अक्तूबर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: July 1, 2018

[अभिमन्यु अनत मारीशस में हिन्दी के सुद्रढ़  स्तम्भ रहे हैं । चार  जून -2018 को अनत जी का देहावसान हो गया ।उनकी स्मृति में कुछ चर्चित लघुकथाएँ इस अंक में दी जा रही हैं ]

1-पाठ

          इंग्लैंड का एक भव्य शहर। प्रतिष्ठित अंग्रेज परिवार का हेनरी। उम्र अगले क्रिसमस में आठ वर्ष। स्कूल से लौटते ही वह अपनी माँ के पास पहुँचकर उससे बोला:

          ‘‘मम्मी कल मैंने एक दोस्त को अपने यहाँ खाने पर बुलाया है।’’

          ‘‘सच! तुम तो बड़े सोशल होते जा रहे हो।’’

          ‘‘ठीक है न माँ?’’

          ‘‘हाँ बेटे, बहुत ठीक है। मित्रों का एक-दूसरे के पास आना-जाना अच्छा रहता है। क्या नाम है तुम्हारे दोस्त का।’’

          ‘‘विलियम।’’

          ‘‘बहुत सुन्दर नाम है।’’

          ‘‘वह मेरा बड़ा ही घनिष्ठ ह,ै माँ। क्लास मेेरे ही साथ बैठता है।’’

          ‘‘बहुत अच्छा।’’

          ‘‘तो फिर कल उसे ले आऊँ न माँ?’’

          ‘‘हाँ हेनरी, जरूर ले आना।’’

          ‘‘हेनरी कमरे में चला गया। कुछ देर बाद उसकी माँ उसके लिए दूध लिए हुए आई। हेनरी जब दूध पीने लगा तो उसकी माँ पूछ बैठी।

          ‘‘क्या नाम बताया था मित्र का।’’

          ‘‘विलियम।’’

          ‘‘क्या रंग है विलियम का?’’

          हेनरी ने दूध पीना छोड़कर अपनी माँ की ओर देखा। कुछ उधेड़बुन में पड़कर उसने पूछा।

          ‘‘रंग? मैं समझा नहीं।’’

          ‘‘मतलब यह कि तुम्हारा मित्र हमारी तरह गोरा है या काला?’’

          एक क्षण चुप रहकर दूसरे क्षण पूरी मासूमियत के साथ हेनरी ने पूछा, ‘‘रंग का प्रश्न जरूरी है क्या माँ?’’

          ‘‘हाँ हेनरी,तभी तो पूछ रही हूँ।’’

          ‘‘बात यह है कि माँ कि उसका रंग देखना तो मैं भूल ही गया।’’

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2-भीख

          सूरज की पहली किरण के साथ वह गली में आ गया था। तब से अब तक वह चलता ही आ रहा था। सूरज डूबने को था। थकान के कारण पहले तो उसने कमजोरी अनुभव की थी। फिर उसे अपना शरीर काँपता-सा प्रतीत हुआ था। उस समय सूरज काफी ऊपर था। उसकी किरणों में गर्मी थी। इस समय जबकि सूरज को ओझल हुए घंटा होने को था, उसने जाड़े की उस ठंड को अपने भीतर तक पहुँचते हुए महसूस किया।

          वह कोट भी इस समय उस पर नहीं था, जो किसी के ऊपर तंग हो जाने के कारण उसे मिला था। उसे याद आया, उस पुराने कोट को उस दिन फुटपाथ पर से किसी ने उठा लिया था या चुरा लिया था। वह उसके देश का कोई बड़ा-सा दिन था। उसे कहीं से एक गुड़की मिल गई थी और हलके नशे में वह बड़ौदा बैंक की सीढियों पर सो गया था।

          ठंड जब उसकी हड्डियों तक पहुँच गई, तब उसे ज्ञात हुआ था कि उसका अपना शरीर गर्म था, उसे बुखार था। बड़ा अजीब था। बड़ी अजीब बात थी कि यह शरीर गरम हो और आदमी को ठंड लगे। देश प्रगति के पथ पर हो और आदमी भूखा फिरे। खैर, उस धंुधली शाम में वह आगे ही बढ़ता रहा। अब भी उसे उम्मीद बनी हुई थी। भीड़ से खचाखच भरी गलियों में उसे कोई भी पर्यटक नहीं मिला, जिससे उसे कुछ मिल जाता।

