दिसम्बर -2018

देशप्रतियोगिता     Posted: October 1, 2018

प्रथम

1-कोशिश

मीना गुप्ता

उस वृद्ध दंपत्ति के पास बैठने और बात करने में आभा को सुकून मिल रहा था। इन   दिनों अकसर ऐसे लोग उसे अपनी ओर ज्यादा खींचते हैं और वह इनके बारे में ही अधिक सोचती है “बड़ा बेकार होता है बुढ़ापा! शरीर में कोई चमक नहीं, चेहरे में झुर्रियों से खिंच आयी रेखाएँ, हाथ पैर शिथिल और बेदम, कमर भी शरीर का वजन उठाने में असमर्थ और झुकी हुई, गालों का पोपलापन, आँखों की कोरों से बहता पानी, सन-से सफेद बाल, पैर घिसटते-से और आवाज ठहरी-सी।”

दोनों  दिन और रात उस कमरे की पहरेदारी में लगे हुए से थे। दो दिन हो गए थे मगर उन्हें कमरे से बाहर निकलते ही नहीं देखा। वृद्ध पुरुष को  फिर भी पैरों को घसीटते हुए किचेन तक आकर चाय बनाते देखा मगर महिला..! लगता था जैसे वह उस चारपाई से कभी उठी ही नहीं होगी।

आभा ने यूँ ही पूछा “माँ! आपको कैसा लगता है …मतलब यह बुढ़ापा …मेरे कहने का मतलब इस बुढ़ापे में कितना अशक्त लगता है न! इस कमरे में बैठे-बैठे ऊब जाती होंगी आप! हाथ-पैर जाम से हो गए लगते होंगे और भी तो बहुत सी चीजें होंगी जो आप इस उम्र में आकर महसूस करती होंगी ..कैसी होती है यह उम्र? आप क्या फील करती हैं?” डरते हुए उसने इतने प्रश्न कर ही डाले जो अकसर उसके मन में भय पैदा करते  हैं …वह भी तो पचास के करीब है और अब ढलान की गिनती…

महिला बोली “मत सुनो डर जाओगी।”

“नहीं माँ! मैं जानना चाहती हूँ कि जीवन के इस मोड़ पर इंसान को कैसा लगता है? वह क्या सोचता है?” उसने आग्रह किया।

“इस उम्र में आकर पिछला याद आता है काश! हमने यह भी कर लिया होता …वह भी कर लिया होता …मगर करने की न तो सुविधाएँ मिलीं न ही समय. बच्चों की देख-रेख में जीवन बिता दिया और अब उनकी देख-रेख के मोहताज हो जाते हैं …ज्यादा अच्छा खाने और पहनने का दिल तो अभी भी करता है.” महिला  सब कह गयी।

यानी इच्छाएँ अभी भी होती हैं?

हाँ क्यों नहीं …बल्कि बढ़ जाती हैं.

मतलब! आभा ने उत्सुकता की।

“एक बार जब मैंने डॉक्टर से पूछा कि मेडिकल साइंस क्या कहता है इस विषय में?  तो डॉक्टर बोले बुढ़ापा कोई उम्र नहीं होती …जब तक मन जवान है तब तक इन्सान जवान है. यदि वह अच्छा खाना और पहनना चाहता है तो इसका मतलब वह अभी भी जवान है।” कहते हुए महिला काले धागे में बँधी एक घड़ी गले में डाल बोली “देखो! अच्छी है न! इंदिरा गांधी भी इसी तरह की पहनती थी।”

हाँ अच्छी है …आभा ने मुस्कराते हुए कहा.

“बेटे से कहा है मेरे लिए टाइटन की घड़ी ला दे यह पुरानी हो चली है …नंबर बड़े छोटे हैं. देखने में दिक्कत होती है …देखो ये चेन कल ही बनवायी है …कुछ पैसा था मेरे पास और कुछ इनसे लिया …अच्छी है न? वृद्ध महिला ने गर्व से भरकर पूछा।

“हाँ ये भी अच्छी है। आप तो बड़ी अच्छी जिन्दगी जी रही हैं …फिर ऐसा क्यों कहा “मत जानो डर जाओगी।” आपको देख नहीं लगता कि  बुढ़ापा डरावना होता है… यह अच्छा नहीं होता …यह तो अच्छा है!”

बीच में ही महिला ने आभा को रोका और बोली “न …ना ये मत कहो कि ये अच्छा है हम इसे अच्छा बनाने के कोशिश करते रहते हैं।”

अचानक एक बदबू आभा के नथुनों में भर गयी…

शायद वृद्ध महिला के कमर में बँधी थैली भर गयी थी।

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द्वितीय

गंध

वंदना शांतुइंदु

चपरासी दरवाजा खोलकर अदब से बाजू में खड़ा रहा. सरस्वती घर में आयी और सोफे पर फिसल पड़ी. चपरासी पानी ले आया, वह एक ही सांस में पूरा गिलास पी गयी. उसकी नजर दीवार पर टंगी छवि पर गयी, बचपन से करती आई प्रार्थना ‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला…’ मन में आ गयी और उसने नज़र तरेर ली. उसको पहली बार संशय हुआ कि माँ जो कह रही है कि इस प्रार्थना की वजह से वह पढ़ने में तेज थी वह गलत है.

उसकी नज़र कोने में उकडू बैठे बीड़ी पी रहे उसके पापा पर गयी और उसका दिमाग फट पड़ा, “पापा, कितनी बार कहा कि इस तरह न बैठो पर आप हैं कि किसी की सुनते ही नहीं! सोफा है किसके लिए है?” वह जानती थी कि ऐसे बैठना पूर्वजों से मिली आदत है. पुट्ठे पर बंधा झाड़ू उन लोगों को पालथी मारकर बैठने नहीं देता था.

“क्या हुआ मेरी बेटी को, आज तो फ्लैट का बुकिंग करवा के आने वाली थी?” बोलते हुए सरस्वती की मम्मी लक्ष्मीबेन उसके सर पर हाथ रखने गयी पर सरस्वती खड़ी हो गयी.

“दूसरा क्या हो सकता है, वही जो सदियों से होता आया है वही.” उसकी मम्मी समझ गयी, रेगिस्तान में उठते बवंडर जैसा निसाँस छोड़ा और बोली, “सब ठीक हो जाएगा, चल हाथ-मुँह धोकर खाना…”

“अरे! क्या ठीक होगा, धूल और पानी? तेरी बेटी गेजेटेड ऑफिसर बन गयी पर उसके कपाल पर लगा जाति का सिक्का नहीं मिटता.” लक्ष्मीबेन बात को बदलते हुए बोली, “पहले दिया तो जला ले, खाते वक्त बात करते हैं.” सरस्वती आगबबूला हो गयी, “कोई दिया बिया कुछ नहीं, क्या अर्थ है? आज जिस बिल्डर ने मेरी जाति जानकर मुझे फ्लैट के लिए ना बोल दी उसके ऑफिस में ऐसी ही बड़ी छवि टंग रही है. क्या फर्क पड़ा बोल?

उन लोगों को अपने ही भगवान पर भरोसा नहीं है, तो ही ऐसा हो सके न? मुझे बोल रहा था कि अगर आपको फ्लैट बेचूँ तो मेरे दूसरे फ्लैट बिकेंगे नहीं.” सरस्वती का कंठ रुँधा. बीड़ी बुझाकर उसके पापा उठते हुए बोले, “और तू सत्य की पूछ पकड़े बैठी है, तेरी माँ जैसी ही तू मूर्ख, तुझे जाति बताने की क्या जरूरत थी? सत्य तो गया गाँधीबापू के साथ.”

“क्यों और कब तक ये सब चलेगा, आखिर क्यों?” एक गैज़ेटेड ऑफिसर आफिसर स्त्राी बिलख रही थी. उसके पापा रिटायर चपरासी थे और माँ सातवीं कक्षा तक पढ़ी थी पर उसकी सहज बुद्धि जबर्दस्त थी और मुँह पर बोलने वाली थी, घर आते पादरी को कह दिया था कि आप आयें जरूर पर हमारा धरम बदलने की बात नहीं करेंगे आप. धर्म किसी के बाप की जागीर नहीं है कि किसी के त्राास से छोड़ दें.” पादरी भी खुशमिजाज थे, हँसते हुए बोले थे,” चाय पीने तो आऊँ न लक्ष्मीबेन? काश! मेरी परदादी भी आप जैसी होती तो…” फिर दूर देखते हुए बोले थे “अत्याचार का अतिरेक हो तब इंसान धरम बदलता है.”

“बेटी को पढ़ा लिखा कर बड़ी साहब बनाऊँ तब मैं सच्ची.” सरस्वती के बालों में रिबिन की गाँठ मारते हुए लक्ष्मीबेन ने मन में गाँठ बाँधी थी कि बस्ती कभी नही छोडूंगी. पर ऑफिसर बनी बेटी के सामने उसका कुछ नहीं चला था और ऑफिसर्स क्वाटर्स में रहने आ गये थे. सरस्वती सगे-संबंधी से दूर रहने लगी थी. लक्ष्मी सरस्वती को समझाती कि हम ही हमारी बस्ती से दूर भागे तो दूसरे क्यों हमें गले लगायें! पर सरस्वती अनसुनी करती रहती.

सरस्वती खाने का ना बोलकर बेडरूम की ओर मुड़ी ही थी कि लक्ष्मीबेन ने कहा, “भागती क्यों हो? तेरे में जब मैंने अपनी बस्ती के प्रति घिन देखी थी तब मुझे मेरे दूध पर शर्म आयी थी. दो आखर क्या पढ़ लिया कि बस्ती गंध उठी! अभी भी कहती हूँ

चल…”

सरस्वती के पापा बीच में बोले, “तू तो मूर्ख है. लक्ष्मी, तेरा बाप क्या दो दिन साबरमती आश्रम में रह आया कि तुम लोग सुधारवादी के पुच्छ बन गये! वो मरे हुए पशु के चमड़े की गंध…” लक्ष्मी ने बीच में ही बात काटी “चुप रहो आप. ये बस्ती की गंध भूल जायेंगे तो सरस्वती जैसी ही फसल पकेगी. गंध आती हो तो नाक को नहीं गंध को बंद करना चाहिए. आप पुरुषों ने ही…” लक्ष्मी काँप रही थी. सरस्वती ने माँ का ऐसा रूप पहले कभी देखा नहीं था. वह अपनी मम्मी के पास आयी, उसके काँधे पर सर डाल दिया. माँ-बेटी दोनों के आँसू लक्ष्मी की छाती भिगो रहे थे.

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तृतीय

स्त्रीवादी पुरुष

मानवी वहाणे

आपको पता है, यह सिंदूर गुलामी की निशानी है!”

“हम्म ठीक है.”

“आपको पता है, यह व्रत-उपवास गुलामी की निशानी है!”

“जी सही है.”

“आपको पता है, स्त्राी देह वर्षों से पुरुषों की गुलाम रही है.”

“हाँ, यह तो है.”

“अपनी देह पर केवल आपका अधिकार होना चाहिए.”

“हाँ सच!”

“आपको वर्जिनिटी जैसे बंधनों से आजाद होना चाहिए.”

“हाँ, इसके चक्कर में हमने बहुत भुगता है!”

“तो कल मिलिए न.”

“जी, क्यों?”

“एक स्वतंत्र औरत की जिंदगी जीने के लिए…”

“जी… आप गलत समझ रहे हैं… मुझे यह सब पसंद नहीं.”

