अक्तूबर -2018

देशप्रदूषण     Posted: January 1, 2017

 वे पर्यावरण प्रदूषण से काफी चिंतित रहा करते हैं और इस समस्या का अपने भाषणों में अक्सर ज़िक्र surendr-vermaकरते हैं। यूँ तो प्रदूषण के कई क्षेत्र हैं किन्तु वे मुख्यत: वायु प्रदूषण से कुछ अधिक ही संवेदनशील हो गए हैं। वे बताते हैं की एक बार वे नई-दिल्ली की स्टेशन पर प्लेटफार्म पर ट्रेन के इंतज़ार में बैठे थे। वहाँ की हवा इतनी ज़्यादा दूषित थी कि उनकी आँखों में जलन होने लगी। बाद में उन्हें कई सप्ताह तक आँखों का इलाज कराना पडा था।

उस रोज़ वे मेरे साथ विश्वविद्यालय जा रहे थे। कार तो मेरी थी किन्तु ड्राइविंग-सीट पर वे ही बैठे थे। रास्ते में उन्हें एक पैट्रोल-पम्प दिखा जहां कारों के लिए प्रदूषण प्रमाणपत्र बन रहा था। बोले आपके लिए नया प्रमाण पत्र बनवा लेता हूँ। आजकल चैकिंग कुछ अधिक ही बढ़ गई है। पकड़ लिए गए तो अंधाधुंध फाइन लगा देते हैं … और उन्होंने प्रमाणपत्र बनाने वाले बाबू के सामने गाड़ी खड़ी कर दी। कागज़ात दिखाने के बाद बाबू ने प्रमाणपत्र जारी कर दिया। वे बोले, भई, मेरी गाड़ी  के लिए भी एक ऐसा ही प्रमाणपत्र चाहिए। ‘बन जाएगा हुज़ूर, नंबर बताइए।’ गाड़ी का न. बताया गया और प्रमाणपत्र हाज़िर। मैं हैरान। गाड़ी का परीक्षण किए बिना ही, यहाँ तक कि कार की शक्ल देखे बिना ही ये प्रमाणपत्र कैसे बन गए?

लौटते वक्त उन्होंने मुझे इसका राज़ बताया। बोले, आपने ध्यान नहीं दिया, हर प्रमाणपत्र के लिए मैंने उसे 200-200 रुपये अधिक दिए हैं। बनाता कैसे नही? मनी मेक्स द मेयर गो। और ज़रा यह भी तो देखिए, प्रमाण पत्र पर कोई डेट-वेट नहीं पड़ी है। ताकि आप इसका जब चाहें तब इस्तेमाल कर लें। आगे प्रमाणपत्र बनवाने की अब ज़रुरत ही नहीं है।

एन्वारनमेंट-स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर को, जिनकी दिल्ली के प्लेटफार्म पर वायु प्रदूषण से आँखों में परेशानी हो गई थी, मैं सलाम किए बिना नहीं रह सका।

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