अक्तूबर -2018

मेरी पसन्ददीर्घजीवी लघुकथाएँ     Posted: July 1, 2018

  ग़ज़ल के बाद लघुकथा मेरी प्रिय विधा हैI मैं इस विधा का बहुत पुराना विद्यार्थी हूँI स्व० सतवंत कैंथ द्वारा लिखित पंजाबी भाषा का सर्वप्रथम एकल लघुकथा संग्रह ‘बर्फी दा टुकड़ा” वर्ष 1972 में प्रकाशित हुआ थाI इसका विमोचन मेरे गृह नगर पटियाला स्थित सेवक विद्यालय में हुआ था जोकि उसी मोहल्ले में स्थित था, जहाँ हम लोग रहते थेI 99 पैसे मूल्य की इस पुस्तक की एक प्रति मुझे भी दी गई थी I उस पुस्तक की छोटी-छोटी लघुकथाएँ पढ़कर पहले बार इस विधा से मेरा परिचय हुआ थाI सौभाग्य से आगे चलकर पटियाला के ही स्व० जगदीश अरमानी, स्व० अव्वल सरहदी तथा स्व० जगरूप सिंह दातेवास आदि से मेरा परिचय हुआ, जिन्होंने मुझे ग़ज़ल के साथ-साथ लघुकथा भी लिखने के लिए प्रेरित कियाI उसी दौर में श्री निरंजन बोहा जी का एक आलेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआI उनका कहना था कि संक्षिप्तता, सूक्ष्मता और संयम लघुकथा की तीन प्रमुख शर्ते हैंI इस बात ने  मेरे मन में घर कर लिया, अत: मुझे कोई भी लघुकथा पढ़ते हुए उसमे निहित सन्देश के अतिरिक्त इन तीन चीज़ों को ढूँढने की आदत हो गई हैI

            आकारगत संक्षिप्तता, सन्देशगत सूक्ष्मता और शिल्पगत संयम के अतिरिक्त मेरे लिए एक और महत्त्वपूर्ण कसौटी है, लघुकथा में ‘वैश्विक प्रभाव’ का होनाI खलील जिब्रान की लघुकथाएँ इसका सबसे सटीक उदाहरण हैI मेरा अनुभव है कि स्थानीय विषय, संस्कृति अथवा समस्याओं को लेकर कितनी ही उच्चकोटि की लघुकथाएँ अनूदित होने के बाद एक सीमित दायरे ही में सिमटकर रह जाती हैंI यदि कोई साहित्यिक कृति की आत्मा अनुवाद में ही उलझकर रह जाए, तो मेरी दृष्टि में वह अपना प्रभाव खो देती हैI शरद जोशी की ‘मैं वही भागीरथ हूँ’, हरभजन खेमकरनी की ‘चिकना घड़ा’, डॉ श्याम सुंदर दीप्ति की ‘हीर’, रतन सिंह की ‘उल्लू’ का अनुवाद यदि किसी विदेशी भाषा में किया जाए ,तो उनके अर्थ अनुवाद में ही खो जाएँगेI मेरा मानना है कि यदि अनुवाद होने के बाद भी किसी लघुकथा के मूल भाव अक्षुण्ण रूप में पाठकों तक पहुँच रहे हों ,तो यह सोने पर सुगन्ध जैसी बात है, और ऐसी ही लघुकथा मेरी दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ हैI हिंदी में हरिशंकर परसाई की ‘संस्कृति’, सतीशराज पुष्करणा की ‘पुरुष’, रमेश बत्रा की ‘सूअर’, सुकेश साहनी की ‘बैल’, सुभाष नीरव की ‘धूप’, पंजाबी में सतिपाल खुल्लर की ‘गन्दा नाला’ व मंगत कुलजिंद की ‘फ्रीज़’, इब्ने इंशा की उर्दू लघुकथा ‘फिर इंसान का क्या हुआ’ ऐसी लघुकथाएँ हैं ,जिनमे एक वैश्विक अपील हैI
लघुकथा अनेक शैलियों में लिखी जा रही हैI व्यक्तिगत तौर पर मुझे संवाद शैली में लिखी लघुकथाओं ने हमेशा ही प्रभावित किया हैI गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई के एक पद “अर्थ अमित अरु आखर थोरे” को संवाद शैली में लिखी गई लघुकथा कहीं बेहतर ढंग से चरितार्थ करने में सक्षम हैI संवाद शैली में लघुकथा लिखना सरल नहीं है, बिना किसी विवरण के केवल संवादों के माध्यम से अपनी बात कह जाना एक दुरूह कार्य हैI ऐसी बहुत सी लघुकथाएँ है जिनका उदाहरण दिया जा सकता हैI  किन्तु इस सूची में दो लघुकथाएँ सबसे ऊपर हैं जोकि मुझे बेहद प्रिय हैं. ये  दो लघुकथाएँ हैं- स्व० जगदीश अरमानी की पंजाबी लघुकथा ‘अद्धा आदमी’(आधा आदमी) और असगर वजाहत की हिंदी लघुकथा ‘जन्नत में संवाद’I

