अक्तूबर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2018

1-दायित्व-बोध  

पिता की मृत्यु के बारह दिन गुजर  गए  थे, नाते-रिश्तेदार सभी लौट गए । आखरी रिश्तेदार को रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आने के बाद, उसने घर का मुख्य द्वार खोला ही था कि उसके कानों में उसके पिता की कड़क आवाज गूँजी, ‘‘सड़क पार करते समय ध्यान क्यों नहीं देता है, गाड़ियाँ देखी हैं बाहर।’’

उसकी साँस गहरी हो गई, लेकिन गहरी साँस दो-तीन बार उखड़ भी गई। पिता तो रहे नहीं, उसके कान ही बज रहे थे और केवल कान ही नहीं उसकी आँखों ने भी देखा कि मुख्य द्वार के बाहर वह स्वयं खड़ा था, जब वह बच्चा था ,जो डर के मारे काँप रहा था।

वह थोड़ा और आगे बढ़ा, उसे फिर अपने पिता का तीक्ष्ण स्वर सुनाई दिया, ‘‘दरवाजा बंद क्या तेरे फरिश्ते करेंगे?’’

उसने मुड़कर देखा, वहाँ भी वह स्वयं ही खड़ा था, वह थोड़ा बड़ा हो चुका था और मुँह बिगाड़कर दरवाजा बंद कर रहा था।

दो क्षणों बाद वह मुड़ा और चल पड़ा, कुछ कदम चलने के बाद फिर उसके कान पिता की तीखी आवाज से फिर गूँजे, ‘‘दिखाई नहीं देता नीचे पत्थर रखा है, गिर जाओगे।’’

अब उसने स्वयं को युवावस्था में देखा, जो तेज चलते-चलते आवाज सुनकर एकदम रुक गया था।

अब वह घर के अंदर घुसा, वहाँ उसका पोता अकेला खेल रहा था, देखते ही जीवन में पहली बार उसकी आँखें क्रोध से भर गईं और पहली ही बार वह तीक्ष्ण स्वर में बोला, ‘‘कहाँ  गए  सब लोग? कोई बच्चे का ध्यान नहीं रखता, छह महीने का बच्चा अकेला बैठा है।’’

और उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसके पैरों में उसके पिता के जूते हैं।

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2-खज़ाना

पिता के अंतिम संस्कार के बाद शाम को दोनों बेटे घर के बाहर आँगन में अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ बैठे हुए थे। इतने में बड़े बेटे की पत्नी आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कहा। बड़े बेटे ने अपने छोटे भाई की तरफ अर्थपूर्ण नजरों से देखकर अंदर आने का इशारा किया और खड़े होकर वहाँ बैठे लोगों से हाथ जोड़कर कहा, “अभी पाँच मिनट में आते हैं।’’

फिर दोनों भाई अंदर चले  गए । अंदर जाते ही बड़े भाई ने फुसफुसाकर छोटे से कहा, ‘‘बक्से में देख लेते हैं, नहीं तो कोई हक जताने आ जाएगा।’’ छोटे ने भी सहमति में गर्दन हिलाई ।

पिता के कमरे में जाकर बड़े भाई की पत्नी ने अपने पति से कहा, ‘‘बक्सा निकाल लीजिए, मैं दरवाजा बंद कर देती हूँ।’’ और वह दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

दोनों भाई पलंग के नीचे झुके और वहाँ रखे हुए बक्से को खींचकर बाहर निकाला। बड़े भाई की पत्नी ने अपने पल्लू में खौंसी हुई चाबी निकाली और अपने पति को दी।

बक्सा खुलते ही तीनों ने बड़ी उत्सुकता से बक्से में झाँका, अंदर चालीस-पचास किताबें रखी थीं। तीनों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। बड़े भाई की पत्नी निराशा भरे स्वर में बोली, ‘‘मुझे तो पूरा विश्वास था कि बाबूजी ने कभी अपनी दवाई तक के रुपये नहीं लिये, तो उनकी बचत के रुपये और गहने इसी बक्से में रखे होंगे, लेकिन इसमें तो—–’’

इतने में छोटे भाई ने देखा कि बक्से के कोने में किताबों के पास में एक कपड़े की थैली रखी हुई है, उसने उस थैली को बाहर निकाला। उसमें कुछ रुपये थे और साथ में एक कागज। रुपये देखते ही उन तीनों के चेहरे पर जिज्ञासा आ गई। छोटे भाई ने रुपये गिने और उसके बाद कागज को पढ़ा, उसमें लिखा था, ‘मेरे अंतिम संस्कार का खर्च’

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3-अहमियत

उस दिन माँ बहुत खुशी-खुशी घर आई और आते ही अपनी पोटली खोलकर बाहर खेल रहे अपने बेटे और बेटी को बुलाया, दोनों अपने एक मित्र के साथ खेलते हुए घर में आए ।

माँ ने पोटली में से एक डिब्बा निकाला, उसमें आइसक्रीम थी, अपने बेटे को प्यार से सहलाते हुए माँ ने उस डिब्बे को खोलकर बेटे को दिया और बहुत लाड से कहा, ‘‘मेमसाहब के घर में आज पाल्टी थी, तेरे लिए माँग ली, तुझे पसंद है न! चल खा ले।’’

बेटी ने यह देखकर चहकते हुए कहा, ‘‘और मेरी आइसक्रीम भी दो न अम्मा।’’

