अक्तूबर -2018

देशसंवेदना     Posted: September 1, 2016

जनवरी का महीना था । कड़ाके की सर्दी से खून नसों में जमा जा रहा था  । न्यू ऑफिसर कॉलोनी के बड़े से गेट के पास बनी पोस्ट में ड्यूटी पर तैनात  कांस्टेबल बीच-बीच में उठकर गश्त लगा आता। रात गहरा रही थी और रजाइयों में दुबके पड़े कॉलोनी वासियों को नींद  अपने आगोश में लिए थी । दूर-पास से आती कुत्तों के भोंकने की आवाज बीच-बीच में सन्नाटे को तोड़ रही थी । इन सब के बीच कांस्टेबल की नजर पार्क में बनी छतरीनुमा छत के नीचे बेंच पर लेटे एक व्यक्ति पर पड़ी । झींगुरों की आवाज के बीच ””””टक-टक”””” करते उसके कदम उसके पास जाकर ठहर गए । बेंच पर, खुद को फ़टे से कम्बल में लपेटे बड़ी- बड़ी उलझी दाढ़ी, चीकट बाल और मैले-कुचैले कपड़ों वाला एक भिखारीनुमा व्यक्ति अधलेटा -सा पड़ा था । वह बेंच पर डंडा बजाते हुए गरजा :

” चलो उठो यहाँ से । इधर सोना मना है ।”

वह हड़बड़ा कर उठा । हाथ में डंडा थामे खाकी वर्दीधारी को देख वह बिना कुछ कहे वहाँ से खिसक गया ।

दूसरी रात भी  वह व्यक्ति उसी बेंच पर लेटा था । उसके पास जाकर कांस्टेबल कड़क अंदाज में बोला :

“चलो उठो यहाँ से । कल बात समझ नहीं आई थी ? कोई पियक्कड़ मालूम पड़ते हो ?”

“साहब , पियक्कड़ नहीं, बेघर हूँ । ठण्डी ज्यादा थी तो ….।”

वह इससे ज्यादा नहीं कह पाया और शरीर को कम्बल से ढाँप पाँव घसीटता हुआ वहाँ से चला गया ।

अगली रात दाँत किटकिटाने वाली ठण्ड थी।  बर्फीली हवा शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी । गश्त लगाते कांस्टेबल की नजर फिर से उस भिखारीनुमा व्यक्ति पर पड़ी ,जो बेंच पर गठरी बना लेटा था । वह एक क्षण के लिए उस ओर मुड़ा;  पर कुछ सोचकर उसके पाँव वहीं ठिठक गए । वह उस तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और कुछ देर पहले  सड़क किनारे सुलगाए अलाव पर हाथ सेंकने लगा ।

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