देख सकता है जो आर्थिक स्तर पर मजबूत हो। शिक्षा –जगत् में साधारण वर्ग का टिके रहना अन असम्भव हो गया है। वह दौड़ में शामिल होने की स्थिति में  न होने के कारण, दौड़ से पूर्ण तया बाहर हो चुका है।

व्यवस्था तंत्र व कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार कुष्ठ के समान समाज में किस प्रकार फैलता जा रहा है इसकी परिणति शिनाख्त नामक लघुकथा में हैं जहाँ मुआवजे की राशि की घोषणा होते ही लाश को पहचानने वाले कई चेहरे सामने आ जाते हैं। सामाजिक पतन का यह दृश्यांकन पाठक को द्रवित करता है; किंतु यही यथार्थ है । साहनी जी ने यथार्थ पर ध्यान केंद्रित हर सामाजिक मुद्दे को अपनी कथाओं का विषय बनाया है, जैसे, स्त्रियों का शोषण, बालकों के प्रति अविवेकपूर्ण व्यवहार, संबंधों का खोखलापन, आत्मसम्मान, वृद्धावस्था, पाखंड, विवेकहीनता, असंवेदनशीलता, दहेज, घरेलू हिंसा, लालसा, गरीब का अभाव, बाजार का प्रभाव आदि। सभी विषयों को एक कुशल चित्रकार की भाँति उकेरकर सफलतापूर्वक सबके समक्ष  रखा है।

आज सांप्रदायिकता संपूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। एक ओर जहाँ कट्टरपंथी मत के लोग इसे बढ़ावा दे रहे हैं वहीं अफवाहें फैलाने वाले लोग भी कुछ कम नुकसान नहीं कर रहे। आइसबर्ग में जहाँ सांप्रदायिक हिंसा से जान बचाते हुए युवक द्वारा अपने को बचाने के लिए गढ़ी गई फर्जी घटनाओं और धर्म बदलते दिखाया गया है वहीं बिना सोचे समझे भड़काउ बातें कहने का प्रभाव युवा सिक्ख पर स्पष्ट है, निःसंदेह उस समय उसके सामने कोई विधर्मी होता ,तो वह अपना आपा खो बैठता किंतु प्रौढ़ सिक्ख द्वारा ओए … चोप्प कर, होर गूं नई घोल!! यह दर्शाता है कि समझदार व्यक्ति समय रहते शरारती तत्त्वों को पहचानकर विनाश  रोक सकता है और साथ ही पाठक को अनकहे दायित्वबोध से भर देता है कि शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी शासन तंत्र से अधिक एक आम आदमी की है।। अंतिम अवतरण में कई भीतरी और बाहरी घटनाएँ  घटित होती हैं, जो विरोधाभासी भी हैं, कर्फ्यू के बीच दोस्त के घर बिताए दो दिन, भीषण बलवे के दृश्यों वाली उत्तेजनापूर्ण कथा का अंत बालक की नन्ही शरारतों से प्रस्फुटित मुस्कान पर सकारात्मक ढंग से किया गया है।

मृग मरीचिका में लेखक ने युवक अजय द्वारा पाश्चात्य प्रभावों के दबाव में आकर अपनी मंगेतर से अत्यधिक अपेक्षा का चित्रण किया है तथा साथ ही नशा उतरने पर उसी संस्कृति के प्रति वितृष्णा और आत्मग्लानि से भरते दिखाया है। कस्तूरी मृग, कुत्तेवाला घर, प्रदूषण सभी सामाजिक परिवर्तन व पतन को परिलक्षित करती हैं तो पैंडुलम,माँ और पत्नी के संबंधों की कड़वाहट के बीच पिसते पुरुष को दर्शाती है और वह अपनी स्थिति ठीक दीवार घड़ी के पेंडुलम के समान पाता है, जो नपी तुली जगह में टिक-टिक की आवाज़ के साथ इधर-उधर झूल रहा था।

कुत्तेवाला घर में संपन्न होने के बावजूद किसी अन्य व्यक्ति की मेहनत की कमाई को मार लेने की प्रवृत्ति को बखूबी दर्शाया गया है। आज समाज में बहुत से ऐसे व्यक्ति दिखाई दे जाते हैं  जो आदतन सिर्फ कुछ पैसे बचाने के लिए किसी गरीब मेहनती व्यक्ति का पेट काटने से नहीं चूकते। अखबार डालने वाले हॉकर को झूठा इल्जाम लगाकर डांटना और सताना रुग्ण मानसिकता को दर्शाता है और इसकी परिणति अखबार वाले द्वारा दूसरे घर का कुत्ते से सावधान बोर्ड उतार कर उस व्यक्ति के घर पर लगाना न सिर्फ अखबार वाले की मानसिक स्थिति को दर्शाता है अपितु समाज को आगाह करता है कि हमें जानवरों से नहीं अपितु दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों से बचने की आवश्यकता है। साहनी जी की इस लघुकथा पर पंजाबी में टेलिफ़िल्म भी बन चुकी है।

सभी लघु कथाएँ  समाज की विद्रूपता को सामने लाती हैं ,ऐसा भी नहीं। कुछ लघु कथाएँ  कोमल भावों को भी प्रतिबिंबित करती हैं, जिनका एक उदाहरण है ओएसिस। नियम धर्म की पक्की दादी का पिल्ले को चुपचाप उठाकर रजाई में सुला लेना उम्मीद की किरण जगा जाता है, कि अभी भी भीतर के कोमल भाव जीवित हैं, संभावनाएँ  समाप्त नहीं हुई हैं। फॉल्ट में दांपत्य में उपजी अप्रिय स्थिति का सहज निराकरण तो है ही, साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि पारिवारिक अशांति व्यक्ति को किस तरह प्रभावित करती है। ऑक्सीजन भी सहृदयता का कोमल भावना जागृत करती है, बताती है कि जरा सी मानवीयता किस प्रकार जीवनदायिनी प्राणवायु बन सकती है।

ठंडी रजाई, धुएँ की दीवार, अनुताप, वापसी, आखिरी पड़ाव का सफर, मास्टर, रास्तों से दोस्ती, विजेता, खारा पानी, संस्कार, आक्सीजन, अंततः भी इसी श्रेणी में आती हैं। इन लघु कथाओं में जहाँ एक और कटु वास्तविकता को दर्शाया गया है वहीं आधारभूत मानवीय संवेदनाओं को उकेरकर जीवन मूल्यों की स्थापना भी की गई है। लेखक ने सहानुभूति पर्ण रवैया अपनाते हुए दूरी की दीवार में सभी कटुता के बावजूद चाचा के हाथ से भतीजी को दूध का गिलास दिलवाकर  निश्छल प्रेम की ऐसी धारा को बहाया है जिसमें कहीं कोई राग-द्वेष नहीं है। इसी तरह अनुताप लघुकथा में रिक्शे वाले की अकस्मात मृत्यु के समाचार से कथाकार को ऐसा आघात लगता है कि उसके मन में अन्य रिक्शे वाले की प्रति संवेदना उपज आती है। समाज में इसी संवेदना की स्थापना करना है एक अच्छे लेखक का दायित्व है जिसे साहनी जी ने बड़ी कुशलतापूर्वक निभाया है।

आधी दुनिया, नब्ज़ और कोलाज में लेखक ने नए प्रकार के शिल्प का प्रयोग किया है जिसमें छोटे छोटे कहीं संपृक्त और कहीं असंपृक्त वाक्यों के माध्यम से वह अपनी बात कहने मे सफल हुए हैं। नब्ज में लेखक ने देश और समाज के वर्तमान स्वरूप के कटु सत्य उजागर किया है कि आज का समाज किस प्रकार अधिकाधिक तकनीक पर निर्भर होता जा रहा है। फोन के बिना जीवन की कलपना असहनीय हो गई है। आज की पीढ़ी चौबीस घंटे फोन से चिपकी रहती है। इस संयोजन के असंपृक्त वाक्यों वाली शैली की विविधता ही इसे अन्य लघुकथाओं से अलग बनाती है। सभी वाक्य अपने आपमें इसी विचारधारा से जुड़े हैं कि यह तकनीक ही हमें असंवेदनशील भी बनाती जा रही है। हर समय जुड़े होकर भी आज का समाज बिलकुल अकेला है। इसी प्रकार खेल भी आजकल इंटरनेट पर विभिन्न माध्यमों से की जाने वाली चैट शैली का प्रयोग कर लिखी गई लघुकथा है जो आज के दोगले समाज पर जबरदस्त प्रहार करती है। कम से कम शब्दों में देश के हालात पर कटाक्ष करती कहती है – दिल्ली इज़ ऑलरेडी प्लेइंग विद गुजरात, जो न सिर्फ राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य को उजागर करती है अपितु यह दर्शाती है कि व्यक्ति पर्दे के पीछे कितने रंग बदलता है, एक सड़ी गली मानसिकता दर्शाती है। साइट के सेकुलर डॉट कॉम होते हुए भी पार्टी वाला पहले संप्रदाय की जानकारी चाहता है औऱ वह न बताए जाने पर निकल भागता है। यह इंटरनेट के घातक परिणामों को भी रेखांकित करती है।

