अक्तूबर -2018

मेरी पसन्दमानवीय संवेदनाओं की लघुकथाएँ-लवलेश दत्त     Posted: September 1, 2018

वर्तमान हिन्दी कथासाहित्य में लघुकथा एक अत्यन्त लोकप्रिय विधा है। अपनी लोकप्रियता, कथ्य और शिल्प के कारण इस विधा ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। लघुकथा की विशिष्टता का कारण इसका लघ्वाकार होना है। आज के समय में पाठकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो समय कम होने या न होने की शिकायत करता है। ऐसे वर्ग में विशेष रूप से इस विधा को पसन्द किया जा रहा है। लघुकथा अपने पाठकों को अत्यन्त अल्प समय में निहित उद्देश्य को प्रेषित करने में सक्षम है। इसके साथ ही इसमें निहित कटाक्ष, व्यंग्य या संदेश बहुत देर तक पाठक के मन पर अपना प्रभाव जमाए रहता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण आज के समय में लघुकथा पाठकों की पहली पसन्द बन चुकी है।

सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘ठंडी रजाई’ पढ़कर इस विधा से मेरा पहला परिचय हुआ था। मनोवैज्ञानिक धरातल और समाज के प्रति जीवन मूल्यों को समेटे इस लघुकथा को पढ़ते ही इसने में मेरे मन-मस्तिष्क में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था। मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने तथा उसमें समाजबोध होने की जितनी सशक्त अभिव्यक्ति इस लघुकथा में मिलती है, वैसी कम-से-कम लघुकथा में तो दुर्लभ है। हाड़ कँपाने वाली सर्दी में पड़ोसी का पड़ोसी से रज़ाई माँगना, पहले रज़ाई न देना, उसके कारण अपराधबोध होना और फिर मानवीय मूल्यों के जाग्रत होने पर, पड़ोसी के घर रजाई भिजवाकर चैन की नींद सोना सबकुछ इतना स्वाभाविक और हृदय को छू जाने वाला है कि लघुकथा पढ़ते ही पाठक ‘वाह’ कह उठता है। आज के समय में जबकि व्यक्ति आत्मकेंद्रित होकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है, ‘ठंडी रजाई’ जैसी लघुकथा मानव मूल्यों को जाग्रत करने में अपना मह्त्त्वपूर्ण योगदान निभाती हैं। निम्नमध्यम वर्गीय समाज में अधिकांश परिवार अभावों से युक्त जीवन जीते हैं। इन परिवारों में जीवन यापन के संसाधन सीमित होते हैं। ऐसे में समय-असमय पास-पड़ोसियों के द्वारा एक-दूसरे के घरों से कोई-न-कोई वस्तु उधार लेने या देने की घटनाएँ आम हैं। कभी-कभी माँगने की इस आदत से खीझ भी होती है और मन करता है कि माँगने वालों को उल्टा जवाब दे दिया जाए या फिर उनकी माँग पूरी न की जाए जिससे भविष्य में वे ऐसा न करें। मन ऐसी ही उहापोह की स्थिति में रहता है लेकिन अन्त में एक दूसरे की सहायता करके जो सुखानुभूति होती है, वह सबसे अलग होती है। इसे लघुकथा के अन्त में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है—‘वह सुशीला को रजाई देकर लौटी तो उसने हैरानी से देखा, पति उसी ठण्डी रजाई में घोड़े बेचकर सो रहा था। वह भी जम्हाइयाँ लेती हुई अपने बिस्तर में घुस गई। उसे सुखद आश्चर्य हुआ, रजाई काफी गर्म थी।’ यह केवल घटना नहीं है बल्कि मनुष्य के अन्दर चलते द्वन्द्व में मानवीय मूल्यों के विजयी होने पर मनुष्य के श्रेष्ठ योनि होने का परिचय देती है।

