नवम्बर -2018

देशसपनों का दरवाजा     Posted: July 1, 2016

हादसा कई साल पहले हुआ था। उसे और उसके जैसों को घाटी से बहुत पहले खदेड़ दिया गया था।
कहा गया ; ” हमारे साथ मिल जाओ, मर जाओ ,या भाग जाओ।”
वे खुले दरो दीवार छोड़कर भाग खडे हुए थे। इस आसरे में कि फिर कभी लौटेंगे।
लेकिन फोटो जर्नलिस्ट प्रतीक को  यह सपने का फोटो लगता था जो शायद ही कभी साकार हो ।
सरकार ,बुद्धिजीवी , निरपेक्षवादी सभी उदासीन थे।
सबकी उदासीनता के बाबजूद प्रतीक इन उजाड़ों  की  तस्वीरें अपने अखबार मे छापता  रहता था , वह ध्वस्त मंदिर ,तबाह घर ,डरी हुई बहू बेटियाँ , घर छोड़कर भागते पंडित ,जिन्हे आतंकियो ने रौंद डाला था ।जिसकी एक भी तस्वीर बह ठीक से नहीं खीच पाया था ।जब तक कैमरा फोकस करता ,लोगो की भगदड़ में दृश्य अदृश्य हो जाता था।
फिर भी एक फोटो आखिर उसने ले ही ली थी। वह एक सनकी पंडित की थी ,जो कह रहा था यदि हमें हमारा घर नहीं मिला ,तो मैं झेलम में जल समाधि ले लूँगा ,और इसके बाद वह गले में एक बड़ा सा पत्थर बाँधकर नाव में रहने लगा था। एक दिन नींद के झोंके में वह बाकई झेलम में गिर गया ।पत्थर के कारण  झील की तलहटी में बैठने लगा, उसने झट से पत्थर खोल कर फेंक दिया और तैर कर ऊपर आ गया ,फिर उसके गले का बड़ा- सा पत्थर छोटा होते -होते तावीज़ बन गया ।
अब वह तावीज़ छू -छूकर अपनी कसम दोहराता है ।
फोटो जर्नलिस्ट प्रतीक आज भी कभी कभी अपने अखबार में उस कसमिया तावीज़ का फोटो छापता है ,तो कभी अपनों की बाट जोहते उन खुले दरवाजों का।
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