नवम्बर -2018

अध्ययन -कक्षअपने अपने क्षितिज     Posted: November 1, 2018

हिन्दी में लघुकथा की केन्द्रीयता उसके प्रसार के साथ कथ्य की बुनावट में लक्षित हो रही है। अनुभव को दृष्टि के साथ कलात्मक स्थापत्य देने के प्रयास भी हो रहे हैं। भले ही मुद्रा स्फीति की तरह लघुकथाओं का अनियंत्रित प्रकाशन धड़ल्ले से हो रहा है। अपने-अपने क्षितिज लघुकथा संकलन इस मायने में विशिष्ट है कि लघुकथा के धरातल के साथ उसकी बुनावट पर विशेष ध्यान रखकर चयन किया गया है। संपादकों ने भूमिका में ही इनमें से नये रचनाकारों के विशिष्ट पक्ष के मंडल के साथ उन शिथिलताओं पर बेबाकी से लिखा है, जो बेहतर लघुकथाओं के सृजन की दृष्टि से पाथेय है, यही नहीं नये लघुकथाकारों के पार्श्व में उन हस्ताक्षरों को भी रखा गया है, जिनके पास सृजन के चालक पक्ष के साथ नयी रचनाभूमि को लघुकथा में समेटने की आकुलता है।

हिन्दी लघुकथाओं की ज़मीन पारंपरिक विषयों से जितनी पकी है उतनी ही नए विषयों को तलाशने में उसके भूगोल का अभिवर्धन कर रही है। सुचिंतित लघुकथाकार लघुकथा के व्याकरण में सिमटे नहीं हैं, बल्कि उसका अतिक्रमण भी कर रहे हैं और साहित्य की अन्य विधाओं के संक्रमण से उसके स्थापत्य को कथ्य से रिला-मिला कर लघुकथा की क्षमता का परिचय दे रहे हैं। यह भी कि लघुकथा की सैद्धांतिकी के साथ सामाजिक विमर्श भी उसकी वैचारिकी को अनुभूति में रुपांतरित कर रहा है। अपने परिवार समाज तक सिमटी लघुकथा अब प्रवासी, विदेशी ज़मीन पर उगे अनुभव संसार को भी समेट रही है। उसमें अर्थ का ग्लोबल बाज़ार भी झांक रहा है, विस्थापन की पीड़ा भी और परिवार की दरकती ज़मीनें भी। यह संग्रह घर की अंतर्दशाओं से निकलकर देश-विदेश और भूमंडलीकरण से उपजी मनोदशाओं, सामाजिक सांस्कृतिक बदलावों को भी समेटता है। अलबत्ता अन्य देशों की लघुकथाओं के प्रभाव और तज्जनित परिवर्तनों की छाया इनमें दृष्टिगत नहीं होती।

घर-परिवार से जुड़ी लघुकथाओं में ममत्व और विस्थापन, युवा-वृद्ध तकरारें, दांपत्य के सुख-दुख, पारिवारिक दायित्वों के बोझ का कसैलापन, करियर और पारिवारिक छिटकाव, लड़का-लड़की का फर्क, पारिवारिक अर्थशास्त्र में उलझी संतान कामना, पीहर ससुराल के बीच स्त्री, पारिवारिक रिश्तों का स्नेहिल अंतर्ग्रंथन, बच्चों की समझ और अभिभावकों की शंकाएँ, दहेज की विद्रूपताएँ, लिव इन के रिश्ते जैसे अनेक पार्श्व उभर कर आए हैं। अंतरा करवड़े की ‘ममता’ ; अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव की ‘पगफेरे’ ; अशोक जैन की ‘ज़िंदा मैं’ ; अशोक भाटिया की ‘यक्षप्रश्न’ ; ओमप्रकाश क्षत्रिय की ‘षड़यंत्र’ ; कपिल शास्त्री की ‘सेफ्टी वॉल्व’ ; कमल चोपड़ा की ‘वैल्यू’ और ‘प्लान’ ; कांता रॉय की ‘परिवार’ ; ज्योत्सना सिंह की ‘दंश’ ; दीपक मशाल की ‘बड़प्पन’ ; नीरज सुधांशु की ‘अपेक्षा’ ; बलराम अग्रवाल की ‘गुलाब’ ; रतन राठौड़ की ‘निदान’ ; रेणुका चितकारा की ‘तूफान’ ; विभा रश्मि की ‘पड़ोसी धर्म’ ; डॉ. श्याम सखा श्याम की ‘मूछें मुस्कुरा उठीं’ ; डॉ. शील कौशिक की ‘वार्तालाप’; डॉ. संध्या तिवारी की कठिना पारिवारिक जीवन के उलझे-सुलझे व्यवहारों को कथ्यपरक बनाती हैं।

