अक्तूबर -2018

देशमुखौटे     Posted: January 2, 2017

“तुम्हारी तस्वीर  बहुत प्यारी है,ख़ास  कर वो  छोटी लाल ड्रेस वाली।क्या तुम्हारे घर वाले तुम्हे ऐसे कपड़े  001-%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%beपहनने से मना नहीं करतें?”,निशा ने यामिनी से पूछा।

“धन्यवाद,दरअसल मैं अकेली हूँ,मेरे घर में कोई नहीं है।मैं यहाँ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सेक्रेटरी हूँ।वैसे तुम भी कम प्यारी नहीं हो।उस पार्टी वाले पिक में तो गजब ही ढा रही हो।आज  अपनी एक अकेली पिक लगाओ ना”, यामिनी ने इसरार किया।

हाय -हेल्लो  से शुरू हुई निशा और यामिनी की दोस्ती दिनों -दिन गहराने लगीं थी।दोनों एक दूसरे से अपनी दिल की बातें शेयर करती,सुख-दु:ख साझा करती ।उन्हीं दिनों बातों-बातों  में मालूम हुआ कि निशा के पापा का देहांत हो गया है और वह बिलकुल अकेली हो गई है।उसे यामिनी के कंधे की बेहद जरूरत थी ,जहाँ वह सर रखकर अपना दुःख हल्का करती। यामिनी भी अपनी सखी से मिलने  को बेचैन थी। आभासी दुनिया से निकलकर असलियत का जामा पहनाने को दोनों दोस्त बेचैन हो उठीं । एक पार्क में,एक खास पेड़ के नीचे मिलने की जगह और समय निश्चित किए गए। चित्र से तो दोनों ही एक दूसरे को  पहचानती ही थीं।नियत समय पर दोनों पूर्व निर्धारित स्थल पर गईं।पर न निशा को यामिनी मिली और न यामिनी को निशा।अलबत्ता दो लड़के बड़ी देर तक उस पेड़ के आसपास मँडरातें रहें और यहाँ -वहाँ बिखरें कुछ मुखौटों के राज़ बेनक़ाब होते रहे ।

-0-रीता गुप्ता,द्वारा श्री बी के  गुप्ता फ़्लैट नं 5, मन्जूषा बील्डिंग, नीयर इन्डियन स्कूल एस ई सी एल रोड, छोटे अतरमुडा रायगढ़ छत्तीसगढ़-496001 

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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