अक्तूबर -2018

देशदहशत     Posted: June 1, 2018

सौ कि.मी. की रफ़्तार से कार दौड़ी जा रही थी! रवि का चेहरा एकदम तना हुआ था और रीना की भुनभुनाहट थी कि रुक ही नहीं रही थी – “आप भी न! जब गुस्से में आते हो तो सोचते ही नहीं हो, कुछ भी बोलते जाते हो! कितना कुछ सुना दिया बेचारे को! अरे! हो जाता है कभी-कभी, दिमाग़ साथ नहीं देता! कोई जानबूझकर तो पेपर ख़राब नहीं करता न! बेटा अट्ठारह वर्ष का हो रहा है, गर्म ख़ून है! भगवन न करे! कहीं कुछ उल्टा-सीधा कर बैठा तो…” कहते-कहते रीना की आवाज़ भर्रा गई, आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे! किसी अनिष्ट की आशंका से उसका दिल व्यथित हो रहा था! चलचित्र की तरह मन के पटल पर एक के बाद एक अख़बार की सुर्ख़ियाँ आती जा रही थीं –‘इम्तिहान में फ़ेल होने के कारण फलाँ बच्चे ने फाँसी लगा ली!’; ‘पिता की डाँट से आहत होकर फलाँ किशोर ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली!’; ‘निराशा में डूबकर युवक ने अपनी जान दे दी!’ … वह सिहर उठी, दहशत के मारे उसे कड़कती ठण्ड में भी पसीने छूट रहे थे!

उसने फिर से रिंकू को फ़ोन मिलाया मगर फ़ोन अभी भी स्विच ऑफ था! भागती हुई सड़क पर नज़रें गड़ाए हुए रवि ने कहा, “उसके दोस्तों को मिलाओ!”

“मिला चुकी! सब यही कह रहे हैं कि दोपहर तक तो दिखा था मगर उसके बाद पता नहीं!” बेचैनी भरे स्वर में रीना बोली! “पता नहीं क्या हुआ, कहाँ होगा मेरा बच्चा! हे भगवान! मेरे लाल की रक्षा करना!” आँसू पोंछते हुए रीना बुदबुदाई!

“अब तुम ये रोना-धोना बंद करो प्लीज़!” चिढ़कर रवि बोले, “कुछ नहीं होगा उसे, कहीं बिज़ी होगा अपने दोस्तों के साथ, सब एक जैसे हैं –लापरवाह!” उसे स्वयं पर भी गुस्सा आया! नाहक ही उसने आज सुबह रिंकू को डाँट दिया! मगर रिंकू को भी तो समझना चाहिए कि यदि जीवन में कुछ बनना है, तो आलस और आरामतलबी तो छोड़नी पड़ेगी! ये आजकल के बच्चे -बातें तो ऊँची-ऊँची करते हैं मगर मेहनत बिल्कुल नहीं करना चाहते! ऊपर से माँ-बाप कुछ कह दें तो तुरंत बुरा मान जाते हैं! बड़े से बड़ा क़दम उठाने में भी नहीं हिचकते –अजीब है ये पीढ़ी! न धैर्य न ही सहनशीलता!

कार हॉस्टल के सामने पहुँची ही थी कि सामने से रिंकू एक बैग लिए हुए आता दिखा! रीना दौड़कर उसके पास पहुँची और उससे लिपट गई! रिंकू अचकचा गया! वह हैरान था माँ के इस अप्रत्याशित व्यवहार से -“क्या हुआ मॉम? आप लोग यहाँ? सब ठीक तो है?” आश्चर्य से वह बोला!

“कहाँ था तू? फ़ोन भी ऑफ किया हुआ है! कितना परेशान हुए हम! कोई ऐसे बुरा मानता है, अपने माँ-बाप की बात का क्या? अब क्या हम तुझे डाँट भी नहीं सकते? इतना भी हक़ नहीं है हमारा क्या?…” रीना के सवालों की झड़ी को रोकते हुए रिंकू बोला, ‘ओफ़्फ़ोह! हुआ क्या आख़िर? मैं तो एक सेमिनार में गया था, इसलिए फ़ोन ऑफ था! अभी वहीं से वापस आ रहा हूँ! और मैंने ऐसा कब कहा? -आपको पूरा हक़ है, आप डाँटो भी, पिटाई भी करो मेरी …” हँसते हुए रिंकू आगे बोला, “और प्लीज़ मुझे छोड़ो तो, सब लोग देख रहे हैं!” रीना कुछ संभली और रिंकू से अलग होते हुए रुंधे गले से बोली, “तो..तो.. तूने पापा की डाँट का बुरा नहीं माना? और मुझे लगा …” इसके आगे रीना कुछ कह न सकी!

“बुरा? किस बात का बुरा?” हैरानी से रिंकू ने पापा की तरफ़ देखते हुए पूछा, जो नज़रें चुरा रहे थे! उसने उनकी डरी-सहमी आँखों में झाँका और आगे बढ़कर उनके गले लगकर बोला, “आय एम सॉरी पापा! आपका बेटा हूँ, कुछ ग़लत नहीं करूँगा! मुझपर भरोसा कीजिए!”

अब रवि ने अपनी डबडबाई आँखों को रिंकू से छिपाने की कोशिश न की और उसे अपनी बाहों में कस लिया!

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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