“तो क्या आप आजाद नहीं. होना चाहतीं?”

“जी लेकिन यह तो मैं तय करूँगी न…”

“क्या बकवास है! आप गुलाम हैं. और गुलाम ही बनी रहेंगी!”

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सांत्वना पुरस्कार

1-तिलिस्म

सविता इंन्द्र गुप्ता

 

“और भाई वर्मा जी, कहाँ चल दिए?”

“सब्जी लेने, इतवारी बाजार जा रहा हूँ.”

“वहाँ सब्जी के क्या भाव हैं आजकल?”

“यही कोई सोलह रुपये किलो आलू और तीस रुपये गोभी.”

“सुपर मॉल से क्यों नहीं लाते? आलू नौ रुपये और गोभी सोलह, काफी बचत हो जाएगी.”

“यह तो अच्छी बात बतायी.”

उनके कदम सुपर मॉल की ओर बढ़ गये. एक किलो की जगह तीन-तीन किलो तुलवा लिये. एक खूबसूरत स्टाफ ने बताया, “सर, हमारे यहाँ कई ऑफर चल रहे हैं, आज अंतिम दिन है. प्लास्टिक के सामान, किराना, किचन वेयर, एक बार देख लें, भले ही न लेना.”

वहाँ की वातानुकूलित चका-चैंध का असर कहो या फीमेल स्टाफ की शहद लिपटी बातों का. हाथ रोकते-रोकते भी बारह सौ का सामान खरीद लिया. फिलहाल जरूरत के एक दो आइटम ही थे. उन्हें ठगे जाने का सा भाव साल रहा था. तभी कैश काउंटर पर बैठी मुग्धकारी मुस्कान लिये सेल्स गर्ल ने उन्हें लालच दिया, “सर, आपका बिल बारह सौ का बना है यदि आप आठ सौ की शॉपिंग और करते हैं तो आपको दो सौ रुपये का गिफ्ट वाउचर मिलेगा अर्थात आठ सौ का सामान सिर्फ छह सौ में.”

उसे अनसुना करते हुए, वे मॉल से तेजी से बाहर निकल गये, जैसे उन्हें निगलने को अजगर ही अजगर मुँह बाए बैठे हों.

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सांत्वना पुरस्कार

 

2-लव-जिहाद

महेश शर्मा

“बेकस पे करम कीजिये! सरकारे मदीना!”

इस गाने की आवाज़ जैसे ही शर्मा जी के कानों में पड़ी, तो वो एकाएक हड़बड़ा उठे.

“विधर्मियों का गाना? मेरे घर में?’ वे भौंचक्के रह गये‘कौन बजा रहा है साला?’

गाने का पीछा करते हुए, शर्मा जी, दनदनाते हुए, अपनी बेटी के कमरे में घुसे. बिस्तर के पास वाली टेबल पर एक मोबाइल फोन था ,जिस पर कोई कॉल कर रहा था और, रिंगटोन के रूप में यह गाना बज रहा था.

शर्मा जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया. फोन उनकी बेटी का ही था, जिसे वो ऑफिस जाने की जल्दबाज़ी में, साथ ले जाना भूल गयी थी.

जब तक शर्मा जी फोन तक पहुँचते, रिंग टोन बंद हो गयी. चश्मा लगाकर, उन्होंने जब कॉल डिटेल चैक की, तो जो पहला नाम स्क्रीन पर चमका, उसे देख, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी.

‘निसार?’ उन्हें लगा, वे गश खाकर गिर जायेंगे ‘ये वही तो नहीं, जो बिटिया के ऑफिस में काम करता है! उस कुरैशी का लड़का!’

फटी-फटी आँखों से, वे काफी देर तक फोन को घूरते रहे. फिर धड़कते दिल से, निसार के नम्बर पर कॉल बैक कर, फोन अपने कान से लगाया तो उस ओर कॉलर टोन बजने लगी.

