अक्तूबर -2018

दस्तावेज़बोफोर्स काण्ड     Posted: August 1, 2018

बोफोर्स काण्ड लघुकथा का पाठ सतीश राज पुष्करणा द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-

बोफोर्स काण्ड

सतीश राज पुष्करणा

किसी विद्यालय के हेडमास्टर ने स्कूल की खाता-बही में पूर्व लिखित कुछ काट दिया। फिर उस कटे हुए पर, कुछ अनर्गल शब्द हिन्दी में लिख दिए। उन हिन्दी में लिखे अनर्गल शब्दों पर फिर कुछ अनर्गल अंग्रेंजी शब्दों का लेप कर दिया। अब उस खाता-बही में पूर्व लिखित क्या था ,लाख इधर-उधर से उलट-पुलटकर देखने पर भी पढ़ पाना असम्भव हो गया था। अब हेडमास्टर ने उसे काटे हुए स्थान

को आयत के आकार में, अपने कलम की स्याही से भर दिया।

यह सब कुछ उनके सहयोगी ने देखा, तो कहा, सर! आपने पूर्व लिखित को पहले काटा, फिर उस पर कुछ हिन्दी में, तब अंग्रेजी में लिखकर, उस पर कलम से खूबसूरत  आयत बनाकर आप स्याही से भर दिया। बगैर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखे भी यदि आयत बनाकर आप स्याही से भर देते, तब भी पूर्व लिखित दिखाई नहीं देता।

‘यदि आपको इतनी ही समझ होती, तो आप मेरे सहायक नहीं होते……आप भी कहीं हैडमास्टर होते।………आप किसी अन्य कागज पर अपना प्रयोग करके देखें। तो, आप स्वतः ही समझ जाएँगे।

सहायक शिक्षक ने अपना प्रयोग किया और असफल रहा। क्योंकि थोड़ा इधर-उधर घुमाकर देखने पर पूर्व लिखित पढ़ा जा सकता था। मन ही मन शिक्षक हैडमास्टर की बुद्धिमानी पर चकित था। तब

हैडमास्टर ने पुन कहा, ‘देखिए! यदि सच्चाई को छुपाना हो ,तो पहले उस पर कुछ अनर्गल इधर-उधर का लिखो और काटो। तब सफाई से मेरी तरह…..एक खूबसूरत आयत बनाकर उसमें स्याही भर दो। सच्चाई

स्वतः छिप जाएगी।

‘हाँ सर! सच्चाई छिप ता जाएगी। लेकिन आयताकर धब्बा तो रह ही जाएगा, जो सदैव देखने वालों की आँखों में चुभता रहेगा।

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विमर्श

डॉ0 स्वर्ण किरण

सतीशराज पुष्करणा जी की ‘बोफोर्स काण्ड’ यह भी व्यंग्य है। जो लोग हेराफेरी करते हैं। लिखी हुई चीज को उड़ा देते हैं, उस पर होशियारी से आयताकार चिह्न  बना देते हैं कि पढ़ा न जाए, हालाँकि पढ़ने

वाले पढ़ ही लेते हैं। पता चल ही जाता है कि हेराफेरी की गई है। इसके माध्यम से सत्य को छिपा दिया जाता है लेकिन यह चमकता हुआ सत्य है। स्कूल के हैडमास्टर एवं शिक्षक के बीच बातचीत कराकर लेखक ने

संवाद तत्व को महत्त्व दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रभविष्णुता की दृष्टि से यह यह लघुकथा हमें प्रभावित करती है।

अशोक भाटिया

एक और लघुकथा का जिक्र करूँगा सतीश राज पुष्करणा की ‘बोफोर्स काण्ड’। पुष्करणा जी अनुभवी व्यक्ति हैं .अपनी बात का वर्णन बखूबी करते हैं .लघुकथा अच्छे ढंग से शुरू हुई है ;लेकिन अन्त तक जाते-जाते  जब घटना से कट जाती है और केवल प्रतीक को लेकर अन्त तक पहुँचती है। इसे एबस्ट्रेक्ट भी कहते हैं, जब रचना में से कथा तत्त्व धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं। शुरू में रचना प्रभावशाली थी, बाद में केवल प्रतीक रह गया,तो शायद लेखक की मानसिकता में यह रहा हो कि भाई अब प्रतीक तो मेरे पास है…….अब मैं इसे अन्त तक इस प्रकार से ले जाऊँ ,तो बड़ी करारी रचना बनेगी और लोग यह कहेंगे कि वाह क्या बात है। अन्त में केवल प्रतीक रह गया है ; इसलिए रचना का प्रभाव कम हो गया है। यदि इसे अन्त तक कथा तत्त्व से जोड़ा जा सकता, तो रचना और बेहतर बन सकती थी, बाकी पुष्करणा जी से हम बेहतर लघुकथाओं की अपेक्षा करते हैं और आगे भी करते रहेंगे।