सामजिक जीवन की विसंगतियों को अपना वैचारिक संस्पर्श देती लघुकथाओं में जातिवाद, अंधविश्वासों और रूढ़ियों से विद्रोह, धार्मिक कट्टरताओं पर तंज, दंगों और सांप्रदायिक विद्वेशों की सामाजिक मनोभूमि, बच्चियों के साथ कुत्सित हरकतें, गरीबी का अर्थशास्त्र और सामाजिक स्तरभेद की विषमता, पॉश कॉलोनियों के उजाड़ रिश्ते, उच्च और निम्न वर्ग के संघर्ष, किन्नरों की व्यथा, अभावों की सिसकन, दंगों का जातीय मनोविग्यान, स्टेटस के रोग जैसे कई कोणों से रचनाकारों ने समाजशास्त्र को यथार्थ रंगत दी है, कहीं विद्रोह और अतिक्रमण से बदलाव को हवा दी है। अरुण कुमार गुप्ता की लघुकथा ‘दर्शन’ ; कपिल शास्त्री की ‘चार रुपये की खुशी’ ; कुसुम जोशी की ‘बेआवाज़’ ; चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘दूध’ ; नयना आरती कानिटकर की ‘सिलसिला’ ; बलराम अग्रवाल की ‘अपने-अपने मुहाने’ ; मधुदीप की ‘हथियार’ ; मीना पांडेय की ‘गैर ज़रूरी प्रश्न’ ; मोहित शर्मा की ‘किन्नर मां’ ; योगराज प्रभाकर की ‘पहचान’ और ‘अपने-अपने सावन’ ; रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘जहरीली हवा’ ; विभा रश्मि की ‘फ़र्क’ ; श्याम सुंदर अग्रवाल की ‘गिरे हुये लोग’ उस समाजशास्त्र को बुनती हैं जिसके सिरे इन लघुकथाओं का यथार्थ बने हैं।

नारी विमर्श आमतौर पर साहित्य की हर विधा में केन्द्रीय बना है। पुरुषवादी वर्चस्व को चुनौती देती इन लघुकथाओं में केवल विरोध नहीं, साहचर्य का सांस्कृतिक भूगोल भी है, नारी के सहकार के साथ उसकी कमज़ोर आंकी जाती शक्ति की विद्रोही ताकत भी है। गृहिणी के घरेलू काम की अस्मिता केवल त्याग में न रंगकर विवेक और अधिकार का रास्ता तलाशती है। कहीं-कहीं पति या पिता का पिघला मन नारी के प्रति उदात्त सहकार को संजोता है पर कभी ‘चंगुल’ की माँ पति को दरकिनार कर मातृत्व के तेज को तथाकथित सामाजिक बदनामी पर नये प्रकाश में उजाला देती है। कहीं ‘मैं हूं न तेरे साथ’ का नारी सहकार, कहीं कौमार्य परीक्षण से नारी की पवित्रता का अंकन करने वाली पुरुष मनोवृत्ति को नारी की लात का आक्रोश, कहीं वात्सल्य की धारा, कहीं नारी की बेबसी, कहीं पत्थर इंसान के बीच औरत का दर्द, ‘फैसला’ में औरत की निर्णायक शक्ति जैसे कई रूप पुरुषवादी वर्चस्व को चुनौती देते हुये अपनी अस्मिता को बुलंद करते हैं। ‘वंशवृक्ष’; ‘बेनाम रिश्ता’ ; ‘गाय’ ; ‘बेड़ियाँ’ ; ‘जागरण’ ; ‘मुठ्ठी भर धूप’ ऐसी ही लघुकथाएँ हैं।