‘‘चुपकर तू। यह सब खाकर बिगड़ जाएगी, ससुराल जाना है कि नहीं, वहाँ रोटी के साथ सब्जी मिल जाए— तो तेरे भाग जाग जाएँ।  तेरे लिए खाना लाई हूँ, खा ले।’’ माँ ने डाँटते हुए पोटली में से खाना निकाला और एक थाली में परोसकर बेटी को दे दिया।

बेटी चुपचाप बैठकर खाने लगी, वह मन ही मन बिलख रही थी। बेटे से यह सहन नहीं हुआ, वह खड़ा हुआ और अपने डिब्बे में से आधी आइसक्रीम निकालकर अपनी बहन की थाली में रख दी। आइसक्रीम पाकर बहन का चेहरा खिल उठा।

और माँ भी चकित रह गई, आइसक्रीम खा तो बेटी रही थी; लेकिन जीवन में पहली बार उसे भी आइसक्रीम के स्वाद का अनुभव हो रहा था।

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4-मृत्यु दंड

हजारों वर्षों की नारकीय यातनाएँ भोगने के बाद भीष्म और द्रोणाचार्य को मुक्ति मिली। दोनों कराहते हुए नरक के दरवाजे से बाहर  आए  ही थे कि सामने कृष्ण को खड़ा देख चौंक उठे, भीष्म ने पूछा, ‘‘कन्हैया! पुत्र, तुम यहाँ?’’

कृष्ण ने मुस्कुराकर दोनों के पैर छुए और कहा, ‘‘पितामह-गुरुवर आप दोनों को लेने आया हूँ, आप दोनों के पाप का दंड पूर्ण हुआ।’’

यह सुनकर द्रोणाचार्य ने विचलित स्वर में कहा, ‘‘इतने वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि पाप किया, लेकिन ऐसा क्या पाप किया कन्हैया, जो इतनी यातनाओं को सहना पड़ा? क्या अपने राजा की रक्षा करना भी—’’

‘‘नहीं गुरुवर।’’ कृष्ण ने बात काटते हुए कहा, ‘‘कुछ अन्य पापों के अतिरिक्त आप दोनों ने एक महापाप किया था। जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब आप दोनों अग्रज चुप रहे। स्त्री के शील की रक्षा करने के बजाय चुप रहकर इस कृत्य को स्वीकारना ही महापाप हुआ।’’

भीष्म ने सहमति में सिर हिला दिया, लेकिन द्रोणाचार्य ने एक प्रश्न और किया, ‘‘हमें तो हमारे पाप का दंड मिल गया, लेकिन हम दोनों की हत्या तुमने छल से करवाई और ईश्वर ने तुम्हें कोई दंड नहीं दिया, ऐसा क्यों?’’

सुनते ही कृष्ण के चेहरे पर दर्द आ गया और उन्होंने गहरी साँस भरते हुए अपनी आँखें बंदकर उन दोनों की तरफ अपनी पीठ कर ली फिर भर्राए स्वर में कहा, ‘‘जो धर्म की हानि आपने की थी, अब वह धरती पर बहुत व्यक्ति कर रहे हैं, लेकिन किसी वस्त्रहीन द्रौपदी को …वस्त्र देने मैं नहीं जा सकता।’’

कृष्ण फिर मुड़े और कहा, ‘‘गुरुवर-पितामह, क्या यह दंड पर्याप्त नहीं है कि आप दोनों आज भी बहुत सारे व्यक्तियों में जीवित हैं, लेकिन उनमें कृष्ण मर गया—‘‘

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5-प्रेम

वह लगभग भागता हुआ अपने बीमार पिता के पलंग की तरफ जाने लगा। लोगों के बीच से गुजरते समय उसने एक फुसफुसाहट सुनी, ‘‘देखो!अब आया है विदेश से, बाप से ज्यादा रुपये जरूरी हैं इनके लिए ।’’

वह अनसुनी कर आगे बढ़ा, देखा कि पलंग पर लेटे हुए उसके पिता अब क्षीणकाय हो चुके थे, दस वर्षों में उनके चेहरे की झुर्रियाँ बहुत बढ़ गई थीं, उनकी पीली पड़ी आँखों में पुतलियाँ डूब रही थीं। उसने वहीं खड़े चिकित्सक की तरफ देखा, चिकित्सक ने ‘ना’ की मुद्रा में सिर हिला दिया।

उसकी आँखों से आँसू छलक आए , वह पलंग पर बैठा और उसने अपने पिता का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसके पिता के पतले और नर्म हाथों में आज भी उस चोट के निशान दिखाई दे रहे थे, जब वो उसके महाविद्यालय से अंतिम चेतावनी मिलने पर उसका शुल्क जमा करवाने जाते समय सीढ़ियों से फिसल गए थे। उसने अपने पिता की तरफ देखकर कहा, ‘‘पापा, आपको कुछ नहीं होगा—’’

उसके पिता उसे देखकर हल्के से मुस्कुरा दिए, अपने सिर से इशारा कर उसे अपनी तरफ बुलाया, वह झुका तो पिता ने मंद स्वर में कहा,‘‘एक बार— अपनी गोद का सिराहना दे दे—’’

उसने अपने पिता का सिर बहुत ध्यान से अपनी गोद में रख दिया। उसके पिता एक बार फिर मुस्कुरा दिए, इस बार मुस्कुराहट ज्यादा गहरी थी, उनके चेहरे पर संतोष के भाव  आए  और गहरी साँस लेकर उन्होंने आँखें हमेशा के लिए मूँद लीं।

वह अपने पिता के चेहरे से नजरे नहीं हटा पाया, कुछ क्षणों तक देखने के बाद उसे एकाएक याद आया कि उसके पिता पहली बार उसकी गोद में लेटे थे और वह न जाने कितनी बार।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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