अक्तूबर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: February 1, 2018

1-तोहफ़ा

डोरबेल बजी जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाये “इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ़ देती है।” दरवाज़ा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफा पकड़ा गया।
लिफ़ाफे पर बड़े अक्षरों में लिखा था ‘वृद्धाश्रम’।
रुंधे गले से आवाज़ दी-“सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाडले ने क्या हसीन तोहफ़ा भेजा है!”
रसोई से आँचल से हाथ पोछती हुई दौड़ी आई – “ऐसा क्या भेजा मेरे बच्चे ने जो तुम्हारी आवाज भर्रा रही है। दादी बनने की ख़बर है क्या?”
“नहीं, अनाथ!”
“क्या बकबक करते हो, ले आओ मुझे दो। तुम कभी उससे खुश रहे क्या!”
“वृद्धss शब्द पढ़ते ही कटी हुई डाल की तरह पास पड़ी मूविंग चेयर पर गिर पड़ी।
“कैसे तकलीफों को सहकर पाला-पोसा, महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाया। खुद का जीवन अभावों में रहते हुए इस एक कमरे में बिता दिया।” कहकर रोने लगी
दोनों के बीते जीवन के घाव उभर  आए  और बेटे ने इतना बड़ा लिफ़ाफा भेजकर उन रिसते घावों पर अपने हाथों से जैसे नमक रगड़ दिया हो।

दरवाज़े की घण्टी फिर बजी। खोलकर देखा तो पड़ोसी थे।
“क्या हुआ भाभी जी ? आप फ़ोन नहीं उठा रहीं है। आपके बेटे का फोन था। कह रहा था अंकल जाकर देखिये जरा।”
“उसे चिन्ता करने की जरूरत है!” चेहरे की झुर्रियां गहरी हों गयी।
“अरे इतना घबराया था वह, और आप इस तरह। आँखे भी सूजी हुई हैं। क्या हुआ?”
“क्या बोलू श्याम, देखो बेटे ने..” मेज पर पड़ा लिफ़ाफा और पत्र की ओर इशारा कर दिया।

श्याम पोस्टकार्ड बोलकर पढ़ने लगा। लिफ़ाफे में पता और टिकट दोनों भेज रहा हूँ। जल्दी आ जाइये। हमने उस घर का सौदा कर दिया है।”

सुनकर झर-झर आँसू बहें जा रहें थे। पढ़ते हुए श्याम की भी आँखे नम हो गई। बुदबुदाये “इतना नालायक तो नहीं था बब्बू!”
रामसिंह के कन्धे पर हाथ रख दिलासा देते हुए बोले- “तेरे दोस्त का घर भी तेरा ही है। हम दोनों अकेले बोर हो जाते हैं। साथ मिल जाएगा हम दोनों को भी।”
कहते कहते लिफ़ाफा उठाकर खोल लिया। खोलते ही देखा – रिहाइशी एरिया में खूबसूरत विला का चित्र था, कई तस्वीरों में एक फोटो को देख रुक गए । दरवाजे पर नेमप्लेट थी सिंहसरोजा विला। हा हा जोर से हँस पड़े।

“श्याम तू मेरी बेबसी पर हँस रहा है!”

“हँसते हुए श्याम बोले- “नहीं यारा, तेरे बेटे के मज़ाक पर । शुरू से शरारती था वह।”
“मज़ाक..!”
“देख जवानी में भी उसकी शरारत नहीं गयी। कमबख्त ने तुम्हारे बाल्टी भर आँसुओं को फ़ालतु में ही बहवा दिया।” कहते हुए दरवाजे वाला चित्र रामसिंह के हाथ मे दे दिया।
चित्र देखा तो आँखे डबडबा आईं।
नीचे नोट में लिखा था- “बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।”
पढ़कर रामसिंह और उनकी पत्नी सरोजा के आँखों से झर-झर आँसू एक बार फिर बह निकलें ।
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2-पछतावा

‘‘बाबा, आप अकेले यहाँ क्यों बैठे हैं? चलिए आपको आपके घर छोड़ दूँ।’’

बुजुर्ग बोले, ‘‘बेटा जुग जुग जियो। तुम्हारे माँ-बाप का समय बड़ा अच्छा जाएगा। और तुम्हारा समय तो बहुत ही सुखमय होगा।’’

‘‘आप ज्योतिषी हैं क्या बाबा?’’

हँसते हुए बाबा बोले, ‘‘समय ज्योतिषी बना देता है। गैरों के लिए जो इतनी चिंता रखे, वह संस्कारी व्यक्ति दुखी कभी नहीं होता’’ आशीष में दोनों हाथ उठ गए उनके फिर से।

‘‘मतलब बाबा? मैं समझा नहीं।’’

‘‘मतलब बेटा मेरा समय आ गया। अपने माँ-बाप के समय में मैं समझा नहीं कि मेरा भी एक-न-एक दिन तो यही समय आएगा, समझा होता तो ये समय नहीं आता।’’ नजरें धरती पर गड़ा दीं कहकर।

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3-परिपाटी

अपनी बहन की शादी में खींची गई उस अनजान लड़की की तस्वीर को नीलेश जब भी निहारता, तो सारा दृश्य आँखों के सामने यूँ आ खड़ा होता, जैसे दो साल पहले की नहीं, कुछ पल पहले की ही बात हो।

वह भयभीत-सी इधर-उधर देखती फिर सबकी नजर बचाकर चूड़ियों पर उँगलियाँ फेरकर खनका देती। चूड़ियों की खनक सुनकर बच्चियों-सी मुस्कुराती फिर फौरन सहम कर गम्भीरता ओढ़ लेती। सोचते-सोचते नीलेश मुस्कुरा दिया।

वहीं से गुजरती भाभी ने उसे यूँ एकान्त में मुस्कराते देखा तो पीछे पड़ गईं, ‘‘किसकी तस्वीर है? कौन है यह?’’ उनके लाख कुरेदने पर नीलेश शर्माते हुए इतना ही बोल पाया, ‘‘भाभी हो सके तो इसे खोज लाओ बस, एहसान होगा आपका!’’

फिर क्या था! भाभी ने लड़की की तस्वीर ले ली और उसे ढूँढ़ना अपना सबसे अहम टारगेट बना लिया। आज जैसे ही नीलेश घर वापस आया, भाभी ने उस लड़की की तस्वीर उसे वापस थमा दी, और उससे आँखें चुराती हुई बुदबुदाईं, “भूल जा इसे। इस खिलखिलाते चेहरे के पीछे सदा उदासी बिखरी रहती है, नीलेश!’’

‘‘क्या हुआ भाभी, ऐसा क्यों कह रहीं हैं आप!!’’ मुकेश ने पूछा तो आसपास घर के अन्य सदस्य भी आ गए।

‘‘यह लड़की मेरे बुआ के गाँव की है। उसकी शादी हो चुकी है, पर अफसोस उसका पति सियाचिन बॉर्डर पर शहीद हो चुका है।’’ भाभी ने बताया। सबने देखा कि नीलेश भाभी के आगे हाथ जोड़कर,गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘भाभी इस लड़की के साथ मैं अपनी मुस्कुराहट साझा करना चाहता हूँ। प्लीज कुछ करिए आप!’’

नीलेश की यह बात सुनते ही परिजन सकते में आ गए।

‘‘मेरी सात पुश्तों में किसी ने विधवा से शादी करने का सोचा तक नहीं, फिर भले वह विधुर ही क्यों न रहा हो! तू तो अभी कुँवारा ही है! अबे! तू विधवा को घर लाएगा….? कुल की परिपाटी तोड़ेगा……,नालायक?’’ पिता जी फौरन कड़कते हुए नीलेश को मारने दौड़े। बीच-बचाव में माँ, पिता को शान्त कराने के चककर में अपना सिर पकड़कर फर्श पर ही बैठ गईं।

पिता जी अभी शान्त भी न हुए थे कि अब बड़ा भाई  शुरू हो गया, ‘‘अरे छोटे! तेरे लिए छोकरियों की लाइन लगा दूँगा। इसे तो तू भूल ही जा।’’

विरोध के चौतरफा बवंडर के बावजूद नीलेश अडिग रहा। उसने रंगबिरंगी चूड़ियों में समाई उस लड़की की मुस्कान वापस लौटाने की जो ठान ली थी। इस हो-हल्ले में माँ ने जब अपने दुलारे नीलेश को अकेला पड़ता पाया ,तो उन्होंने नीलेश की कलाई पकड़ी ओैर अपने कमरे की तरफ उसे साथ में लेकर बढ़ चलीं ओर धीमी आवाज में बोलीं, ‘‘रंगबिरंगी नहीं, मूरख! लाल-लाल चूड़ियाँ लेना! हमारे यहाँ सुहागनें लाल चूड़ियाँ ही पहनती हैं। कुल की परिपाटी तोड़ेगा क्या नालायक!’’

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4-उपाय

माँ मना करती रही कि घर में कैक्टस नहीं लगाया जाता। किन्तु सुशील बात कब सुनता माँ की। न जाने कितने जतन से दुर्लभ प्रजाति के कैक्टस के पौधे लगाए थे। आज अचानक उसे बरामदे में लगे कैक्टस को काटते देख रामलाल बोले, ‘‘अब क्यों काटकर फेंक रहा है? तू तो कहता था कि इन कैक्टस में सुंदर फूल उगते हैं? वो खूबसूरत फूल मैं भी देखना चाहता था।’’

‘‘हाँ बाबूजी, कहता था, पर फूल आने में समय लगता है, परन्तु काँटे साथ-साथ ही रहते। आज नष्ट कर दूँगा इनको!’’

‘‘मगर क्यों बेटा?’’

‘‘क्योंकि बाबूजी, आपके पोते को इन कैक्टस के काँटों से चोट पहुँची है।’’

‘‘ओह, तब तो समाप्त ही कर दो ! पर बेटा इसने अंदर तक जड़ पकड़ ली है! ऊपर से काटने से कोई फायदा नहीं!’’

‘‘तो फिर क्या करूँ?’’

‘‘इसके लिए पूरी की पूरी मिट्टी बदलनी पड़ेगी। और तो और ,इन्हें जहाँ कहीं भी फेंकोगे ये वहीं जड़ें जमा लेंगे।’

‘‘मतलब इनसे छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं?’’

‘‘है क्यों नहीं…..’’ कहकर कहीं खो से गए।

‘‘बताइए बाबूजी, चुप क्यों हो गए?’’

‘‘तू अपनी दस बारह साल पीछे की ज़िन्दगी याद कर!’’

माँ के मन में उसने न जाने कितनी बार काँटे चुभोए थे। अपनी जवानी के दिनों की बेहूदी हरकतों को यादकर शर्मिंदा हुआ। माँ भी तो शायद चाहती थी कि ये काँटे उसके बच्चों को न चुभें।

‘‘मैंने तुझे संस्कार की धूप में तपाया, तू इन्हें सूरज की तेज़ धूप में तपा दे।’’ उसकी ओर गर्व से देख पिता मुस्कुराकर बोले।

फिर वह तेजी से कैक्टस की जड़ें खोदने लगा।

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5-अमानत

माँ को मरे पाँच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली ,तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठाकर उसके पीछे की कहानी बताते जा रहे थे।

जंजीर उठाकर पापा हँसते हुए बोले, ‘‘तुम्हारी माँ ने मेरे से छुपाकर यह जंजीर पड़ोसी के साथ जाकर बनवाई थी’’

‘‘आपसे चोरी !पर इतना रुपया कहाँ से आया था?’’

‘‘तब इतना महँगा सोना कहाँ था! एक हज़ार रुपए तोला मिलता था। मेरी जेब से रुपए निकालकर इकट्ठा करती रहती थी तेरी माँ। उसे लगता था कि मुझे इसका पता नहीं चलता;किन्तु उसकी खुशी के लिए मैं अनजान बना रहता था। बहुत छुपाई थी यह जंजीर मुझसे, पर कोई चीज छुपी रह सकती है क्या भला!’’

तभी श्रुति की नज़र बड़े से झुमके पर गई, ‘‘पापा,मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या?’’ आश्चर्य से झुमके को हथेलियों के बीच लेकर बोली।

‘‘ये झुमका! ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज़ तो पसन्द ही नहीं करती थी, फिर ये कैसे इस बॉक्स में सोने के गहनों के बीच रखी है।’’

‘‘इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही है, पापा!’’

‘‘कभी पहने तो उसे मैंने नहीं देखा। और वह इतल-पीतल खरीदती नहीं थी कभी।’

तभी भाई ने, ‘‘पापा, लाइए सुनार को दिखा दूँगा’’ कहकर झुमका हाथ में ले लिया।

बड़े भाई की नज़र गई ,तो वह बोला, ‘‘हाँ लाइए पापा, कल जा रहा हूँ ,सुनार के यहाँ, दिखा लाऊँगा।’’

दोनों भाइयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग-अलग होकर अपनी चमक खो चुका था। दोनों बेटों की नज़र को भाँपने में पिता को देर नहीं लगी।

बिटिया के हाथ में सारे गहने देते हुए पिता ने झट से कहा, ‘‘बिटिया,बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जाएगी।’’

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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