          इस वक्त वह एक सुनसान गली में आ गया था। मोड़ पर बिजली-बत्ती के ज्योतिहीन खंभे के पास उसने किसी की आकृति देखी। उम्मीद हुई, एक कप गरम चाय के लिए कुछ मिल जाने की। वह झपटा। आदमी के पास पहुँचकर उसने हाथ फैला दिए। इतने में वह आदमी भी उसकी ओर मुड़ पड़ा था। उसका अपना हाथ फैला का फैला रह गया। मुड़ते ही उस आदमी के मुँह से निकला था, ‘‘भैया, एक पैसा दे दो। बहुत जोर की ठंड है, एक सिगरेट ही सही।’’

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3-एकलव्य

          यह पढ़कर आपको हैरानी जरूर हुई होगी कि एक जंगली लड़के ने किसी की मूर्ति से धनुर्विद्या का ज्ञान पा लिया था और फिर खुशी से उसने अपना अँगूठा उस गुरु को भेंट कर दिया था। आपकी हैरानी सही है, क्योंकि कथा के सही रूप को आपसे छिपा लिया गया है। इसलिए कि बेचारा एकलव्य की राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार हो गया था। सही कहानी कुछ यों है:

          एक दिन युद्ध प्रशिक्षण के दौरान अर्जुन का अँगूठा कट गया। पांडवों के बीच खलबली मच गई, क्योंकि दूसरे दिन धनुर्विद्या की प्रतियोगिता होने वाली थी। इमरजेंसी बैठक हुई। तय हुआ कि दस घंटे के भीतर अर्जुन के हाथ पर कहीं से भी अँगूठा लाकर जोड़ देना चाहिए। घंटे भर की दौड़-धूप के बाद तीन अँगूठे मिले, जो सही उतरे। एक तो खुद द्रोणाचार्य का था, दूसरा था दुर्योधन का अँगूठा और तीसरा था एक जंगली लड़के एकलव्य का। दुर्योधन ने तो साफ इन्कार कर दिया। द्रोणाचार्य ने कहा, ‘‘इसी अँगूठे से मतदान देकर मुझे राजनीतिक पलड़े को संतुलित रखना है।’’

          बस, अब तो एक ही अँगूठा रह गया था सामने, एकलव्य का। काफी देर तक सोचते रहने के बाद द्रोणाचार्य ने दलील पेश की, ‘‘अशिक्षित लोगों के पास अँगूठे की शक्ति का होना राज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा होता है!’’

          लोग तुरन्त जंगल में पहँचे। द्रोणाचार्य ने आगे बढ़कर एकलव्य से कहा, ‘‘राज्य के नाम पर हमें तुम्हारा अँगूठा चाहिए?’’

          ‘‘मैं अपना अँगूठा क्यों देने लगा भला।’’

          ‘‘तेरे अँगूठे पर राज्य का पूरा अधिकार है।’’ दो आदमी आगे बढ़े और एकलव्य का अँगूठा काट लिया था।

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4-रंग

          कटाई के मौसम में काम कुछ सवेरे समाप्त हो जाता है। घर पर की दोनों बकरियों के लिए घास जुटाते हुए मुझे कुछ देर हो गई थी। धूप अब भी हड्डियों के भीतर तक चुभ रही थी और पगडण्डी बहुत अधिक लंबी प्रतीत हो रही थी।

          रास्ते के दोनों ओर के गन्ने काटे जा रहे थे। सिर पर घास का बोझ लिए मैं जल्दी घर पहुँचना चाह रहा था। दूसरे दिन हमारा स्वतंत्रता दिवस था। गाँव की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम की जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी। पाठशाला के छात्र मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

          मैंने अपनी रफ्तार तेज की।

          निकोले साहब की कोठी से होकर बस्ती को पहुँचना था। ईख के खेतों के बीच में निकोले साहब के तरबूज के लहलहाते खेत थे।

          मैं मोड़ पर पहुँचा ही था कि निकोले साहब का दामाद बरगद की आड़ से निकलकर मेरे सामने आ गया। उसकी तनी हुई बंदूक को देखकर मुझे हैरानी हुई। मैं कुछ पूछता कि इससे पहले उसने कड़ककर कहा।

          ‘‘तो आज तुम पकड़े गए। नीचे गिराओ अपने बोझ को।’’

          मेरी हैरानी और भी बढ ़गई, मैंने धीरे से पूछा, ‘‘क्या बात है साहब?’’

          अपने लाल हो चले गोरे चेहरे से पसीने को पोंछते हुए उसने कहा, ‘‘बोझ नीचे फेंको और साथ चलो।’’

          ‘‘पर कहाँ और क्यों?’’ साहस के साथ मैंने पूछा।

          ‘‘तीन दिन से तुम रोज तरबूज चुराते आ रहे हो।’’

          ‘‘साहब, मेरे सिर पर घास है, तरबूज नहीं।’’

          ‘‘मैं सामने नहीं आता तो अब तक तुम्हारी घास के भीतर तरबूज पहुँच ही जाते।’’

          ‘‘आपको गलतफहमी हुई है। मैं अपने गाँव की बैठक का प्रधान हूँ।’’

          ‘‘बंद करो! बड़े साहब के सामने अपनी सफाई पेश कर देना।’’

          ‘‘लेकिन साहब मैंने तरबूज नहीं चुराया। आप चोर पहचानने में भूल कर रहे हैं।’’

          ‘‘सरदार ने चोर का जो हुलिया बताया है, वह तुमसे एकदम मिलता है।’’

तर्क करके अपने आपको को बचाना कठिन था, इसलिए मैं बंदूक की नली के आगे-आगे चल पड़ा।

हुलिया एकदम मिलने का मतलब था-रंग।

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5-मित्र का हिस्सा

          शहर में विधान सभा के ठीक सामने ही था वह आधुनिक होटल। राकेश उसके भीतर पहुँचा। दीवारों को देखा। उन पर आधुनिक पेंटिग्स नशे में झूमती-सी लग रही थीं। सामने की मेजों से होता हुआ वह सीधा काउंटर के पास पहुँचा। मीमी उसकी ओर देखकर मुस्करा दी। मीमी को खुद अपनी इस मुस्कान का पता न चला, क्योंकि हर नये-पुराने ग्राहक के स्वागत के लिए उसे इसी तरीके से काम लेना पड़ता था।

          राकेश की ओर देखते हुए उससे पूूछा, ‘‘मैं आपकी…..’’

          प्रश्न पूरा भी न हुआ था कि राकेश बीच में बोल उठा, ‘‘एक ह्निस्की!’’

          मीमी ने झिलमिलाते गिलास में अपने ही हाथों ह्निस्की उड़ेली और उसी व्यावसायिक मुस्कान के साथ गिलास राकेश के आगे बढ़ा दिया।

          एक ही बार में गिलास खाली करके राकेश ने कीमत चुकाई और होटल से बाहर हो गया।

          दूसरे दिन वह अपने साथ एक दूसरे दोस्त को लेता आया। मीमी ने उसी मुस्कान के साथ दोनों का स्वागत किया और इसके पहले कि वह कुछ पूछती, राकेश ने अपनी दो अँगुलियों से इशारा करते हुए ऑर्डर दिया, ‘‘दो ह्निस्की!’’

          मीमी ने दो गिलासों में ह्निस्की उंड़ेली और दोनों गिलास राकेश के सामने बढ़ा दिए। राकेश ने पहला गिलास अपने मित्र के हाथ पर रखा और दूसरा अपने हाथ में ले लिया। म्यूजिक बॉक्स से बीटल्स की धुन आ रही थी…..सितार की झंकार पूरी खुमारी के साथ थी।

          एक सप्ताह तक राकेश अपने मित्र के साथ होटल में जाता रहा। दीवार के साथ आधुनिक चित्रों को देखते हुए वह अपने मित्र के साथ ह्निस्की का गिलास खाली करके बाहर हो जाता। दूसरे सप्ताह राकेश होटल में अकेला पहुँचा। मीमी की मुस्कान का उत्तर मुस्कान से देने के बाद उसने ऑर्डर दिया, ‘‘दो ह्निस्की !’’

          मीमी को हैरानी हुई। उसने कहा, ‘‘पर आप तो अकेले हैं।’’

          ‘‘मेरा मित्र विदेश चला गया। उसकी याद बनाए रखने के लिए उसका हिस्सा भी पीना होगा।’’ बड़े भोलेपन के साथ उसने कहा। मीमी ने दो गिलास भर दिए।

          राकेश ने बारी-बारी से दोनों गिलासों को खाली किया और होटल से बाहर हो गया।

          एक सप्ताह तक वह अकेला आता रहा और मित्र की याद में दो गिलास खाली करके चला जाता रहा।

          एक दिन आते ही उसने कहा, ‘‘एक ह्निस्की!’’

          मीमी ने हैरानी हुई। उसने पूछा, ‘‘एक ह्निस्की…..? कहीं आपके मित्र को कुछ हो तो नहीं गया?’’ उसने हमदर्दी जताते हुए पूछा।

          ‘‘नहीं, मेरा मित्र सही-सलामत है।’’

          ‘‘आपका उससे झगड़ा….’’

          ‘‘नहीं’’

          ‘‘तो आप केवल एक ही ह्निस्की क्यों ले रहे हैं?’’

          ‘‘बात यह है कि कल से मैंने शराब पीना छोड़ दिया है।’’ यह कहते हुए उसने अपने मित्र के हिस्से को गले के नीचे उतार लिया।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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