नवम्बर -2018

देशबाबू जी का श्राद्ध     Posted: January 1, 2016

श्राद्ध पक्ष चल रहे थे । घर में बाबूजी का ग्यारस का श्राद्ध निकालना था । दो चार दिन पहिले से ही पंडित जी को न्योता दे दिया था । उस दिन सुबह जब याद दिलाने के लिये पंडित जी को फ़ोन किया तो वे कहने लगे ” क्या करूँ मुझे तो बिल्कुल समय नहीं है, दूसरी जगह से भी न्योता है पहिले वहाँ जाकर फिर वहीं से आफिस चला जाउँगा । आपके यहाँ तो शाम को ही आ पाउँगा ।” क्या करते आजकल पंडित मिलते कहाँ हैं सो मानना पड़ा । फिर थोड़ी देर में उन्हीं का फोन आया और बोले ” खाने का इंतज़ाम टेबिल-चेयर पर करियेगा मैं नीचे बैठ कर खाना नहीं खाउंगा , और दक्षिणा में कपड़ों के अलावा कम से कम सौ रुपये देने होगें । यदि आपको मंजूर हो तो मुझे आफिस में ही फोन कर बतादेना ।
हम सभी का सिर चकरा गया । ये पंडित जी आ रहे थे या कोई अफसर आ रहे थे, जिनका हमें स्वागत करना था । सोच में पड़ गए की हम क्या करें ? श्राद्ध का खाना तो सुबह ही खिलाना चाहते थे । जब तक श्राद्ध निकाल कर पंडित जी को भोजन ना करा दें घर का भी कोई सदस्य खाना न खाये ऐसी परम्परा थी ।
थोड़ी देर में देखा कि द्वार पर एक बूढ़ा आदमी निढ़ाल अवस्था में बैठा था और बुद-बुदा रहा था -” मैं बहुत भूखा हूँ । कई दिनों से ठीक से खाना भी नसीब नहीं हुआ है । कुछ खाने को दे दो ।” उस पर बड़ी दया आ गयी । उसे घर के अहाते में बैठा कर आग्रह पूर्वक खाना खिलाया । वह भरपेट खाना खा कर और पानी पी कर, ढेर सारी आशीष देता हुआ चला गया । उस दिन लगा आज बाबूजी का श्राद्ध ठीक से सम्पन्न हुआ है ।
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