अक्तूबर -2018

देशचोर     Posted: August 1, 2018

            दिवाकर बाबू ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर टाई की  गाँठ ठीक कर रहे थे कि कोई काम याद आ गया और बेटी को पुकार उठे – ‘ कृष्णा बेटे, जरा यहाँ आओ..’

              कृष्णा सामने ही पलंग पर बैठी किसी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी।उसने कोई जवाब नहीं दिया ,तो दिवाकर बाबू ने पुनः प्यार से पुकार – ‘ बेटा, यहाँ आओ न ‘

              कृष्णा की ओर से अभी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, तो दिवाकर बाबू को आश्चर्य हुआ। कृष्णा अत्यंत सुशील, संवेदनशील और सचेत लड़की थी। धीमी पुकार पर ही गौरैया- सी फुदकती आ जाती -‘ क्या हुक्म है जहाँपनाह ..?’ उसकी भोली चुहल पर दिवाकर बाबू वात्सल्य से भीतर तक भीग उठते। पर आज .? पुकार को अनसुना कैसे कर रही है !

              वे उसके समीप चले आए। कृष्णा ने कौतुहल भरी बड़ी बड़ी नजरों से पिता को निहारा -‘ आपकी पुकार सुन ली थी मैंने पापा, पर लगा आप मुझे नहीं , किसी कृष्णा बेटे को पुकार रहे हैं। मैं तो बेटी ठहरी न।’

             दिवाकर बाबू उसकी बात पर चौंक पड़े, फिर मुस्कराए -‘बेशक बेटी हो , पर दुनिया के किसी भी नायाब बेटे से कम नहीं।’

 ‘ न न .. छद्म  बात न करें पापा। सच तो यह है कि बेटा न हो पाने का द्वंद्व अभी तक  कचोट रहा है आपको। इसीलिए मुझे पुकारते हुए हर बार  ‘बेटा’ होंठों पर आ धमकता है। एक किस्म के अप्राप्य और दमित संतोष की तलाश..! संभव है  ‘बेटी’ पुकारने में हीनता का बोध भी होता हो।’

 ‘धत्त.. दोनों में से एक भी बात सच नहीं। बल्कि बेटा कहकर तो हम तुम्हारा मान बढ़ाना चाहते हैं कि बेटी होकर भी बेटे से किसी मायने में कम नहीं तुम… ।’

 ‘यानी कि बेटियाँ बेटों से कमतर होती हैं और बेटा होना सम्मान की बात है ?’ कृष्णा खिलखिलाकर हँस पड़ी तो पायल की रुनझुनी झंकार से भर गया कमरा।

दिवाकर बाबू कृष्णा के तर्क पर चकित थे। इस लड़की ने तो शब्दजाल में  फाँस लिया। उन्होंने मन के अंदर झाँका।क्या सचमुच बेटा न होने की कसक अभी भी चील की तरह जेहन में फड़फड़ा नहीं रही ? क्या इतने दिनों के प्रयास के वावजूद इस कचोट को तिरोहित कर पाने में सफल हो सके हैं वे ? इस लड़की ने कहीं भीतर बैठे चोर को विजुअलाइज तो नहीं कर लिया ?

‘ विश्वास करो बेटे, मैं बेटे और बेटी में कतई कोई फर्क नहीं करता। न बेटी पुकारने में किसी तरह की हीनता का बोध ही होता है।’ दिवाकर बाबू के कंठ से टूटे-फूटे  लफ़्ज निकले तो सही, पर एक किस्म की खिसियानी हँसी भी होंठों पर आ पसरी। कृष्णा लरजकर पिता के गले से लग गई  -‘ मैं जानती हूँ पापा, समाज के जेहन में अनंत काल से कुंडली मारकर  बैठा बेटों के प्रति सम्मोहन का भाव इतनी जल्दी दरकने वाला नहीं; पर आप तो मेरे बहादुर पापा हैं। मन को  दृढ़ करें और आगे से जब भी पुकारें , पूरे अंतर्मन से , मन के रेशे -रेशे से बेटी ही पुकारें। मुझे बेटे का नहीं , बेटी का सम्मान चाहिए पापा..।’।

दिवाकर बाबू ने भावातिरेक में कृष्णा को अपने से चिपटा लिया -‘ हमारी कृष्णा बेटी ..।’

 -०-    द्वारा   प्रिंस , केडिया मार्किट, आसनसोल – 713301

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