व्यंग्य की एक बानगी प्रतिमाएँ  नामक लघुकथा में है जहाँ साहनी जी ने बहुत ही लाक्षणिकता का प्रयोग करते हुए अपनी बात रखी है। यह लघुकथा सत्ता के खिलाफ बोलने वालों के दुखद अंत को दर्शाती है और साथ ही राजनीति में कुटिल नेताओं को सत्य को भी उजागर करती है। यह कुटिलता ऐसी है जो प्रतिद्वंदी के प्रति द्वेष रखते हुए उसका कत्ल करने से नहीं चूकती और फिर झूठी सहानुभूति दिखाकर अपने वोट बटोरती है। राजनेताओं द्वारा जनता को  रास्ते से हटाने और बेवकूफ बनाए जाने का इससे बेहतरीन चित्रण शायद ही कहीं हुआ हो। सक्रिय राजनीति से  दरकिनार कर दल में कोई पद सौंपना या किसी अन्य  निष्क्रिय संवैधानिक पद पर बिठाकर राजनीति से बाहर कर देना आज खेल बन गया है। प्रतिमाओं के सच को  साहनी जी ने प्रतीकात्मक भाषा में उजागर करते हुए कहा है- “प्रतिमा की आँखे बंद थी, होंठ भिंचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे।”  इसका सीधा सीधा अर्थ है कि आज के युग में यदि सामने अन्याय हो रहा है तो भी उसो मत देखो, न ही उसके खिलाफ आवाज़ उठाओ और न कुछ सुनो। मुख्यमंत्री को देश की राजनीति से यह सूचना मिलना कि आपको जानकर हर्ष होगा कि पार्टी ने देश के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशाल प्रदेश की राजधानी में आपकी भव्य विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। प्रतिमा का अनावरण पार्टी अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री के कर कमलों से किया जाएगा। बधाई! स्पष्ट रूप से यह दर्थाता है कि राजनीति में कोई भी नेता दूसरे का प्रभाव अपने से अधिक नहीं होने देना चाहता।

लघुकथा रास्तों से दोस्ती में लेखक ने यह दर्शाया है कि यदि व्यक्ति के भीतर डर नहीं है तो बाहरी किसी वस्तु से उसे डरने की आवश्यकता नहीं है। स्वच्छ विचारों व सोच वाले व्यक्ति अक्सर ऐसे ही पाए जाते हैं। लघुकथा के अंत में यह कहा जाना कि बंदर और कुत्ते तो स्थान बदलते रहते हैं इस बारे में अगर कुछ जानना है तो सदियों से हमारी प्रत्येक गतिविधि के मूकदर्शक इन रास्तों से पूछो कथन बहुत प्रभावशाली व बहुत कुछ कह जाता है। बंदर और कुत्ते स्थान बदलते रहते हैं जबकि सही मार्ग पर चलने वाले सदैव तटस्थ रहते हैं। यह लघुकथा थोड़ा लीक से हटकर  हमारे चिन्तन का विश्लेषण करती है। जिसका अन्त:करण निर्मल है, उसके लिए इस संसार में भय जैसी कोई चीज़ नहीं है। मन में जब कुछ चालाकी या प्रपंच होते हैं , तो वे हमारे कार्य-व्यापार में भय का रूप धारण करके परिलक्षित होने लगते हैं।

यद्यपि इनकी संख्या बहुत कम है, बेताल की डाल लघुकथा को कुछ कम प्रभावशाली लघुकथाओं में रखा जा सकता है ,जहाँ पुराने विषय को नए रूपकों और प्रतीकों  के माध्यम से प्रस्तुत तो किया गया है ;किन्तु इसका अंत साहनी जी की अन्य लघु कथाओं की तरह सशक्त नहीं दिखाई पड़ता। यह कथा स्पष्ट रूप से नेताओं द्वारा किए गए झूठे वादों और जनता के समझदार हो जाने की कथा है ,जिसमें अंत में जनता निर्णय लेती है कि वह अगले चुनावों में किसी को भी वोट नहीं देगी।