            ‘आधा आदमी’ दिव्यांगों की समस्या को लेकर लिखी गई एक उत्कृष्ट लघुकथा हैI यह मेरी सबसे पसंदीदा लघुकथा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह लघुकथा सातवें दशक के उत्तरार्ध में लिखी गई थी, उस कालखंड  में विषय पर शायद ही किसी ने कलम चलायी होI 80 के दशक में जब यह लघुकथा पहली बार जगदीश अरमानी जी के मुख से सुनी थी, तो मैं सन्न रह गया थाI आज इतना अरसा गुज़र जाने के बाद भी मेरे मन-मस्तिष्क से इसका प्रभाव रत्ती भर भी कम नही हुआ हैI 63 शब्दों की इस लघुकथा में लेखक ने बिना कोई विवरण दिए ऐसी अभिव्यक्ति दी है कि सब कुछ आँखों के सामने घटित होता हुआ प्रतीत होता हैI लघुकथा इतनी कसी हुई है कि इसमें न तो एक शब्द जोड़ा ही जा सकता है और न ही घटाया ही जा सकता हैI दिव्यांगों के प्रति समाज के असंवेदनशील व्यवहार को जिस मर्मस्पर्शी ढंग से उभारा गया है वह अतुलनीय हैI यह एक कड़वी सच्चाई है कि इतने अरसे बाद भी दिव्यांगों के प्रति हमारी सोच में कोई ख़ास अंतर नहीं आया हैI लघुकथा की पंच पंक्ति “कृपा करके पहले मेरा पेट आधा काट दो।” पाठक को अंदर तक झझकोर देने वाली हैI रचना का अंत इस अप्रत्याशित ढंग से किया गया है कि पाठक ऐसे अंत की कल्पना भी नही कर सकता; अत: आश्चर्य का तत्त्व (एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज़) अंत तक क़ायम रहता हैI अंतिम संवाद के आठ शब्दों में निहित दिव्यांग की वेदना आज भी मुझे अंदर तक व्यथित कर देती हैI यह समस्या इतनी सार्वभौमिक है कि यह लघुकथा विश्व की किसी भी भाषा में अनूदित होकर अपना प्रभाव कायम रखेगी और इसे हर संवेदनशील ह्रदय द्वारा सराहा जायेगाI जहाँ तक इसके शीर्षक का सम्बन्ध है, तो मुझे नहीं लगता कि ‘आधा आदमी‘ के इलावा कोई और शीर्षक इस लघुकथा के लिए उपर्युक्त होताI
           मेरी दूसरी पसंदीदा लघुकथा है असगर वजाहत की ‘जन्नत में संवाद’I  चौदह  पंक्तियों की इस लघुकथा का विषय अद्वितीय हैI अपने ही धर्म में पनप रही कुरीतियों के विरुद्ध बहुत समय से लिखा जा रहा है, लेकिन जिहाद-बनाम-जन्नत जैसी मान्यता पर ऐसे बेबाक ढंग से लिखने की हिम्मत हर कोई नहीं कर सकताI आतंकवाद का काला साया सारी दुनिया को निगलने की फ़िराक में हैI आज जबकि धर्म को जोड़ने की बजाय तोड़ने वाले अस्त्र से रूप में इस्तेमाल किया जा रहा, ऐसे में इस प्रकार के सृजन का महत्त्व और भी बढ़ जाता हैI ऐसा सृजन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तम्भ की भूमिका निभाता हैI इस लघुकथा में जिहाद के नाम पर विधर्मियों की हत्याओं को सबाब (पुण्य) का दर्जा देने वाली तालिबानी विचारधारा की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गई हैं, रूढ़ियों पर कुठाराघात किया गया हैI इस लघुकथा में भी सब कुछ सामने घटित होता हुआ प्रतीत होता हैI बिना कोई विवरण दिए दृश्य-चित्रण की यह एक अद्वितीय उदाहरण हैI यहाँ लेखक को कहीं भी नहीं कहना पड़ा कि यह पूरा वार्तालाप कहाँ चल रहा है और किन के मध्य चल रहा हैI क्योंकि लघुकथा का शीर्षक इस सन्दर्भ में पहले से ही इशारा कर देता हैI फिर भी यदि कोई पाठक शीर्षक पर ध्यान दिए बिना भी आगे बढ़ जाए पहली तीन पंक्तियाँ पढ़कर ही सभी पात्र उसकी कल्पना में जीवंत हो उठते हैंI जहाँ साधारण रचनाकार अपनी लघुकथा की अंतिम पंक्ति को धमाकापूर्ण बनाकर रचना को प्रभावशाली बनाने का (असफल) प्रयास करते हैं वहीँ असगर वज़ाहत इस लघुकथा को रमेश बत्रा की ‘सूअर’ की तरह ही एक साधारण से संवाद से समाप्त करके एक अमिट प्रभाव उत्पन्न करने में सफल रहे हैंI  इस लघुकथा में ‘आगे क्या होगा?’ की उत्सुकता अंत तक बनी रही. पाठक को लगता है कि फ़रिश्ते अवश्य ही उन आतंकियों को नरक में जलने की सज़ा देंगे ,लेकिन असगर वजाहत ने इस प्रकार लघुकथा का अंत करके अपनी लेखनी का लोहा मनवाया हैI
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आधा आदमी
स्व० जगदीश अरमानी

