नवम्बर -2018

देशपृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएँ     Posted: February 1, 2016

1-बेटी तो बेटी होती है

तेज धूप में पसीने की बूंदें उसके चेहरे पर चुचुआ आतीं, जिन्हें वह बार–बार पोंछ लेता था। उसके कपड़े उसके शरीर के साथ चिपक गए थे। सांय–सांय करती सडक पर दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। एकाएक सामने से उसे एक जीप आती दिखाई दी। वह पलक झपकते सड़क के बीचोबीच आ खड़ा हुआ। चींई करती हुई ब्रेक लगी। ड्राइवर उसे घुड़कता या चपत रसीद करता, इससे पहले ही गाड़ी से उतरते पुलिस अफसर ने उसे रोक लिया। पुलिस अफसर ने हाथ जोड़े, नतग्रीव खड़े उस व्यक्ति के पास आकर संजीदगी से पूछा, ‘क्या बात है बाबा?’ वह मर्माहत–सा रिरियाते हुए बोला, ‘मेरी बेटी…मेरी बेटी को..’
‘क्या हुआ है आपकी बेटी को?’ पुलिस अफसर ने हौसलाअफजाई की। ‘दो गुंडे उसे इस ओर भगा ले गए हैं।’ उसने इशारे से उस सड़क की ओर उँगली उठा दी। पुलिस अफसर पलटा और आदेश दिया, ‘इंस्पेक्टर, तुम फौरन उनका पीछा करो। यह बुजुर्ग बहुत घबराए हुए हैं, मैं इनके पास रहूँगा।’
आधे घण्टे के बाद जीप लौटी। उसमें वह लड़की और दोनों गुंडे भी थे। लड़की को देखकर पुलिस अफसर भीतर तक काँप गया। फिर अधेड़ व्यक्ति की ओर उन्मुख होकर बिना कुछ जाहिर किए पूछा, ‘क्या यही आपकी बेटी है?’ इससे पहले कि अधेड़ व्यक्ति कुछ कहता, लड़की बिलखती हुई ‘पापा…पापा!’ कहते हुए पुलिस अफसर से लिपट गई।
अधेड़ व्यक्ति सब कुछ समझ गया। वह निरपेक्ष भाव से कुछ देर पुलिस अफसर को देखता रहा। फिर वह जाने के लिए मुड़ा। पुलिस अफसर सचेत हुआ और आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘आप रुकिए, मैं अभी इंस्पेक्टर को आपकी बेटी को ढँढ़ने के लिए भेजता हूँ।’
अधेड़ व्यक्ति ने पल–भर पुलिस अफसर की आँखों में झाँका। फिर गहरे सुख की अनुभूति के तहत धीरे से कहा, ‘वह तो मिल गई साहिब! बेटी तो बेटी होती है, वह मेरी हो या आपकी।’ कहकर उसने हाथ जोड़े और लड़की के सिर पर हाथ फेरते हुए पलटकर गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी पर हो लिया।
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2-कथा नहीं