यों इन लघुकथाओं में राजनीति के परिदृश्यों पर तीखे व्यंग्य भी हैं, पर्यावरण की चिंताएँ भी हैं, बेरोज़गार युवाओं में करियर की दरकार और भविष्य की चिंताएँ भी हैं, प्रशासनिक लालफीताशाही के कंटीले इंतज़ार भी हैं, भ्रष्टाचार के कागज़ी कारनामे भी हैं, अस्पतालों के धोखे भी हैं, पुलिसिया दलाली के गोरखधंधे भी हैं, दफ्तरिया बॉस का सौंदर्य -पिपासु चरित्र हैं। पर इन सभी पार्श्वों में कहीं भी ठेठ गंवई किसानी चित्र नहीं है जो कपास के फूल की तरह उजला है और अभावों में आत्महत्या तक मजबूर। ग़रीबी के परिदृश्य  कुछ कसकीले परिदृश्यों  का वृत्त माँगते हैं। अधिकतर लघुकथाएँ मध्यम वर्ग में सिमटी हैं। चरित्रों का मनोविग्यान वृत्तों की आंतरिकता के साथ गहराई माँगता है। वर्णन या संवाद शैली नई शैलियों के साथ कदम नहीं मिला पाती। प्रयोग शीलता का नवोन्मेष वृत्तियों से लेकर वाक्यों और शब्दनाद के साथ प्रतीकों , बिंबों या नरेशन में सांकेतिकता की माँग करता है। अभी राजनीति और भ्रष्टता के वे आंतरिक अध्याय उसके अंतर्जाल की गहरी बुनावट माँगते हैं। फिर भी बॉडी लेंग्वेज, विजुअल, क्रियात्मक गतिशीलता, संवादी संचार, नेपथ्य की बुनावट, लेखक की उपदेशपरकता से मुक्त कथा-संघटना, लेखकीय प्रवेश पर अंकुश जैसी विशिष्टताओं के साथ लघुकथा की बुनावट में अन्य विधाओं के संक्रमण को लक्षित किया जा सकता है।

इस संग्रह के कतिपय विशिष्ट रचनाकारों के प्रतिदर्श बना कर लघुकथा के इस संग्रह की बात करना ज़रूरी है, जो लेखकों को अपने-अपने क्षितिज को और व्यापक और उनकी संघटना को कसावट लाते हैं। सुकेश साहनी की ‘वायरस’  फिल्मी प्रभावों के पारिवारिक संक्रमण को विवश सहजता तक ले जाती है। उनकी संघटना में प्रत्येक इकाई अपने अर्थ की प्रयोजकता में सिद्ध होती है। कमल चोपड़ा कथावृत्त के साथ संदेश को एकमेक कर देते हैं। नीरज सुधांशु ‘सौदा’ में विमुद्रीकरण की पगडंडी दिखाती है नए कथा-तल के साथ। बलराम अग्रवाल संकरीली पगडंडियों से टकराते हुए मानवीय क्षितिज को संवेदी बनाते हैं। अशोक भाटिया ‘पार्टी लाईन’ में राजनैतिक मूल्यों पर संवादी चुस्ती के साथ गहरा व्यंग्य कर देते हैं। अशोक जैन परिदृश्यों की संवादी और विजुअल भाषा में विवश पात्र के भीतर अस्मिता की दमक भर देते हैं। मधुदीप समांतर रूप से विरोधी रंगों की योजना कर मल्टी और मजदूर बस्ती के टकराव को हुंकार में बदल देते हैं। योगराज प्रभाकर ‘नींव के पत्थरों’ की अनुगूँज को युवा पीढ़ी की सृजनात्मकता में तलाशते हैं। रामेश्वर काम्बो ‘हिमांशु’ ‘दूसरा सरोवर ‘ में बिना लाऊड हुए सांकेतिक मार कर जाते हैं। सुभाष नीरव ‘बर्फी’ में चरित्र का रेशा-रेशा बिखेर देते हैं संवादी शिल्प की संरचना और संदर्भानुसार घटना चक्र की संरचना से। निश्चय ही ये जितने विषयगत नएपन के क्षितिज हैं, उतने ही लघुकथा की शिल्पगत बुनावट और कसावट के भी। इसमें दो राय नहीं कि नये लघुकथाकार संजीदा ढंग से अब तकनीक और जीवन, देश-विदेश के अनुभव और नयी कथा-भूमियों की तलाश कर रहे हैं। पर ये प्रतिदर्श नये कथाकारों के लिए मार्गदर्शी हैं। भले ही ये उन मार्गों की अनदेखी करें, पर नवोन्मेषी नज़रिये का मार्ग चुनने की अनुभविता तो ले ही सकते हैं। संपादक डॉ. जितेन्द्र जीतू का समीक्षक रूप भी इस पुस्तक का बेबाकीभरा अध्याय है, जो नयी पीढ़ी में लघुकथा के संदेश एवं बुनावट के व्याकरण को दिशा देता है।

-०-पने-अपने क्षितिज;संपादक- डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ व डॉ. नीरज सुधांशु.प्रकाशक- वनिका पब्लिकेशन्स, दिल्ली,वर्ष- 2017,मूल्य-500 रुपये

-०-बी.एल. आच्छा,36, क्लीमेंस रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे,पुरुषवाकम, चेन्नई(तमिलनाडू)-600007

मोः 09425083335

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine