अक्तूबर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2018

1-ज़रूरत

दीवाली की सफाई धूम धाम से चल रही थी। बेटा-बहू, पोता-पोती, सब पूरे मनोयोग से लगे हुए थे।

वे सुबह से ही छत पर चले आये थे। सफाई में एक पुराना फोटो एल्बम हाथ लग गया था, सो कुनकुनी धूप में बैठे, पुरानी यादों को ताज़ा कर रहे थे।

ज़्यादातर तस्वीरें उनकी जवानी के दिनों की थीं, जिसमें वे अपनी दिवंगत पत्नी के साथ थे। तकरीबन हर तस्वीर में पत्नी किसी बुत की तरह थी, तो वे मुस्कुराते हुए, बल्कि ठहाका लगाते हुए कैमरा फेस कर रहे थे। उन्हें सदा से ही खासा शौक था तस्वीरें खिंचवाने का। वे पत्नी को अक्सर डपटते -”फ़ोटो खिंचवाते समय मुस्कुराया करो। हमेशा सन्न सी खड़ी रह जाती हो- भौंचक्की सी !!!”

– चाय की तलब चलते, जब वे नीचे उतर कर आये तो देखा, घर का सारा पुराना सामान इकट्ठा करके अहाते में करीने से जमा कर दिया गया है, और पोता अपने फ़ोन कैमरा से उसकी तस्वीरें ले रहा है।

– यह उनके लिए नई बात थी। पता चला कि, आजकल पुराने सामान को ऑनलाइन बेचने का चलन है।

वे बेहद दिलचस्पी से इस फोटोसेशन को देख रहे थे कि, एकाएक उनके शरीर में एक सिहरन सी उठी- और ठीक उसी वक़्त, पोते ने शरारत से मुस्कुराते हुए, कैमरा उनकी तरफ करके क्लिक कर दिया – “ग्रैंडपा, स्माइल!!!”

– कैमरा की फलेश तेज़ी से उनकी तरफ लपकी, – और वे पहली बार तस्वीर खिंचवाते हुए सन्न से खड़े रह गए।

-०-

2-नेटवर्क

दिनों से सोशल नेटवर्क पर न ज्यादा लाइक मिल रहे थे, न कमेंट्स। हर पोस्ट औंधे मुहँ गिर रही थी। सो, आज छुट्टी के दिन ब्रह्मास्त्र चलाया और स्टेटस अपडेट किया – “ डाउन विद हाई फीवर!!”

 

पहले नाश्ता, फिर किराये के इस वन रूम सेट की सफाई, कुछ कपड़ों की धुलाई, उसके बाद लंच तैयार किया और फिर जम कर स्नान।

इस बीच, लाइक्स और कमैंट्स की रिसिविंग टोन बार-बार बजती रही। तीर निशाने पर लग चुका था।

 

– लंच के बाद, अपना फोन लेकर वो इत्मीनान से बिस्तर में लेट गया।

-”गेट वेल सून”, -”ओ बेबी ख्याल रखो अपना”, – “अबे क्या हो गया कमीने”- वगैरह-वगैरह-!!

– एक-एक कमेंट को सौ-सौ बार पढ़ते, गिनते और इस बीच टीवी देखते-देखते कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला।

– चौंककर उठा तो देखा कि शाम गहरा गयी है, और कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है।

-” जी, कहिए?” उसने उलझन भरे स्वर में पूछा।

-”न – नहीं, कुछ खास नहीं -” दरवाज़े पर खड़े उस अधेड़ उम्र के शख्स ने कहा, “ वो तुम आज सुबह से बाहर नहीं निकले, तो सोचा पूछ लूँ! – मैं सामने वाले वन रूम सेट में ही तो रहता हूँ….”

-०-

3-डर

माँ सुबह बाबूजी को टोकती है – “ये दूसरी चाय है, अब और नहीं मिलेगी। अखबार चाटना बंद करो और गुड्डू को स्टैंड तक छोड़ कर आओ। उसकी स्कूल बस आती ही होगी।”

– फिर ऑफिस के लिए तैयार हो रहे बेटे के सामने से अस्फुट स्वर में बड़बड़ाती हुई निकल जाती है – “रिटायर होने का ये मतलब तो नहीं कि हाथ पैर हिलाना ही बंद कर दो, और हमसे तीमारदारी करवाओ!”

– बाबूजी, गुड्डू को लेकर जाने लगते हैं तो मां तेज़ आवाज़ में फिर टोकती है, “लौटते में कोई अच्छी -सी दवाई लेते आना, रात से बहू के सिर में दर्द है…खाली हाथ हिलाते मत चले आना।”

– दोपहर के भोजन में कुर्सी पर ऊँघ रहे बाबूजी पर माँ झुंझलाती है, “इस कुर्सी पर रहम करो, खाना खाकर सीधे चारपाई ही तोड़ना…थोड़ा सब्र कर लो..रोटियाँ सेक कर लाया रही हूँ..” – फिर , बिस्तर पर लेटी बहू के सामने से उसी तरह बड़बड़ाती हुई निकल जाती है, “तंग आ गई हूँ…पेट है या कोठार? अभी दो घंटे पहले ही तो डटकर नाश्ता किया है।”

– शाम की चाय के साथ पकोड़ों की बाबूजी की फरमाइश को माँ, पूरी निर्ममता से खारिज कर देती है,”तुम्हें बुढौती में स्वाद सूझ रहे हैं!”