वह पेशाब करके फिर बातचीत में शामिल हो गया।
दीदी ने कहा, ‘‘पिताजी को बार–बार पेशाब आने की बीमारी है, इनका इलाज क्यों नहीं करवाया?’’
उसने स्थिति को समझा। फिर सहजभाव में बोला, ‘‘मैं अलग मकान में रहता हूँ, मुझे क्या मालूम इन्हें क्या बीमारी है?’’
माँ बीच में बोली, ‘‘तो क्या ढिंढोरा पिटवाते?’’
उसने माँ की बात को नजरअन्दाज करते हुए कहा, ‘‘देखो दीदी, अगर यह बताना नहीं चाहते थे तो खुद ही इलाज करवा लेते।’’ थोड़ा रुककर आगे कहा, ‘‘इन्होंने बहुत सूद पर दे रखे हैं, पैसों की कोई कमी नहीं इन्हें।’’
पिता चिढ़े–से बोले, ‘‘जवान बेटे के होते इस उमर में डॉक्टर के पीछे–पीछे दौड़ता?’’
इस हमले को तल्खी में न झेलकर उसने गहरा व्यंग्य किया, ‘‘आप सुबह–शाम मीलों घूमते हैं, मुझसे अधिक स्वस्थ हैं, फिर डॉक्टर के पास क्यों नहीं जा सकते थे?’’
दीदी ने चौंककर देखा। आनेवाली विस्फोटक स्थिति पर नियंत्रण करने की ग़रज़ से बीच में ही दखल दिया, ‘‘आखिर माँ–बाप भी अपनी संतान से कुछ उम्मीद करते ही हैं।’’
वह अपनी स्थिति को सोचकर दु:खी होकर बोला, ‘‘तुम नहीं जानती कि मेरा हाथ कितना तंग है। ठीक से खाने–पहनने लायक भी नहीं कमा पाता। तुम्हारी शादी के बाद तुम्हें एक बार भी नहीं बुला पाया।’’ आँखों के गिर्द आए पानी को छुपाने के लिए उसने खिड़की से बाहर देखते हुए गम्भीर स्वर में कहा, ‘‘सूद का लालच न करके मुझे कुछ बना देते तो मैं इनकी सेवा लायक न बन जाता!’’
पिताजी ने रुआँसे होकर बताया, ‘‘मेरे दो दाँत खराब हो गए थे, उन्हें निकलावाकर, नए दाँत लगवाए हैं, देखो!’’ उन्होंने दाँत बाहर निकाल दिए।
माँ बार–बार रोने लगी, ‘‘क्या करते हो? तुम्हारा सारा जबड़ा भी बाहर निकल आए तो किसी को क्या? दाँत न रहने पर आदमी ठीक से खा नहीं पाता?’’
दीदी भी रोने लगी, ‘‘दीपक, तुम्हें माँ–बाप पर जरा भी तरस नहीं आता?’’
दीपक का चेहरा बुझते–जलते लट्टू की तरह होने लगा। दु:ख और आक्रोश में वह काँपने लगा। अगले ही क्षण उसने नकली दाँतों का सैट मेज पर रख दिया और सिसकता हुआ गुसलखाने की ओर बढ़ गया….।
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3-दु:ख

उसने पास जाकर पुकारा, ‘‘माँ!’
माँ ने सिलाई–मशीन के रिंग को हाथ से रोकते हुए कहा, ‘‘क्या है बेटा?’’
‘‘पिताजी कब लौटेंगे, माँ?’’
‘‘आज तुम फिर वही रोना ले बैठे! वह अब क्या आएँगे बेटा?’’ फिर थोड़ा मुस्कराकर बोली, ‘तू चिंता क्यों करता है….मैं आने लाल को पढ़ा–लिखाकर बड़ा आदमी बनाऊँगी। मेरे ये हाथ और यह सिलाई–मशीन सलामत रहें, अपने बेटे के जीवन में कोई कमी नहीं आने दूँगी।’’
‘‘ माँ, पिताजी गए क्यों?’’
‘‘क्या कहूँ!’’
‘‘बताकर भी नहीं गए, माँ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों?….क्यों माँ?’’
‘‘तूने सिद्धाथै की कहानी सुनी है…नहीं? ले, तुझे सुनाती हूँ–सिद्धार्थ कपिलवस्तु के राजकुमार थे। उनकी एक सुन्दर पत्नी थी……’’
‘‘तुम्हारी जैसी, माँ?’’ बेटे ने बीच में टोका।
‘‘ऐसा ही समझ ले। उनका तेरे जैसा एक चाँद–सा बेटा था। सब–कुछ होते हुए भी सिद्धार्थ सांसारिक दु:खों को देखकर बहुत उदासी में रहते थे। इसलिए एक रात अपनी पत्नी और बेटे को सोते छोड़कर वन की ओर चले गए…..संन्यासी हो गए…..’’
परन्तु माँ ! वह तो कपिलवस्तु के राजकुमार थे…..खूब धन–दौलत के मालिक!’’
‘‘तो?’’
‘‘पिताजी तो कहीं के राजकुमार नहीं थे। उनके घर में तो मुश्किल से दो जून का खाना पकता था। फिर वह क्यों चले गए?’’
‘‘लगता है बेटे, दोनों ही दु:खों से डर गए।’’ कहते हुए माँ ने मशीन के रिंग पर उँगलियाँ रखकर उसे घुमा दिया ।
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4-दया