”तुम्हें यहाँ नौकरी मिल सकती है।”
”अच्छा? बहुत बहुत शुक्रिया!”
‘लेकिन एक शर्त है।”
”बताओ बताओ। कौन सी शर्त ?”
”तुम्हें तनख्वाह आधी मिलेगी।”
”वो क्यों?”
”तुम्हारा एक हाथ और एक पाँव नहीं है। तुम काम तो आधे आदमी का ही करोगे।”
एक चुप्पी…
”क्यों? बोलो फिर मंजूर है?”
”हाँ! एक शर्त पर।”
”कौन सी?”
”कृपा करके पहले मेरा पेट आधा काट दो।”
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असगर वजाहत
जन्नत में संवाद


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“मुझे जन्नत में सबसे बड़ा बंगला और एक दर्जन हूरें मिलनी चाहिएI”
“क्यों?”
:मैं 72 काफ़िरों को मार कर आया हूँ। मैंने काफिरों को मारने के लिए अपनी जान क़ुर्बान की है।
“काफ़िर कौन थे?”
“क्या मतलब?”
“काफ़िर ईंट पत्थर थे या घास-फूस?”
“जी, काफ़िर आदमी थे।“
“उन्हें किसने बनाया था?”
“जी सब को अल्लाह ने बनाया है। उन्हें भी अल्लाह ने बनाया था।“
“जिसको अल्लाह ने बनाया था उसको मारने का तुमको क्या हक़ था?”
“ज…ज..जी…”
“अल्लाह के बन्दों के मारने के बाद तुम्हें क्या मिलना चाहिए?”
“जी उन्होंने तो हमें यही बताया था कि काफिरों को मारने से जन्नत मिलती हैI”
“तो जाओ उन्हीं से जन्नत ले लो…”

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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