”दर्शन दो घनश्याम !नाथ मोरी अंखिया- प्यासी रे!”

शर्मा जी को सचमुच गश आ गया.

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सांत्वना पुरस्कार

3-लेकिन जिन्दगी

कस्तूरीलाल तागरा

पहले वह माफिया डॉन था. फिर नेता बन गया. बीती रात वह किराये पर लाये गये

एक अद्भुत सौंदर्य के साथ जमकर सोया. महँगी विदेशी शराब पिलायी उसे. खुद भी छक के पी. सुबह जब थकान से आँखें भारी होने लगीं तो सौंदर्य से पूछा- “कैसे आयीं तुम इस धंधे में?”

वह पहले उदास हो गयी. फिर आँखों में खून भरकर बोली- “अपना मर्द ही नीच  निकला…”

माहौल में चुप्पी छा गयी.

कुछ देर बाद नेता ने सवाल किया- “एजेंट को कितना परसेंट देना पड़ता है?”

वह फट पड़ी- “कमाई का आधा ही मिलता है मुझे. कभी-कभी तो उसमें भी बेईमानी कर जाता है कमीना दलाल.”

नेता गुस्से से बोला- “ये दल्ले साले होते ही ऐसे हैं… लो बताओ, ऐसे काम में भी डंडी मार जाते हैं …कीड़े पड़ेंगे इन हरामियों के शरीर में.”

नेता के इस नैतिक भाषण पर वह व्यंग्य से मुस्कुराने लगी. नेता झेंप गया. और झेंप मिटाने के लिए नकली हँसी हँसने लगा. फिर बात बदलते हुए बोला- “मैंने तुमसे तुम्हारा नाम तो पूछा ही नहीं.”

“अब याद आयी आपको मेरे नाम की. क्या करेंगे नाम जान के साहब?… रात आप बहुत से नामों से प्यार कर रहे थे मुझे. उन्हीं में से कोई एक नाम समझ लो.” और वह अपना निचला होंठ खास रोमांटिक अंदाज से काटने लगी.

नेता उसकी इस अदा पर बौरा-सा गया. लरजती आवाज में बोला- “बेबी डॉल! तुम तो हमें मार ही डालोगी.”

वह तुरन्त बोली- “अरे हाँ! याद आया, बेबी डॉल ही तो है मेरा नाम.”

नेता ने जोर से ठहाका लगाया ओर उसे अपने और नजदीक कर लिया.

सौंदर्य ने एक चोर नजर दीवार-घड़ी पर डाली. फिर चतुराई से उठी. तत्काल अपने कपड़ों को व्यवस्थित किया और दरवाजे की चिटकनी खोलते हुए बोली- “मेरा टाइम हो गया साहब… अब चलती हूँ… सलाम.”

नेता ने चैंककर पूछा- “तुम मुसलमान हो?”

जवाब में वह बोली- “जय राम जी की.”

और कमरे से बाहर निकल गयी.

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सांत्वना पुरस्कार

4-कौन बनेगा राष्ट्रवादी

मार्टिन जॉन

“देवियो और सज्जनो, नमस्कार, आदाब… आपका राष्ट्र ऋषि सुमन, फिर से एक बार ‘कौन बनेगा राष्ट्रवादी’ में स्वागत करता है, अभिनन्दन करता है!”

तालियों की गड़गड़ाहट से स्टूडियो गूँज उठता है. स्टूडियो परिसर के अन्दर चारों ओर चक्कर काटती रंग-बिरंगी रोशनियों के साथ बैकग्राउंड से पैट्रोयॉटिक धुन भी गूँजने लगती है. रंग-बिरंगी रोशनियाँ कभी राष्ट्रीय ध्वज का आकार ले लेती हैं तो कभी भारत माता की.