दसवीं क्लास का हिंदी का अध्यापक, जो अपने सादे रहन–सहन, उच्च आचरण और दयाभाव के लिए स्कूल–भर में विख्यात था, नई क्लास को संबोधित कर रहा था, ‘‘जीवन में सादे रहन–सहन और उच्च आचरण से दयाभाव का महत्त्व कहीं ज्यादा है। असल में जिसमें दया–भाव नहीं है, वह आदमी कहलाने का हकदार नहीं है। राजकुमार गौतम एक दिन घूमते हुए दूर तक निकल गए। एक जगह एक मछुआरा मछलियों को जाल में फाँसकर किनारे पर रखे बर्तन में फेंक रहा था। राजकुमार कुछ पल मछुआरे द्वारा पकड़ी गई मछलियों को, जो पानी में तड़प रही थीं, देखते रहे, फिर मछुआरे से पूछा, ‘इन मछलियों का क्या करोगे?’
मछुआरे ने जवाब दिया, ‘बाजार में बेचूँगा।’
‘कितने की बिक जाएँगी?’
‘यही कोई चार या पाँच रुपए की।’
‘‘राजकुमार ने अपने सोने की अंगूठी मछुआरे को देकर सारी मछलियाँ ले लीं और उन्हें दोबारा पानी में फेंक दिया। राजकुमार के दयाभाव से हमें सीख लेनी चाहिए।’’
एक लड़का उठा।
‘‘कुछ कहना चाहते हो?’’
‘‘हाँ,श्रीमान!’’
‘‘कहो।’’
‘‘मैं एक मछुआरे का बेटा हूँ। मेरा बाप हर रोज़ मछलियाँ पकड़कर बाजार में बेचता है। लगभग हर रोज कुछ मछलियाँ बच जाती हैं और दूसरी सब्जी की जगह मछली ही खानी पड़ती है। जब मछलियों को छीला जाता है तो मेरे मन को कुछ होने लगता है। कल रात मैंने खाना खाने से इन्कार कर दिया। मैंने मछली की बजाय किसी दूसरी सब्जी की माँग की, परन्तु मेरे माँ–बाप ने मेरी प्रार्थना पर कोई ध्यान न दिया और उल्टे डाँट दिया। मैं भूखा ही सो गया। आधी रात को मेरी नींद खुली। मुझे बेहद भूख लगी थी। ऐसा लग रहा था कि अगर मैंने खाना न खाया तो प्राण निकल जाएँगे। मेरे लिए उन मछलियों को खाने के सिवा कोई चारा न था।’’ लड़के का कंठ भारी हो गया अध्यापक की ओर रुआँसी आँखों से देखा।
अध्यापक ने लड़के द्वारा कही गई सच्चाई पर सोचा। फिर अपनी मोटी–मोटी किताबों को बगल में दबाए लड़के के पास आया और उसके कंधे को थपथपाकर कक्षा से बाहर हो गया।
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5-कील
सड़क के बीच एक कील पड़ी है।
तेज़ी के साथ एक युवक साइकिल पर आया। उसकी निगाह कील पर पड़ी। झटपट हैंडल घुमाकर वह अपनी मुस्तैदी पर मुस्कराया कि उसने साइकिल का टायर पंचर होने से बचा लिया है।
घिसे हुए जूते में कोई चीज चुभी है। बूढ़े ने गर्दन झुकाकर नीचे की ओर देखा–एक कील है। मुँह बिचकाकर वह आगे निकल गया।
फिर आगे–पीछे दौड़ते हुए दो लड़के आए। आगेवाले लड़के ने उछलकर अपने पाँव को छलनी होने से बचा लिया। दूसरे ने पूछा, ‘उछले क्यों?’’ पहले वाले ने कील की ओर इशारा कर दिया। साथ ही जख्मी होने से बच जाने की खुशी में किलकारी भर दी। दूसरा भी उसकी होशियारी पर खुश हो गया।
कील अब भी सड़क पर पड़ी है।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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