उमेश महादोषी

सतीशराज पुष्करणा जी की लघुकथा ‘बोफोर्स काण्ड’ में दो जबरदस्त कमियाँ मुझे दिखाई दीं। मैं उनकी तरफ इंगित करना चाहूँगा, जिन्हें यदि दूर कर दिया जाए ,तो लघुकथा अपना प्रभाव बहुत दूर तक छोड़ेगी। पहली बात -इस लघुकथा के प्रथम पैरा में जो बात लघुकथाकार स्वयं कह रहा है, वही बात लघुकथा के अन्त से पहले हैडमास्टर दोहरा रहा है। इसलिए पहले पैराग्राफ की कतई जरूरत नहीं है, उसे उड़ा दिया जाना चाहिए और रचना को एक-दो शब्द जोड़कर दूसरे पैरा से शुरू किया जा सकता है। दूसरी कमी जो इसमें है कि हैडमास्टर एवं शिक्षक की बातचीत से पता चलता है कि दोनों गलत काम में शामिल हैं। कथ्य जो सहायक शिक्षक के माध्यम से कहलवाया है, उसने कोई तीसरा व्यक्ति जो कालेज/स्कूल का क्लर्क या शिक्षक हो, अचानक वहाँ आकर, उनकी बात सुनकर, प्रतिक्रिया के रूप में कहे, तो लघुकथा का प्रभाव कहीं ज्यादा पड़ेगा। लघुकथा का कथा तत्त्व अन्त तक बना रहेगा।

गम्भीर सिंह पालनी

पुष्करणा जी की लघुकथा ‘बोफोर्स काण्ड’ एवं ‘हिमांशु’ जी की ‘मुखौटा’ राजनीतिक लघुकथाएँ हैं और दोनों ही आज की स्थितियों पर अच्छा व्यंग्य करती हैं।

डॉ0 शंकर पुणतांबेकर

‘बोफोर्स काण्ड’ के संबंध में , वह लघुकथा मुझे अच्छी लगी ,पर यहाँ एक बात मुझे खटकी……एक जगह तो हैडमास्टर कहता है कि ‘‘तुम नहीं समझते, नहीं तो तुम हैडमास्टर बन जाते।’’ बाद में वही असिस्टेण्ट उतनी समझ रखे हुए है और वहाँ वह उसके समकक्ष लगता है। यही बात मुझे अखरती है।

मनोहर सुगम

शब्द मोह में उलझकर लघुकथा रचना जैसे कि ‘बोफोर्स काण्ड’ । इससे पहले भी सत्य-असत्य, सरकारी-गैर सरकारी  रजिस्टरों में इस रूप की आयतें देखी गई हैं ;परन्तु इस प्रकार शीर्षक देकर आदमी यह नहीं सोच पता कि मैं अपनी रचना की वास्तविकता को भुला करके और घटना को शीर्षक में उलझा रहा हूँ। इसे खबरें कहा जा सकता है। यदि इस तरह का कुछ किया जाएगा हमारे स्थापित लोगों द्वारा, तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा। इससे हमें बचना चाहिए।

जगदीश कश्यप

‘बोफोर्स काण्ड’ मेरे ख्याल से पुष्करणा जी की यह पहली रचना है ,जिसमें उन्होंने शीर्षक को सिद्ध करने का प्रयास किया है। प्लाट उनके सामने पहले से ही तैयार था…..बिल्कुल तैयार। पुष्करणा ने इसमें अन्योक्तिपरक तरीके से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि प्रधानमंत्री को कितना ही पाक दामन सिद्ध किया जाए ,बोफोर्स काण्ड का धब्बा तो हमेशा उसपर लगा ही रहेगा। वैसे इसमें तकनीकी कमजोरी है…..एक रजिस्टर पर कितने ही आयताकर चिह्न  बना लें ,लेकिन यह देखना चाहिए कि इस प्रविष्टि के बारे में कितने बिल्स , बाउचर्स आदि प्रमाण-रूप में विद्यमान रहते हैं। पुष्करणा जी शायद इस विषय में आगे ध्यान देंगे।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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