नवम्बर -2018

देशआज की दुर्गा     Posted: November 1, 2018

आज शुभि को दिल्ली जाना था एक प्रेजेंटेशन के लिए। स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए उसकी नज़र आसपास पड़ी।हद से ज्यादा भीड़ थी वहाँ।स्टूडेंट्स ही थे ज्यादातर। पैर रखने तक को जगह नहीं थी।शुक्र है, उसने रिजर्वेशन करवा लिया था । और वैसे भी कॉलेज की प्रेजिडेंट और ब्लैक बेल्ट चैंपियन होने से उसमें आत्मविश्वास भी गज़ब का था। फिर उसे किसका डर?यह  सब सोचते हुए उसने खुद को दिलासा दिया। पास ही में करीब उन्नीस -बीस ग्रामीण लड़कियों का एक ग्रुप था, जो कि स्टेशन पर ज़मीन पर ही बैठीं हुईं था।उन्हें देख उसने मुँह बिचकाया ‘हुँह गंदे गँवार लोग’। उनमें से कुछ किताब खोले पढ़ भी रहीं थीं। उनकी बातों को सुनकर लगा ,कल पुलिस कांस्टेबल का एग्ज़ाम है, जिसे वे भी देने जा रहीं हैं। ‘उफ़्फ़! तभी इतनी भीड़ है आज’। उसने सोचा।

तभी सीटी बजाती हुई ट्रेन भी आ गई।आश्चर्य से आँखें फैल गईं उसकी।पूरी ट्रेन पर,खिड़कियों पर यहाँ तक कि छत पर भी  ढेर सारे लड़के ही लड़के बैठे हुए हैं। तिल भर भी जगह नहीं। एक बार वह डरी,थोड़ा सहमी पर फिर उसके अंदर की ब्लैक बेल्ट चैंपियन बोल उठी ‘अरे!तू ही डरेगी ,तो इनके जैसी गँवार,कमज़ोर लड़कियाँ क्या करेंगी भला? कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तेरा, चल चढ़ जा।’
धक्का -मुक्की करके वह चढ़ने लगी । उसके थर्ड ए.सी. डब्बे में बगल में ही जनरल लेडीज कोच था ,जिसमें वह ग्रुप भी चढ़ रहा था। एक बार फिर से मुँह बिचका दिया उसने घृणा से।अपने डिब्बे में गई, तो देखा ऊपर-नीचे सब जगह लोगों ने डेरा जमा रखा था। उसने उन्हें हटने को कहा, तो बोले-“मैडम जी आज कोई रिजर्वेशन न है कोई कौ। आज तौ बस हमारौ ही राज़ रहैगो यहाँ।”
हालाँकि उसे बैठने की जगह तो दे दी ,पर उस डब्बे में वह अकेली ही लड़की थी। बाकी  सब आवारा, गँवार  से दिखने वाले लड़के ही कब्ज़ा करके बैठे थे। ट्रेन चल पड़ी, रात के आठ बजे थे।कॉलेज में उसने इतने आवारा मजनुओं को ठोका है। पर यहाँ तो पूरा डब्बा ही आवारा मजनुओं से भरा पड़ा है। वे  उस पर फब्तियाँ कसने लगे।अँधेरा बढ़ते ही, कुछ तो उससे सटकर बैठ गए और जैसे ही उनमें से एक ने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया ,उसने उसे कसकर उसे एक जोरदार  लाफा मार दिया। इससे वे  सारे तैश में आ गए और उसे पकड़ लिया और उनमें से एक लड़का बोला- “ले अब हम तुझे सिर्फ छुएँगे ही नहीं तेरे साथ….ऐसा कहकर दूसरे लड़के की तरफ आँख दबाते हुए बेशर्मी से ठहाके मार कर हँसने लगा-“ले अब बुला ले किसी को खुद की इज़्ज़त बचने के लिए”जैसे ही उसने उसके टॉप की तरफ हाथ बढ़ाया। एक लात उसके मुँह पर लगी और दो दाँत टूटकर बाहर आ गिरे उसके। शुभि ने भौंचक्की होकर सामने देखा, तो सामने उन्हीं लड़कियों का ग्रुप खड़ा था। उनमें से कुछ ने उन लड़कों को हॉकी से ठोकना शुरू किया।धड़ाधड़ हाथ  और लातें चल रहीं थीं उनकी। चोट खाए नाग की तरह जब सारे लड़के एक साथ उनकी ओर बढ़ने लगे ,तो हाथ में उन लड़कियों ने बड़े बड़े चाकू निकाल लिये और बोलीं- “बेटाऔ, वहीं रुक जाओ, नहीं तो एक -एक की गर्दन अभी नीचे पड़ी होगी।”
“चलो मैडम हमारे साथ। इस दुनिया में जब रावण ही रावण भरे  पड़े हों ,तो हमें खुद ही दुर्गा बणना पड़ेगो। कोई राम न आवेगों हमें यहाँ बचावे ।”

 

गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    सुकेश साहनी

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