नवम्बर-2017

संचयनकान्ता राय की लघुकथाएँ     Posted: May 2, 2017

1-साख बच गई

“आप  बार-बार रसोई में क्या कर रहीं हैं, आइये हमारे साथ अपनी प्लेट भी लगा लीजिए!” सुनते ही मुँह में कान्ता रायलगा गिलास हाथ से छूटते-छूटते बचा। तुरंत डायनिंग एरिया में लौटी।

“आप लोगों को देरी होता देख,भूख लगी तो खाना खा लिया था, इसलिए अभी बिलकुल भूख नहीं लग रही है, आप  राजमा लीजिए, पूरी रख दूँ एक?”

“नहीं, अभी है प्लेट में, बाद में देखती हूँ।”

पॉश कॉलोनी में रहना,हिलना-मिलना, किटी ग्रुप ज्वाइन करना जरूरी  था। काँपती अंगुलियों की पोरों में किराने वाले की उधारी का हिसाब गिनती करने में समा नहीं पा रही थी। बजट भाग रहा था। नई कॉलोनी, यहाँ वह अजायबघर की अलग-थलग प्राणी नहीं बनना चाहती थी इसलिए……!

“मम्मी….!” अंदर कमरे से फुसफुसाकर लड़के की आवाज़ बाहर आई तो वह चौंक उठी। किसी का ध्यान नहीं गया।  डायनिंग टेबल पर सब खाने और आपसी बात-चीत में मशगूल थे।

वह धीरे-से सरककर कमरे में गई,” हल्ला मत करो,बाहर सब सुन लेंगे, क्यों बुलाया?”

“मुझे भी खाना चाहिए, भूख लगी है!”

“अभी नहीं, पहले मेहमान खा लें ,इसके बाद खाना दूँगी।”

“इतने लोगों में मैं भी खा लूँ ,तो क्या हो जाएगा?”लड़का रुआँसा हो रहा था।

“उफ्फ! समझता क्यों नहीं, मैंने लोगों की गिनती से खाना बनाया था । अब दो लोग एक्सट्रा आ गए हैं। अंदर खाना खत्म होने वाला है, तुम बाहर मत निकलना और चुप रहना, बस आज मेरी इज्जत बच जाए।”

“मम्मी, देखो, सब उठ गए हैं खाकर, अब तो दोगी ना…?”  लड़का खुशी जाहिर करते हुए सिसका।

वह झट से बाहर निकली।

“अरे, आप सबने तो ठीक से खाया ही नहीं, ऐसे ही उठ गए!”

“मिसेज वर्मा, आपके हाथों में तो जादू है, हम सबने दिल से खाना खाया है।”

“कहाँ कर पाई कुछ भी, बहुत कम वक्त में तैयारी कर पाई हूँ।”

“इस साल की किटी पार्टी में आपके यहाँ का पहला लंच हमेशा याद रहेगा।”

वह फीकी मुस्कान लिये कमरे में बेटे की ओर देखी,बेटे की नजर डायनिंग टेबल पर डोंगे में बचे खाने पर अब तक टिकी हुई थी। उसकी ओर आँखें तरेर, वह सुपारीदान लेकर हॉल की ओर बढ़ गई।

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2-शगुनिया कौआ

 

जन्मपत्री हाथ में लिए वह पाँड़े जी से मिलने निकल पड़ा। आँगन में आम के  पेड़ पर कौए का काँव-काँव पीछे-पीछे शोर करता आ रहा था। अपने निर्णय पर दृढ़ था। नहीं चाहता था कि शुभ काम में जाते वक्त कोई उसे टोके।

तेज कदमों से वह गाँव के बीच पोखर के पास बने उस हवेली के दालान में चला आया।

“पाय लागू पाँडे जी!”

“जीते रहो, कहो आज कैसे रास्ता भूले!” चारपाई पर लेटे पाँडे जी बैठ गये।

“रास्ता भूले नहीं, अबकि आपके आशीर्वाद की जरूरत पड़ी ,सो दौड़े आए।”

“का, कोई शगुन ठाने हो क्या?”