“…मेरे सामने हॉट सीट पर विराजमान हैं रोलओवर कंटेस्टेंट हिंद कुमारजी, जो अब तक चैदहवें प्रश्न का उत्तर देकर खेल का दूसरा पड़ाव पार कर चुके हैं. …इनके साथ आयी हैं इनकी पत्नी वन्दे देवी और जोड़ीदार के रूप में पिता श्री स्वदेश कुमार. …बहुत बहुत स्वागत है आप दोनों का.”

बैकग्राउंड संगीत के साथ फिर तालियाँ बजती हैं.

“…हिंद कुमार जी, कम्पूटर की स्क्रीन पर जो अगला प्रश्न आएगा, उसका मूल्य है एक करोड़ रुपये. …खूब ध्यान से खेलिएगा! …आप तैयार हैं?”

“जी सर!”

“लेट्’स प्ले ‘कौन बनेगा राष्ट्रवादी’ पावर्ड बाई नकूल दूध… नकूल दूध पीता है इंडिया!”

पाश्र्व संगीत के साथ तालियों की गड़गड़ाहट और तेज हो जाती है.

“हिंद कुमारजी, ये रहा अगला प्रश्न आपकी स्क्रीन पर…”

कम्प्यूटर की स्क्रीन पर एक विशेष धुन के साथ उभर आए प्रश्न को होस्ट का किरदार निभा रहा राष्ट्र ऋषि सुमन ऊँची आवाज में पढ़कर सुनाता है, , “अगर कोई व्यक्ति राष्ट्र की शासन प्रणाली अर्थात सिस्टम की खामियों को उजागर कर उसकी आलोचना करता है तो उसे क्या कहा जाएगा? ऑप्शन हैं-

(ए) राष्ट्रविरोधी (बी) राष्ट्रनिंदक (सी) राष्ट्रचिंतक (डी) आलोचक

हिंद कुमार अब तक के अर्जित अपने ‘राष्ट्र ज्ञान’ के पलड़े पर चारों ऑप्शन्स को एक-एक कर तोलता है. अब तक के सारे सवालों के सही-सही जवाब देकर वह स्वयं को राष्ट्र ज्ञानी होने का प्रमाण दे चुका है. अगर वह इस प्रश्न का सही उत्तर दे देता है तो ‘राष्ट्रवादी’ कहलाने से उसे कोई रोक नहीं सकता.

“क्या चल रहा है आपके मन में?” होस्ट राष्ट्र ऋषि सुमन की भारी भरकम आवाज फिर गूँजती है.

“देखिए हिंद कुमार जी, आपकी चारों लाइफ लाइन चली गयी हैं. अब अनुमान से काम नहीं चलेगा. …अगर उत्तर गलत हो गया तो इस महान उपाधि और एक करोड़ की धनराशि से हाथ धो बैठिएगा.”

दर्शकदीर्घा में खामोशी छायी हुई थी. दिल की धड़कनों और साँसों को बेकाबू करने वाला पार्श्व संगीत और तेज हो गया.

हिंद कुमार ने जुबान खोली, सर, ‘ए’ राष्ट्रविरोधी!”

“आप श्योर हैं?”

“जी, सर”

“क्या करना चाहिए?”

“सर लॉक कर दीजिए!”

“कंप्यूटर महोदय, आप्शन ‘ए’ राष्ट्रविरोधी पर ताला लगाया जाए!”

आप्शन ‘ए’ लॉक होने के बाद होस्ट ने हिंद कुमार को भरपूर नजरों से देखा. फिर दर्शकदीर्घा की ओर नजरें घुमायीं. कुछ देर खामोश रहने के बाद लगभग चीखते हुए खड़े हो गये, “राइट आंसर… राइट आंसर …आप जीत गये एक करोड़ …आप बन गए राष्ट्रवादी …वेल प्लेड …तालियाँ …तालियाँ बजाकर बधाई दें आडियंस.”

