नवम्बर -2018

देशनरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’ की लघुकथाएँ     Posted: March 1, 2016

1.साम्राज्यवाद

मैं सुबह टहलने के उदेदश्य से लॉन की ओर बढ़ा। मेरा पालतू एलसेशियन कुत्ता भी दुम हिलाता मेरे साथ–साथ चल पड़ा। मार्ग में कुछ निर्बल रोगग्रस्त कुत्ते भी नजर आए। उन्हें देखकर मेरे कुत्ते ने उनपर गुर्राना शुरू किया। वे दुम दबा कर भागे। एक–कुत्ता दीन–हीन हालत में सड़क किनारे गरदन झुकाए बैठा था। मेरे कुत्ते ने उस पर आक्रमण कर दिया। उस दीन–हीन कुत्ते ने भी उसका जमकर मुकाबला किया। मुकाबले में दीन कुत्ता यद्यपि विशेष जख्मी हुआ। किन्तु उसने अपने साहस के बल पर मेरे कुत्ते को भी घायल कर दिया। मेरा कुत्ता उसकी ओर उपेक्षा की दृष्टि से देखते हुए भाग कर मेरे पास चला आया। और उधर सड़क पर एक हॉकर अखबार लिए चिल्ला रहा था–एक महत्त्वपूर्ण समाचार–‘साम्राज्यवादी नीति से निकारागुआ जख्मी!’
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2.प्रवेश–निषेध

साहब ने जैसे ही घण्टी बजाई कि चपरासी सतर्क हो गया। साहब का आदेश पाते ही दफ्तर के किरानीबाबू को उनके पास ले आया। साहब ने फाइल पर से अपनी दृष्टि उठाते हुए कहा, ‘‘सुरेश बाबू ! आपने यह सब क्या अण्ट–शण्ट लिख डाला है?’’
सुरेश बाबू अकचकाए,’जी! क्या लिख दिया स्सर?’
‘आपने लिखा है कि मेसर्स मल्होत्रा की दरें कम हैं ;लेकिन, अन्य कोटेशन जानी मानी फर्मों के मालूम पड़ते हैं। साहब ने भौंहे टेढ़ी करते हुए फिर कहा, ‘‘क्या आप सी.आई.डी. इस्पेक्टर हैं या दारोगा, जो आपने जाँच–रिपोर्ट पेश कर दी है?’’
‘‘नहीं सर! मुझे ऐसा लगा था’’, दबी जुबान में सुरेश बाबू ने कहा।
साहब का तेवर बदला,‘‘आप का लगना जाए भाड़ में। आपको अगर लिखना नहीं आता, तो कम–से–कम मुझसे परामर्श ही कर लेते हैं? भला नोट इस तरह से लिखा जाता है?’’
‘‘स्सर! आप कहें तो मैं इसे बदल दूँ?’’
‘‘ठीक है! मैं ही लिखवा देता हूँ। फ़्रेश नोट–शीट ले लीजिए।
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3.आत्महत्या

उसकी उम्र लगभग पच्चीस वर्ष रही होगी। उसकी शादी हो चुकी थी। दो–बच्चे भी थे। नौकरी की तलाश में भटकते हुए उनकी चप्पले घिस चुकी थी;किन्तु, वह कहीं भरे सफल नहीं हो सका। थका–हारा जब र लौटता तो भूखे बच्चों का रोना–चिल्लाना उससे देखा नहीं जाता। आज भी वह नौकरी के अन्तिम प्रयास में जब असफल रहा तो उसका रहा–सहा धैर्य भी समाप्त हो गया। उसने इस जीवन से ऊब आत्महत्या करने की ठान ली। पटना जं. रेलवे स्टेशन के निकटस्थ सिगनल के पास खड़ा होकर वह गाड़ी आने की प्रतीक्षा करने लगा। संयोगवश, उसी समय अप लाइन की गाड़ी आती दीख पड़ी। उसने चलती गाड़ी के बीच कूदने की ठान ली। किन्तु, जब गाड़ी निकट पहुँची तो उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। हताश–निराश वह घर लौट आया।
दूसरे दिन प्रात: प्रतिदिन की भाँति घर से चला। पत्नी ने समझा नित्य की भाँति आज भी वह नौकरी की तलाश में जा रहा है। घर से निकलते समय उसने बच्चें को भरपूर प्यार किया। आज उसने जीवन–लीला समाप्त कर देने की ठान ही ली थी। वह चिरैयाटाँड़ रेलवे पुल पर चढ़गकर रेल के आने की प्रतीक्षा करने लगा। प्रात: दस बजे के करीब पैसिंजर गाड़ी ने स्टेशन छोड़ने की सीटी दी। वह सतर्क हो गाय। गाड़ी के छुटते ही वह पुल की रेलिंग के किनारे खड़ा हो गया। रेल का इंजन पुल के करीब पहुँचने वाला था। एक–दो मिनट उधेड़–बुन में व्यतीत हुए। अन्त में हिम्मत बाँध कर वह पुल से कूद पड़ा। किन्तु, तब तक इज्जन पुल के अन्दर प्रवेश कर चुका था। वह सीधा रेल के डिब्बे की छत पर गिरा। उसके गिरते ही हो–हल्ला मचा। गाड़ी रुक गई। रेलवे पुलिस भी भागती हुई आ पहुँची। वह डिब्बे की छत से लुढ़कता हुआ नीचे आ गिरा था। उसके घुटने फूट गए थे। सिर में भी काफी चोट आई थी।
पुलिस ने उसे आत्महत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
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4.कानून

केवल बूटों की आवाज गूँजती है।
वातावरण में मुर्दनी छाई है। सभी दरवाजे बन्द है। शहर में कर्फ़्यू के साथ ‘शूट एट साइट’ का आदेश जारी है। पुलिस की गश्ती–गाडि़याँ बन्दूक–धारियों के साथ हर ओर घूम रही है। पक्षी तक चहकने की हिम्मत खो चुके है। तभी पाँच–वर्षीय बालक उत्सुकतावश अपने घर की खिड़की खोलकर गली में झाँकता है।
धाँय! की आवाज के साथ एक गोली उस बालक का सीना चीरते हुए पार निकल जाती है। उसकी आँखें खुली–की–खुली रह जाती है…..
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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