“हाँ, पाँड़े जी, बिटिया का जनेऊ संस्कार करवाना है।”

“बिटिया का जनेऊ संस्कार…! क्या कह रहे हो, सिर फिर तो नहीं गया है?”

“क्या बेटी होना संस्कार कर्म  में बेदखली होना होता है पांड़े जी?” पाँडे जी की बातें उसके मन को विचलित कर गई थी। कौए की काँव-काँव बेचैनी बढ़ा रही थी।

“बेटी को संस्कारित करने में जब वेदों में दखल ही नहीं तो बेदखली की बात  कहाँ से उठेगी।” दालान के दूसरी तरफ  खेलती इकलौती नातिन को देख पाँडे जी के दिल में टीस-सी उठी।

” आज बेटा-बेटी  समान अधिकार से शिक्षा-दीक्षा लेकर घर से बाहर तक बराबरी करते हैं तो घर के अंदर भी सारे संस्कार बराबरी से ही मिलना  चाहिये।”अबकी ठान चुका था कि वह पीछे नहीं हटने वाला। कौए ने जोर से काँव-काँव शुरू कर दी।

पाँडे जी देर तक चुप्पी साधे रहे।

“सही कह रहे हो तुम, देखो गूलर पर कौआ भी शगुन उचर रहा है। अब से गाँव की हर बेटी की जनेऊ- संस्कार  हमारी जिम्मेदारी होगी। लाओ पत्री, देखूँ तो बिटिया रानी कौन सी ग्रह-नक्षत्र की स्वामिनी है!”पाँड़े जी की चुप्पी टूटते ही कौए का उचरना मन को राहत दे गया।

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3-जमात 

जीभ आज सहमी सहमी तालू में चिपकी हुई है। उसके समाज में बहुत बड़े बदलाव की सम्भावना है।

वह चंचलता से भरपूर, उसको हिदायत मिली है कि दाँतों के जमात के आस पास भी न जाए। संग सहचरी से दूर रहना उसके लिए मुश्किल था फिर भी शोक संतप्त वातावरण में वह मायूस होकर दायित्वबोध को जीने की कोशिश कर रहीं थी।

कुछ दिन पहले दो बीमार दाँत सिधार चुके थे। बत्तीसी समाज में विमर्श चल रहा था। मुद्दा यही था कि बत्तीस से तीस होने को कैसे सहा जाए। यहाँ बात संगठित रहने की थी। भले अंदरूनी तौर पर कमजोर रहें लेकिन दुनिया के सामने एकजुटता को दिखाना जरूरी था सो बत्तीस होने पर ही बने रहने का सवाल था।

कुछ दाँतों ने जगह की खानापूर्ति के लिए सुझाव दिया तो मसूढ़ों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। बाहर के दाँतों को वे सपोर्ट देने से इंकार कर रहें थे।

जीभ भी तैयार नहीं थी किसी बाहरी हस्तक्षेप के लिए ;लेकिन तीस के आगे किसी की नहीं चली। तय हुआ कि दो दाँत गोद लिए जाएँगे। देख- रेख और सपोर्ट के लिए पड़ोसी दाँत अपना पूरा सहयोग देंगे।

गोद प्रक्रिया में अपने लिये खास स्थान पाने के जोश में आकर वे दोनों दाँत भी बाकी अठ्ठाईस दाँतों के गुणगान में लग गए।

गोद लेने के लिए जब दो नये दाँतों को सामने लाया गया ,तो वे चकित हो गए। बिलकुल वही नैन-नक्श,बिछोह की पीड़ा मिलन का सुखद क्षण में बदलता प्रतीत हुआ। वे सहर्ष उनको अपनाने हेतु आलिंगन के लिए आगे बढ़े कि नये दाँतों के मालिक ने उनकी जाँच पड़ताल शुरू कर दी।

” हमारी जाँच पड़ताल क्यों?” दोनों का चौंकना लाज़मी था।

“हम देखना चाहते हैं कि आप दोनों इसे सपोर्ट दे सकने के काबिल है या नहीं।”