उतार लघुकथा की तकनीक एकदम नई है जिसमें कुआँ खोदने वाले मिस्त्री की डायरी के लगभग एक वर्ष के अंतराल पर लिखे नोट्स के माध्यम से न सिर्फ गिरते जल स्तर पर पर्यावरणीय  चिंता व्यक्त की गई अपितु ग्राम्य परिस्थितियों पर राजनीति के प्रभाव और बिगड़ते आपसी संबंधों का भी चित्रण किया गया है।

जागरूक लघुकथा में जहाँ एक और अत्याधुनिकता के दुष्परिणामों को दर्शाया है वही आज समाज में स्त्रियों के प्रति बढ़ रही कुछ पुरुषों की रुग्ण मानसिकता के साथ-साथ समाज में एक दूसरे के प्रति बेपरवाही को भी दिखाया गया है। कोठियों में बंद लोग आसपास की घटनाओं से बेपरवाह एयरकंढीशनरों में सुख से रहते हैं, स्वार्थी सोच जहाँ एक लड़की की चीखों को नहीं सुन पाती वही आवारा कुत्तों के रोने को अपशकुन मानते हुए तुरंत बाहर निकल आक्रामक हो जाती है। यही आज के समाज की विडंबना है। इसी बढ़ती विद्रूप सोच का चित्रण कसौटी में है जहाँ एक अव्वल लड़की के मेरिट में दूसरे स्थान पर होते हुए भी उसे पर्सनैलिटी टेस्ट में इसलिए डिस्क्वालिफाई  कर दिया जाता है क्योंकि वह  नाइन्टी फाइव पर्सेंट प्योर  है। यह लघुकथा समाज में निरंतर बढ़ रहे पतन की द्योतक है।

संग्रह की अंतिम लघुकथा ओए बबली में लेखक ने फिर एक नई शैली को अपनाया है, वह स्वप्न की तकनीक से बताते हैं कि बबली सपना देख रही है, वह पानी को ढूंढ रही है पानी की खोज हमारी समाज में निरंतर गिरते जल स्तर को भी दर्शाती है जहाँ पानी समाप्त होता जा रहा है। समाज में जल की समस्या इतनी विकट है कि सपने में भी बबली पानी ही देखती है और उसकी नींद भी चल जल्दी कर बेटी बर्तनों की कतारें लगने लगी है पानी का टैंकर आता ही होगा आज तो घर में पकाने के लिए भी पानी नहीं है, बबली! पर आकर समाप्त होती है बड़ी सहजता से साहनी जी ने गिरते जल स्तर की समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है जहाँ स्पष्ट रुप से यह कहा गया है कि पानी का स्थान न तो बर्फ ले सकती है और न ही कोल्ड ड्रिंक की बोतल। मां के लिए पानी खोजती बबली अपनी फ्रॉक में बर्फ भरकर दौड़ती है किंतु अंत में उसके पास बर्फ भी नहीं बचती।

सुकेश साहनी जी की रचनाओं में अलग अलग तकनीक देखी जा सकती हैं ,जिनके माध्यम से आपने सिद्ध किया है कि लघुकथा लेखन में कथानक के चयन, कथ्य के विकास, शैली निर्धारण में नए प्रयोगों की आवश्यकता है जो लेखक के संदेश को न सिर्फ सफलतापूर्वक संप्रेषित कर सके अपितु पाठक पर ऐसा प्रभाव छोड़े जो उसकी चेतना के तारों को ऐसे झंकृत करे कि वह एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में अग्रसर हो। यह निश्चित रूप से एक बहुत महत्वपूर्ण दायित्व है जिसका साहनी जी पिछले तीन दशकों से सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं।  इन  सभी कारणों और प्रतीकात्मकता, बिंब प्रयोग भाषा शैली और लाक्षणिकता के कुशल प्रयोग के कारण साहनी जी कि लघुकथाएँ  विश्व की सर्वोत्तम लघुकथाओं में रखी जा सकती हैं।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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