– और जब बाबूजी खाली चाय पीकर टहलने निकलते हैं ,तो फिर वही टोक, “ये झोला ले जाओ। लौटते में सब्जियाँ लेते आना…खाली हाथ हिलाते..”

– रात के भोजन के बाद, टीवी से मन बहला रहे बाबूजी, माँ द्वारा फिर से टोके जाते हैं, “क्यों ये सब फालतू की चीजें देख कर अपना भेजा पचाते हो? इससे तो अच्छा है, गुड्डू को होमवर्क ही करवा दो।”

– फिर जब बाबूजी, दोनों हाथ अपने सीने पर रखे गहरी नींद में सोए होते हैं, तो माँ उन्हें एकटक देखती रहती है…फिर टोकने के से अंदाज़ में उनके हाथ सीने से हटाती है कि – “ऐसे मत सोया करो- डरावने सपने आते हैं…”

…फिर  आँखें मूंदकर अस्फुट स्वर में बुदबुदाती है,”ईश्वर करे, तुम्हारे जीवन में कभी ऐसा पल न आए कि बेटा -बहू तुम्हें किसी भी बात के लिए टोक दें…मुझसे सहा नहीं जाएगा….”

-०-

4-नालायक

-“अरे मास्साब, रेट तो डबल है, पर आधे में काम करवा दूंगा आपका” – वो धीमे से फुसफुसाया – “क्या करें सर, बहुत दिक्कत है, ऊपर तक चढ़ावा देना पड़ता है -” फिर एकाएक उसके लहज़े में बेशर्मी उतर आयी – “और फिर आज तो 5 सितंबर है, डिस्काउंट समझ लो आप ये मेरी तरफ से -”

मास्टरजी तनिक खिन्न हुए, फिर पसीना पोंछते हुए कुर्सी से उठ खड़े हुए। सरकारी दफ्तर के उस कमरे से बाहर निकले ही थे की पीछे से उसी क्लर्क की फुसफुसाहट सुनाई दी -“ट्यूशन पढ़ा-पढ़ाकर बहुत  माया जोड़ रखी है बुड्ढे ने, पेंशन मिलती है सो अलग, पर देने के नाम जेब फटी जा रही है -”

मास्टरजी वहीँ ठिठक गए।  उन्होंने आगे सुना – “अंग्रेजी पढ़ाते थे यह हमे। उन्ही लौंडों को नंबर देते थे जो इनके यहां ट्यूशन पढ़ते थे।  हमने भी पढ़ी ट्यूशन, तब पास हुए – पर अब क्या करें, गुरूजी हैं, इसलिए लिहाज़ कर रहा हूँ। ”

वे बेहद थके-थके से बाहर आये।  निर्णय लिया की अपने इस विद्यार्थी का  एहसान नहीं लेंगे, जितनी रिश्वत मांगता है, देकर अपना काम करवा लेंगे।

बैंक से रकम निकलवा कर पासबुक समेत थैले में रखी, और थैले को बड़ी एहतियात से स्कूटर की डिक्की में रखने जा ही रहे थे, कि मानो चील ने झपट्टा मरा हो।  बाइक सवार वो शख्स, जो मुह पर कपडा बांधे था, पल भर में उडनछू हो गया। मास्टरजी पहले हतबुद्धि से खड़े रह गए, फिर लड़खड़ा कर गिर पड़े।
थाने में रपट लिखवा दी गयी थी। घर  में कोहराम मचा था, पर मास्टरजी एकाएक चुप्पी लगा गए थे।  – बस बिस्तर पर पड़े-पड़े छत को घूरे जा रहे थे।
बड़ी मुश्किल से आँख लगी – लेकिन एक डरावना सपना देखा और पसीने से तरबतर हो बिस्तर से उठ खड़े हुए। भोर हो चुकी थी।  मन ना होते हुए भी सैर को निकल पड़े।
अभी नुक्कड़ तक ही पहुँचे थे कि  एकाएक हड़बड़ा से  गए।  एक तेज गति से आ रही बाइक उन्हें छूती हुयी निकल गयी।  वो फटी-फटी आँखों से देखते रह गए – क्योंकि उनका थैला अब उनके पैरों के पास पड़ा था।
धड़कते दिल से उसे खोला  – रकम, पासबुक सब सही सलामत थे।  – साथ में कागज़ का एक पुर्ज़ा भी था, जिस पर बहुत उबड़-खाबड़ तरीके से लिखा था – “शौरी मास्साब , गलती हो गयी।  अगर हम भी टूसन पढ़ सकते होते तो कहीं बाबू-वाबू लग जाते..”