“अरे, हमारी काबिलियत पर शक करने वाले…अक्ल है तुम्हारे पास की नहीं?…. गौर से देखो, हम असली दाँत हैं। स्वस्थ और भरेपूरे। हमारी जाँच करने की जरूरत नहीं।”

वे दोनों चिल्लाते रह गए; लेकिन उनकी सुनवाई अनसुनी रही। वे सारे पेपर साइन कर चुके थे। जल्दबाजी में टर्म और कंडीशन पर ध्यान ही नहीं दिया था।

उन  दोनों को बाँधकर, जकड़ दिया गया। समाज सहित जीभ तालू से चिपकी तमाशबीन बनी रही।

अब दोनों बेकसूर रगड़े जा रहें थे। ऊपर से काटे जा रहे थे। चारों ओर से छिले जा रहे थे।

लहूलूहान, दर्द से बिलबिलाते हुए दोनों अपनी पहचान खोकर दो नकली दाँतों के साथ वे भी नकली खोल पहनकर अब  सकते में हैं।

वे समझ चुके थे कि दिखावे की राजनीति में वे बलि चढ़ाए जा चुके हैं। अब यह धोखा, दर्द की टीस बनकर सदा उनके साथ रहेगा।

जीभ अब तक तालू में चिपकी हुई है और खुश है कि वह दाँतों की जमात में शामिल नहीं है।

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4-तलब

” पापा मुझे कुछ रुपये चाहिए ” ड्यूटी पर निकलने को तैयार भँवरलाल , बेटे की आवाज पर चौंक उठे ।

” कितने बार कहा , ड्यूटी पर जाते वक्त मत टोका करो, अभी तो दिए थे पिछले हफ्ते दस हजार ,उसका क्या हुआ ? ”

” दस हजार से होता क्या है पापा! सारे खर्च हो गये “नजरें चुराते हुए उसने कहा ,तो भँवरलाल ठठा कर हँस पड़े ।

” बता कितना चाहिए?” जेब में पर्स टटोलते हुए पूछा ।

” सिर्फ चालीस हजार ”

” क्या ,इतने सारे रुपये ! कौन सा ऐसा काम आन पड़ा? ”

” उससे आपको मतलब नहीं , बस आपको देना ही है “पापा को उत्तर देने के बजाय ,वह अचानक गुर्रा उठा ।

” अच्छा ,अच्छा ,ठीक है ,नहीं पूछता , यह लो दस हजार , अभी इतने से ही काम चला लो ,बाकी के शाम को इंतजाम करके देता हूँ ” कहकर वह बाहर आ ,गाड़ी स्टार्ट कर विदा हुए । रास्ते भर रुपये की जुगत सोचते रहे । इकलौता जवान बेटा है । ऐश-ठाठ से रहे,आखिर इसी के लिए कमाता भी तो हूँ । मन पितृत्व से आल्हादित हो उठा ।

सामने पान की गुमटी पर गाड़ी रोक ली ।

” भीखू भाई , पान खिला जल्दी से , हरी-हरी ताज़ा पत्तियों वाला , बहुत तलब लगी है ”

” अरे , थानेदार साहब , अभी धंधे का वक्त है , शाम को वसूली कर लेना ,तुम्हारी सारी तलब मिटा  दूँगा , अभी जाओ , तुमको देखकर लौंडे लोग बिदक जाएँगे । ”

” नशे का धंधा का भी कोई टाइम होता है भला,तलबगार दिन – रात नहीं देखता है । चल निकाल,घर में जरूरत है । वादा करके आया हूँ । ”

” तुम नहीं मानोगे , अच्छा ,ये लो साहिब ”

” अरे , इतने कम से काम नहीं चलेगा आज , पूरा चालीस ही चाहिए ”

” अपना धंधा अभी बाकी है साहब ”

” मै नहीं जानता ,मुझे अभी चालीस के चालीस ही चाहिए ”

” यह लीजिए और बख्स दीजिए मुझे , जल्दी जाइये,मेरा ग्राहक आ रहा है । ”

रूपयों को जेब में तसल्ली से ठूँस ,खुशी से गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ गए। सामने आईने में अपनी  मूँछों तो ताव देते हुए चेहरा देख रहे थे कि पीछे गुमठी पर किसी को देख , सशंकित हो वापस गाड़ी घुमाई ।

गुमठी पर नशे की पुड़िया हाथ में लिये , सौदेबाजी में लिप्त , सामने खड़े इकलौते बेटे को देख , वह पसीने से तरबतर हो छटपटा उठे।

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5-इंजीनियर बबुआ

शरबतिया बार बार चिंता से दरवाजे पर झाँक, दूर तक रास्ते को निहार उतरे हुआ चेहरा लेकर कमरे में वापस आ आती। कई घंटे हो गए रामदीन अभी तक नहीं लौटा है।

गाँव के पोस्ट ऑफिस में फोन है ,जहाँ से वह कभी-कभार शहर में बेटे को फोन किया करता है। इतना वक्त तो कभी नहीं लगाया।

खिन्न हृदय लिये रामदीन जैसे ही अंदर आया कि शरबतिया के जान में जान आई।

“आज इतना देर कहाँ लग गया, कैसे हैं बेटवा- बहू,सब ठीक तो है ना?”

“हाँ, ठीक ही है!”

“बुझेइ-बुझे से क्यों कह रहें हैं?”

“अरे भागवान, ऊ को का होगा, सब ठीक ही है!”

“तुम रुपये भेजने को बोले ऊ से?”

“हाँ, बोले।”

“चलो अच्छा हुआ, बेटवा सब सम्भाल ही लेगा, अब कोई चिंता नहीं!”

“अरे भागवान, उसने मना कर दिया है ,बोला एक भी रुपया हाथ में नहीं है, हाथ खाली है उसका भी।”

“क्याss….! हाथ खाली…वो भला क्यों होगा, पिछली बार जब आय रहा तो बताय रहा कि डेढ़ लाख रुपया महीने की पगार है। विदेशी कम्पनी में बहुत बड़ा इंजीनियर है ,तो बड़ी पगार तो होना ही है ना!”

“बड़ी पगार है ,तो खर्चे भी बड़े हैं, कह रहा था कि मकान का लोन, गाड़ी का लोन और बाकि होटल,सिनेमा और कपड़ा-लत्ता की खरीददारी जो करता है ऊ क्रेडिट कॉर्ड से, उसका भी व्याज देना पड़ता है,इसलिए हाथ तंग ही रहता है।”

“बबुआ तो सच में तंगहाली में गुजारा करता है जी!”

“हाँ, भागवान, सुनकर तो मेरा दिल ही डूब गया। सोचे थे कि अपनी बेटी नहीं है, तो भाँजी की शादी में मदद कर बेटी के कन्यादान का सुख ले लेंगे, बबुआ कन्यादान का खर्च उठा लेता जो जरा ; लेकिन उसको तो खुद के खाने के लाले हैं।”

“सुनिए, भाँजी के लिए हम कुछ और सोच लेंगे,पिछली साल गाय ने जो बछिया जना था उसको बेचकर व्याह में लगा देते हैं।”

“हाँ, सही कहा तुमने, क्या हुआ एक दो साल दूध-दही नहीं खाएँगे तो! बछिया बेचकर कन्यादान ले लेते हैं।”

“एक बात और है।”

“अब और क्या?”

“इस बार जो अरहर और चना की फसल आई है ,उसको बेच कर बेटवा को शहर दे आओ, उसका तंगी में रहना ठीक नहीं, हम दोनों का क्या है, इस साल चटनी- रोटी खाकर गुजारा कर लेंगे, फिर अगली फसल तो हाथ में रहेगी ही!”

“हाँ, सही कह रही हो, मैं अभी बनिया से बात करके आता हूँ, इंजीनियर बबुआ का तंगी में रहना ठीक नहीं है।”

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कान्ता राय,मकान नम्बर-21,सेक्टर-सी सुभाष कालोनी ,नियर हाई टेंशन,गोविंदपूरा

भोपाल- 462023; ई मेल –roy.kanta69@gmail.com

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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