अक्तूबर -2018

देशअसली खज़ाना     Posted: September 1, 2018

मेरी जिंदगी का सबसे खुशनसीबी भरा लम्हा, जो कभी भुलाए नहीं भूलता।
बात उन दिनों की है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी, सभी रिश्तेदारों की आंखें मेरा सामान देख कर चकाचौंध हो गयीं। सबने एक स्वर में सराहा, “बहुत ही उम्दा पसंद है बहु की, एकदम राजकुमारियों सा शाही अंदाज।” यह सुन कर मैं खुशी से फूल गयी। सबने मेरी तारीफ की, पर सासू माँ की आँखों में वह तृप्ति नजर नहीं आयी। उनका व्यवहार मुझे तटस्थ लगा। न तो वे उत्साहित थीं और न ही क्रोधित।
घर की एकमात्र महिला सदस्य होने के कारण उन पर घर गृहस्थी का पूरा भार था। मैं सोच में पड़ गई कि कहीं सासू माँ  को इससे भी बेहतर की उम्मीद तो नहीं थी। मेरा सारा सामान लगाने में उन्होंने मेरी पूरी मदद की।
कुछ दिनों बाद मैंने महसूस किया कि वे दिल की वाकई बहुत अच्छी हैं, पर कहीं कुछ कमी है, जो मुझे सासू माँ के साथ अपने संबंधों में खटक रही थी। मेरा एक बैग रह गया था, जिसका सामान मैं खोलना नहीं चाहती थी। मेरे ना चाहते हुए भी मेरी दीदी ने दहेज के सामान के साथ उसे भी रख दिया था।
सासू माँ ने बैग खोला, तो उसमें कढ़ाई की हुई चादरें, गिलाफ, टेबलकवर, कुशन, पेंटिंग्स, पुराने प्रमाणपत्र, मेडल, ट्राॅफी आदि थे। साथ ही पाक कला की बहुत सी किताबें। मैं हड़बड़ा गई और उनसे बोली, ” मैंने ये सब स्टूडेंट् लाइफ में बनाए थे। मुझे इन सबका बड़ा शौक है, पर अब तो ये आउटडेटेड हो गये, किस काम के।”
लेकिन वे एक-एक चीज भावविभोर हो कर देख रहीं थीं, साथ ही कहती जा रहीं थीं, ” तुमने यह सब सीख रखा है, मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा। इसे छुपाकर क्यों रखा है। बेटी, यही तो तुम्हारा असली खज़ाना है। तूने मेरा दिल खुश कर दिया, मैं आज बहुत खुश हूं। मैं ऐसी ही बहू तो चाहती थी,” कहते हुए अपने गले लगा लिया।
मेरा चेहरा  आँसुओं से भीग गया। हमारे संबंधों के बीच की कमी पूरी हो गई, वे मुझे मेरी माँ नजर आ रही थीं।
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