“लेकिन दर्शक दीर्घा में कोई हलचल नहीं हुई. वहाँ सवालिया सन्नाटा पसरा हुआ था. स्टूडियो में केवल होस्ट की ही तालियाँ गूँजती रहीं.”

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सांत्वना पुरस्कार

5-पटरी पर सीख

सुभाष अखिल

वह रविवार की एक दोपहर थी. कुछ अच्छी पुस्तकों की तलाश में दरियागंज के पटरी पर लगने वाले पुस्तक बाजार में चले आना, मेरे शगल में शामिल था. प्रेमचंद्र, प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध  सब मुझे यहां इस पटरी बाजार में मिल जाते.

ऐसी ही एक दुकान पर जब मैं उस दिन पहुँचा, तो मेरे होश फाख्ता हो गये. मुझे लगता था कि मेरे पूर्ववर्ती लेखक-कवि ही यहाँ मिलते हैं. तभी मेरी निगाह, पटरी की एक दुकान पर रखी मेरी अपनी किताब पर पड़ी.

मेरी किताब…. और यहाँ!

मन बहुत आहत हुआ. मैं कोई महान लेखक नहीं था, जिसकी सैकड़ों किताबें छपती हों. पहली ही किताब थी.

पुस्तक को मैंने उठाया. पलटा, तो देखा कि पहला पृष्ठ फटा हुआ था. मुझे ध्यान आया- ‘पहली पुस्तक की कुछ प्रतियाँ तो मैंने बहुत-से मित्रों को भेंट की थीं’. यह भी शायद किसी मित्र  को ही दी गयी थी, जिसने पहला पृष्ठ फाड़कर इसे यहाँ पहुँचा दिया.

देखा- उसकी कीमत 35 रुपये लिखी थी. दुकानदार से पूछा, “इसका क्या दूँ?” क्योंकि अपनी पुस्तक को यूँ पटरी पर पड़े देखना बहुत नागवार गुजरा था.

उसने मेरे हाथ से किताब ली. पलटी और पुस्तक पर छपी कीमत देखकर बोला, “15 रुपये!”

“यह तो बहुत ज्यादा है. पुरानी भी है और फटी भी” मैंने कहा.

उसने तुरंत मेरे हाथ से किताब ली, “आगे बढ़िए… इससे कम नहीं होगा.” किताब वहीं पटक दी।

यह तो अपमानजनक था। मैंने पुनः किताब उठायी और पंद्रह रुपये चुपचाप दे दिये। फिर बोला, “तुम घाटे में रह गये उस्ताद जी!.. इस किताब के यदि तुम सत्तर रुपये भी माँगते, तो मैं दे देता !”

उसने झटके-से किताब मेरे हाथ से ली। उलट-पलट कर देखा। फिर बोला, “इसमें ऐसा क्या है सा‘ब जी?” किताब उसने मुझे लौटा दी।

“यह मेरी किताब है। यानी, यह मैंने लिखी है और मैं इसे यहाँ नहीं पड़ा रहने दे सकता था।” मैंने कहा।

वह बड़ी मासूमियत से मुस्कराया। फिर बोला, “एक बात कहूँ सा’ब जी, बुरा तो नहीं मानोगे?… किताब में क्या लिखा है, यह तो मुझे नहीं पता… मगर घाटे में तो आप रहे. यदि आप पहले बता देते कि यह आपकी लिखी किताब है, तो मैं आपसे एक पैसा भी नहीं लेता और किताब आपको दे देता !… मैं तो पढ़ा-लिखा नहीं हूँ सा’ब जी, मगर लेखक लोग की मैं बहुत इज्जत करता हूँ. उन्हीं के लिखे पर हमारे बच्चे पलते हैं!”

इसके बाद वहाँ से चुपचाप निकलकर, मैं दूसरी दुकानों के सामने जमा भीड़ में खो गया।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

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    -सम्पादक द्वय

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