-०-

5-रिवाज़

काफी मोलभाव करने के बाद, मैनें आज उस ठेकेदार के, महीने भर से अटका कर रखे हुए बिल पास कर दिए। ठेकेदार ने खुश होकर अपने मातहत को आवाज़ लगायी -“अबे सुन!!! – सब साब लोगों के लिए स्पेशल नाश्ता ले आ फटाफट!!”
दफ्तर में दावत उड़ी। हम सब सहकर्मियों ने डट कर खाया।

शाम को जब दफ्तर से निकलने लगा तो पता चला कि, घर से लाया गया लंच बॉक्स तो ज्यों का त्यों ही रह गया है। मैं फौरन बाहर सड़क पर आया।
-“अबे सुन!!!” – फुटपाथ पर ऊँघ रहे उस भिखारी की तरफ, अपना लंच बॉक्स बढ़ाते हुए, मैंनें आवाज़ लगाई –
– वो अलसाए स्वर में बोला -“बाबूजी, आज मंदिर में ठेकेदार साब का भंडारा है। मैं तो वहीं खा चुका – ये खाना आप उसे दे दीजिए -”
– उसने दूसरी ओर मुँह घुमा कर ज़ोर से आवाज़  लगायी -“अबे सुन!!!”
मैनें देखा, आवाज़ सुन कर, उस और से एक कुत्ता अपनी जीभ लपलपाता हुआ मेरी ओर दौड़ता चला आ रहा है।

-०-
6-सॉरी डिअर चे!

आज मैं बड़ा उत्साहित था. पूरे कॉलेज में जबरदस्त गहमा गहमी थी. मेरे सीनियर मणि दा और उनके साथी जो एक दूसरे को कामरेड कह कर सम्भोधित किया करते थे, आज एक जुलूस निकाल रहे थे. हॉस्टल में, उनके कमरे में, वे सब सिर से सिर जोड़े, गरमा गरम बहस में मशगूल थे, जो मेरी समझ से बाहर थी, बस एक शब्द – ‘बाजारीकरण’, बार-बार मेरे कानो से टकरा रहा था. इस शब्द को लेकर कुछ नारे हाथों-हाथ रचे जा रहे थे, जिन्हें मैं लाल रोशनाई से कागज़ की बड़ी-बड़ी शीट पर लिख रहा था.

तभी मेरी नज़र कमरे की दीवार पर लगे एक पोस्टर पर पड़ी. लम्बे बाल, थोडा उठा हुआ चेहरा, फौजी कैप. नीचे लिखा था – “इफ यू ट्रेम्बल विद इंडिग्नेशन एट एवरी इंजस्टिस, देन यू आर ए कामरेड ऑफ़ माइन.”

“- यह किसका पोस्टर है मणि दा?” मैंने पूछा.
मणि दा और उनके साथी हंस पड़े और कहने लगे “-कैसे नौजवान हो यार? चे ग्वेरा  को नहीं जानते?”

फिर जब उन्होंने मुझे चे ग्वेरा के बारे में विस्तार से बताया तो मैंने राय दी की क्यों ना हम जुलूस में इस पोस्टर को भी शामिल करें. मेरी राय मान ली गयी.

नारों, कविताओं और गीतों से गूंजता जुलूस कॉलेज से रवाना हुआ. मेरे हाथ में चे का पोस्टर था. मैं उत्तेजना से काँप रहा था.

अचानक सामने से तेज़ शोर उठा. सायरन बजाती हुईं सरकारी गाड़ियां हमारी और झपटीं. देखते ही देखते अफरा तफरी मच गयी. हम पर चारों तरफ से लाठियां बरसने लगीं. मैंने देखा मणि दा अपने साथियों समेत अनेक वर्दीधारियों से भीड़ गए थे.
तभी एक डंडा मेरी  टाँगों पर पड़ा. मैं चीख कर नीचे गिर पडा. चे का पोस्टर मेरे हाथों से छूट कर सड़क पर आगया, जिस पर से अनेक बूट गुजर गए.
मेरा सहपाठी मुझे उठाता हुआ बोला – “चल भाग, वर्ना काम में आ जाएँगे.”
मैं घबरा कर उसके साथ बेतहाशा भागने लगा. सब कुछ पीछे छूटने लगा.
थोड़ी देर बाद हमने अपने आपको एक बाज़ार में पाया. हम, एक देत्यकार शॉपिंग माल की पेवमेंट पर बेठे हाँफने लगे.

वहाँ भी मुझे चे ग्वेरा दिखाई दिया. वो एक नौजवान लड़के की टी-शर्ट पर छपा हुआ था.

एक लड़की उस लड़के से हँसते हुए पूछ रही थी –“वाओ, नाइस टी. लेकिन ये है कौन? ए हॉलीवुड स्टार और समथिंग?”
लड़का भी  हँसा –“आई डोंट नो बेब. मे बी सम रॉकस्टार. बट इट्स कूल ना!!!”

-०-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine