अक्तूबर -2018

दस्तावेज़‘तीर्थ और पीक’     Posted: May 1, 2018

दस्तावेज
तीर्थ और पीक लघुकथा का पाठ डॉ शंकर पुणतांबेकर द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा
तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उस
विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-
‘तीर्थ और पीक’
पुजारी ने भक्ति-भाव से भगवान की पूजा की और हाथ में तीर्थ का पात्र ले मन्दिर के दरवाजे पर आया।
उसने सामने सूर्य भगवान को प्रणाम किया और पात्र का कुछ तीर्थ उँगलियों से उसकी ओर उड़ाया।
मन्दिर के ठीक सामने पुलिस थाना थाा। दोनों के बीच सड़क थी। संयोग ऐसा कि जिस समय पुजारी ने तीर्थ उड़ाया थानेदार सड़क पर था।
‘‘क्या है यह?’’ वह पुजारी पर दहाड़ा।
‘‘कुछ नहीं हुजूर, तीर्थ है।’’
‘‘अबे ऐ तीर्थ के बच्चे, थाना क्या तेरे बाप की जायदाद है जो उसकी दीवारें तू इस तरह खराब करता है।’’
‘‘पर मैंने तो तीर्थ सूर्य भगवान की ओर उड़ाया है हुजूर।’’
‘‘चुप रह। आइन्दा ख्याल रखना। नही ंतो कोठरी में बन्द कर दूँगा।’’
इतना कह थानेदार कुछ आगे बढ़ा और पिच्च से उसने मन्दिर की दीवार पर पान की पीक थूक दी।

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सतीशराज पुष्करणा
डॉ. पुणतांबेकर जी रचना मैं समझ नहीं पाया। यहाँ मैं एक बात और कहना चाहूँगा कि लघुकथा सुनकर उसपर तुरंत टिप्पणी करने से न्याय नहीं हो पा रहा है।
कारण यदि रचनाएँ भी सामने रहती तो ज्यादा सुविधा रहती ।
डॉ. स्वर्णकिरण
डॉ. शंकर पुणतांबेकर जी की लघुकथा ‘तीर्थ और पीक’। यहाँ तीर्थ से लघुकथा-लेखक का तात्पर्य यह है कि जलपात्र में जो जल है, भगवान की पूजा करने के बाद उसके छिड़क देने से पाप नष्ट हो जाते हैं, पवित्रता का संचार होता है। पुजारी उसी जल को सूर्य की ओर छिड़कता है और एक छींटा सड़क के ठीक सामने स्थित थाने के थानेदार पर पड़ जाता है।
थानेदार मन्दिर की दीवार पर पीक थूक देता है। पुलिस पर व्यंग्य किया गया है।
अशोक भाटिया
डॉ. पुणतांबेकर जी की लघुकथा पर एक बात कहना चाहूँगा डॉ. साहब की भाषा पर जबरदस्त पकड़ है। दूसरे वे विचार तत्त्व को हाथ से कभी जाने नहीं देते हैं और उनकी कोई भी रचना उठाकर देख लीजिए उनका जो वैचारिक, सैद्धांतिक आधार है, उनकी जो दृष्टि है, वह उसे कहीं भी गायब नहीं होने देते। सभी रचनाओं में से एक जैसी दृष्टि, सिद्धांत उभरते हैं इनमें आपको विरोधाभास नहीं मिलेगा।
डॉ. साहब मुझे माफ करेंगे, मुझे कई बार ऐसा लगता है कि इनकी लघुकथाओं से जो कथानक है। जैसे कथानक एक मिट्टी के समान है अगर मिट्टी को हाथ से ज्यादा मसल दे ंतो वह टूट-टूट कर बिखर जाती है। डॉ. साहब कथानक कई बार अपने शिल्प में इतना जबरदस्त जकड़ लेते हैं कि कथानक जो है वह पाठक तक पूरा नहीं पहुँच पाता है या उसका असर कम हो जाता है।
उमेश महादोषी
शंकर पुणतांबेकर जी की ‘तीर्थ और पीक’ के बारे में एक बात कहूँगा। आज विरोधाभास की स्थिति में बहुत लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। एक ही कथ्य को दोहराती, विरोधाभास की स्थिति को दर्शाती घिसी पिटी लघुकथाएँ बहुत ज्यादा दिखाई पड़ती हैं। इन लघुकथाओं का उद्देश्य सिर्फ एक विरोधाभास को उजागर करना मात्र होता है। कुछ ऐसा ही शंकर पुणतांबेकर जी की लघुकथा में भी है कि एक विरोधाभास ही लघुकथा का कथ्य बनकर रह गया है।
गम्भीर सिंह पालनी
पुणतांबेकर जी की लघुकथा ‘तीर्थ और पीक’ बहुत अच्छी लघुकथा के करीब पहुँचकर रह गई है। हमने पुणतांबेकर जी से बहुत सारी बातें सीखी हैं और हम उनके शिष्य समान हैं।
शंकर पुणतांबेकर
लघुकथा में बहुत कुछ एक घने रूप में ……बहुत ही कॉम्पेक्ट रूप में……बहुत ही साहसिक रूप में आपको अपनी बात कहनी होती है और उसके लिए उतने ही कॉम्पेक्ट प्रतीक…….‘‘तीर्थ’
एक प्रतीक है……और इसका आपको आकलन ही नहीं हुआ और ‘पीक’…….एक, आज की जो गलित पीक हैं, जो पीक निर्माण कर रहे हैं, जो गलित वर्ग के हैं। और वो जो तीर्थ हैं, जो पवित्र हैं, उसका जो निर्माण कर रहे हैं। यह पूरी समाज व्यवस्था जो है, उस दृष्टि से इसे देखा जाना चाहिए।
जगदीश कश्यप
‘तीर्थ और पीक’ के बारे में पुणतांबेकर जी ने स्वयं जो स्थिति बयान की है ,उससे ज्यादा कोई बता भी नहीं सकता है।

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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