नवम्बर -2018

देशकाले अँगूर     Posted: June 1, 2016

“ऐसे बिस्तर पर कब तक पड़े रहोगे , जाकर डॉक्टर को क्यों नहीं दिखा आते?” वह चूल्हे पर पतीली चढ़ाते हुए बोली।
“पल्ले पैसा नहीं है, फेरी लगाये भी चार दिन हो गए। कुछ पैसा कमाऊँ तो डॉक्टर के पास जाऊँ।” वह थोड़ा खीझते हुए बोला।
साड़ी के पल्लू में लगी गाँठ खोलकर वह कुछ नोट उसकी ओर बढाती हुई बोली, ” शरीर नहीं चलेगा तो गुजर-बसर भी दूभर हो जाएगा। अब जाकर दिखा आओ।”
उसने चारपाई से उठकर साइकिल बाहर निकाला ही था कि उसका बेटा भी साथ जाने की जिद्द करने लगा। उसने बेटे को साइकिल पर आगे बिठाया और डॉक्टर को दिखाने निकल पड़ा।
क्लीनिक पर डेढ़ सौ रुपये फीस भर, वह हाथ में पर्ची थामे डॉक्टर के केबिन में दाखिल हुआ। डॉक्टर ने उसे चेक किया और बोला,  ” भईया, ये दवाइयाँ ले लेना। और हाँ, तुम्हारा ब्लड प्रेशर बहुत कम है, पहले जाकर एक गिलास जूस पियो वरना बिस्तर से उठना मुश्किल हो जाएगा।”
वह क्लीनिक से बाहर निकल आया। कमजोरी के कारण वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। उसने साइकिल उठाई और जूस की दुकान की और बढ़ गया। जूस की दुकान तक पहुँचते-पहुँचते उसकी साँस फूल गई थी। उसने दुकान के सामने  साइकिल रोक दी। दुकान में पड़े काले अंगूरों को देखकर उसका बेटा बोला, ” पापा,पापा काले अंगूर खाने हैं!”
उसने जेब में हाथ डाला तो दस-दस के तीन सिकुड़े हुए नोट हाथ लगे। ” बेटे,  आज पैसे नहीं है, फिर ले लेंगे।” बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए वह बोला।
“ठीक है पापा!” बच्चा दबी आवाज में बोला और चुपचाप उसका हाथ पकड़कर खड़ा हो गया। उसने एक नजर ‘चर्र-चर्र’ करती जूस की मशीन पर डाली और फिर बच्चे की ओर देखा। वह अभी भी काले अंगूरों को देख रहा था। जेब से पैसे निकालकर वह दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए बोला, “भईया, एक पाव काले अंगूर देना।”
उसने बच्चे के हाथ में अंगूर का लिफाफा थमाया और साइकिल को पैदल ही खींचते हुए घर को चल  दिया।
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