दूसरी लघुकथा मधुदीप जी द्वारा लिखित ‘लौहद्वार’ है। ‘लौहद्वार’ पढ़कर मानों लोहे की तरह होती मानवीय संवेदना का चित्र साकार हो उठा। यह एक ऐसा प्रतीक है जो आज के समय में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आज का मनुष्य लोहे के द्वार के समान अपने सामने गलत होते हुए भी चुपचाप देखता-सुनता और समझता रहता है लेकिन उसके विरुद्ध किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करता और संवेदनाशून्य जड़ पदार्थ की तरह खड़ा रहता है। यह लघुकथा अपने आप में कई समस्याओं और प्रश्नों को उठाती है। लिव-इन रिलेशनशिप ने जहाँ हमारी संस्कृति को कलंकित किया है, वहीं उसके दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। लघुकथा इस अपसंस्कृति की समस्या को उठाने में पूर्णतः समर्थ है। दिनेश जैसे न जाने कितने लोग हैं, जो अव्यवस्था, अंधी न्याय प्रणाली और भ्रष्टाचार के कारण निर्दोष होते हुए भी जेलों में बन्द हैं। वे चीख-चीखकर अपने निर्दोष होने की बात कहते हैं; लेकिन लोहे के द्वार की तरह लोहा बने मनुष्यों के लिए उन चीखों का कोई असर नहीं है। लघुकथा की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लोहे का द्वार भी निर्दोष दिनेश की स्थिति से द्रवित है’ लेकिन व्यवस्था और संवेदनाहीन मनुष्यता तो उस लोहे से भी गई-गुजरी है जो साक्ष्यों के अभाव में किसी को निर्दोष नहीं मानती। लघुकथा में ‘दिनेश’ का जातिवाचक के रूप में प्रयोग हमारे समाज और व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। लिव-इन रिलेशसनशिप में रहने वाले युवक-युवती में से केवल युवक को ही दण्ड क्यों? युवती द्वारा युवक पर यौन शोषण का आरोप लगाने पर क्यों एकदम युवक को हिरासत मे लेकर कारागार में डाल दिया जाता है ,जबकि उसके साथ लम्बे समय तक लिव-इन रिलेशसनशिप में रहने वाली युवती स्वच्छन्द और मुक्त रहती है। लगभग तीन साल बाद दिनेश निर्दोष सिद्ध होता है फिर उसे बाइज्जत बरी कर दिया जाता है लेकिन क्या दिनेश जैसे निर्दोष लोगों की खोई इज्जत और उस पर लगे बलात्कार के आरोप से समाज उन्हें बरी करेगा, संभवतः नहीं। ऐसे ही अनेक प्रश्न उठाती लघुकथा ‘लौहद्वार’ के माध्यम से बहुत कुछ कहती है। लघुकथा का अन्त इतना मार्मिक है कि पाठक को सोचने पर मजबूर कर देता है—‘चारों सड़कें बिजली की तेज रोशनी में नहायी हुई हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि उस चौराहे की तरफ बढ़ते इस दिनेश की भी दूसरे कई दिनेशों की तरह ही चारों राहें अन्धकार में डूब चुकी हैं । मैं इन दिनेशों की हालत से आक्रोशित होकर चीखना चाहता हूँ लेकिन मैं चीख नहीं सकता । मैं लौहद्वार हूँ ।’ अनेक प्रश्नों को उठाकर मानव-मन को उद्वेलित करने वाली इस लघुकथा में लौहद्वार का प्रतीक सचमुच ऐसा प्रयोग है जो लघुकथा को कई मायनों में उत्कृष्ट रचना की संज्ञा देता है।
-०-

1-ठण्डी रजाई :सुकेश साहनी

‘कौन था?’ उसने अँगीठी की ओर हाथ फैलाकर तापते हुए पूछा।
‘वही, सामनेवालों के यहाँ से’, पत्नी ने कुढ़कर सुशीला की नकल उतारी, ‘बहन, रजाई दे-दो, इनके दोस्त आए हैं ।’
फिर रजाई ओढ़ते हुए बड़बड़ाई, ‘इन्हें रोज-रोज रजाई जैसी चीज माँगते शर्म नहीं आती । मैंने तो साफ मना कर दिया, कह दिया-आज हमारे यहाँ भी कोई आनेवाला है।’
‘ठीक किया ।’ वह भी रजाई में दुबकते हुए बोला,’इन लोगों का यही इलाज है ।’
‘बहुत ठण्ड है।’ वह बड़बड़ाया।
‘मेरे अपने हाथ-पैर सुन्न हुए जा रहे हैं।’ पत्नी ने अपनी चारपाई को दहकती अँगीठी के और नजदीक घसीटते हुए कहा।
‘रजाई तो जैसे बिलकुल बर्फ हो रही है, नींद आए भी तो कैसे !’ वह करवट बदलते हुए बोला।
‘नींद का तो कहीं पता ही नहीं है।’ पत्नी ने कहा, ‘इस ठण्ड में मेरी रजाई भी बेअसर-सी हो गई है।’
जब काफी देर तक नींद नहीं आई तो वे दोनों उठकर बैठ गए और अँगीठी पर हाथ सेंकने लगे।
‘एक बात कहूँ, बुरा तो नहीं मानोगी ?’ पति ने कहा।
‘कैसी बात करते हो?’
‘आज जबर्दस्त ठण्ड है, सामने वालों के यहाँ मेहमान भी आए हैं। ऐसे में रजाई के बगैर काफी परेशानी हो रही होगी।’
‘हाँ, तो ?’ उसने आशा भरी नजरों से पति की ओर देखा।
‘मैं सोच रहा था— मेरा—-मतलब यह था कि —- हमारे यहाँ एक रजाई फालतू ही तो पड़ी है।’
‘तुमने तो मेरे मन की बात कह दी, एक दिन के इस्तेमाल से रजाई घिस थोड़ी ही जाएगी, ‘मैं अभी सुशीला को रजाई दे आती हूँ।’
वह सुशीला को रजाई देकर लौटी तो उसने हैरानी से देखा, पति उसी ठण्डी रजाई में घोड़े बेचकर सो रहा था। वह भी जम्हाइयाँ लेती हुई अपने बिस्तर में घुस गई। उसे सुखद आश्चर्य हुआ, रजाई काफी गर्म थी।
-०-
लौहद्वार :मधुदीप गुप्ता

मैं तिहाड़ जेल का लौहद्वार हूँ । अभी-अभी जो व्यक्ति अपने लस्त-पस्त शरीर को किसी तरह आगे धकेलता हुआ मुझ से बाहर निकला है मैं उसे कैदी नम्बर 506 के नाम से पहचानता हूँ । वैसे उसका नाम दिनेश वर्मा है जिसे मेरे साथ ही दूसरे सभी भी भूल चुके हैं । यह नम्बर ही अब उसकी पहचान बन चुका    है ।

तीन साल पहले जब इस व्यक्ति को मुझ तक लाया गया था तो इसने यहाँ चीख-चीखकर कहा था कि वह निर्दोष है और उसने किसी का बलात्कार नहीं किया । मुझ तक आने से पहले यह पुलिस और अदालत के सामने भी चिल्लाया होगा कि वह और नीलिमा पिछले चार साल से लिव-इन में रह रहे थे और अब नीलिमा उसका सब-कुछ अपने नाम करवाने के लिए उसे ब्लैक मेल कर रही है । पुलिस ने उसे सिर्फ हडकाया था, न्यायलय ने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई थी और मुझ बेजुबान ने तो कितने ही दिनेशों को अन्दर-बाहर आते देखा है ।

आज तीन साल बाद ऊपरी अदालत के कानों में सच्चाई की भनक पड़ ही गई । अभियोजन पक्ष उसे वहाँ दोषी साबित करने में पूरी तरह विफल रहा तो उस अदालत ने उसे ‘बाइज्जत’ बरी कर दिया । इस समय रात सड़कों पर उतर रही है । मेरे सामने ही वह चौराहा है जिससे निकलकर चार सड़कें अलग-अलग दिशाओं में जा रही हैं । चारों सड़कें बिजली की तेज रोशनी में नहाई हुई हैं ; लेकिन मैं जानता हूँ कि उस चौराहे की तरफ बढ़ते इस दिनेश की भी दूसरे कई दिनेशों की तरह ही चारों राहें अन्धकार में डूब चुकी हैं मैं इन दिनेशों की हालत से आक्रोशित होकर चीखना चाहता हूँ लेकिन मैं चीख नहीं सकता । मैं लौहद्वार हूँ ।
-०-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine