दिसम्बर -2018

देशमहानायक     Posted: September 1, 2018

            यह सच है कि पिछले बीस वर्षों से वह शहर के रंगमंच पर नायक का पर्याय रहे हैं मगर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अब उन पर उम्र सवार होने लगी है। उनकी आवाज  में वह गूँज नहीं रह गई है जो खचाखच भरे थिएटर की तालियाँ बटोर सके। वह ढल चुके हैं मगर रुपहले पर्दे के राजेश खन्ना की तरह स्वयं को रंगमंच का महानायक ही मानते हैं।
उनकी जिद है कि वे आज भी नायक की भूमिका किसी भी अन्य कलाकार से अधिक बेहतर ढंग से अदा कर सकते हैं।
            आज नाटक की रिहर्सल में जब उनकी साँस उखड़ रही थी ,तो उन्हें अलग ले जाकर निर्देशक वासु दा को आखिर कहना ही पड़ा, ‘‘विरोचन भाई, इस नाटक में आप नायक के किरदार को सँभाल नहीं पा रहे हैं। मेरी नजर में तो रहमान का किरदार आप अच्छा निभा पाएँगे।’’
            ‘‘क्यों….?’’ गम्भीर आवाज में आश्चर्य से अधिक व्यंग्य का पुट था।
            ‘‘कुछ बातें कहने से अधिक समझने की होती हैं विरोचन भाई!  दूसरों से पूछने की बजाय उन्हें खुद से पूछना पड़ता है।’’ वासु दा के इतना कहने के साथ ही दोनों के बीच सन्नाटा खिंच गया।
            बिना कुछ बोले विरोचन बाहर निकल आए। एक तूफान अपने में समेटे वह कार में आ बैठा। ड्राइवर ने गाड़ी उनके बंगले की तरफ बढ़ा दी।
वह गाड़ी से उतर कर सीधे ड्राइंगरूम में पहुँचा। सामने आदमकद शीशे में खुद को देखते हुए काफी देर तक खड़े सोचते रहे। फिर एक निश्चय कर दृढ़ता से बुदबुदा उठे, ‘‘मैं सब समझ गया हूँ  वासु दा! वाकई,कुछ बातें कहने से अधिक समझने की ही होती है!’’ उनकी निगाहें कुशल मेकअपमैन से भी छूट गए कनपटी के कुछ सफेद बालों पर टिकी थीं, ‘‘लेकिन मैं नायक हूँ वासु दा….महानायक!
मैं रहमान के रोल में भी दूसरों पर भारी पड़ूँगा….।’’

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