नवम्बर -2018

देशमोतियाबिंद     Posted: November 1, 2018

रात को अचानक सात वर्षीय बबलू पता नहीं कैसे बेहोश हो गया। दस बज गए थे। नए शहर में मिश्रा जी को डॉक्टरों के बारे में न जानकारी थी, न ही पास में पैसे। दो माह से तनख्वाह भी तो नहंी मिली थी, पिछले दफ्तर ने सर्टिफिकेट जो नहीं भेजा था।

श्रीमती जी को तो बुरा हाल था, मिश्रा जी भी घबरा गए। करें तो क्या करें। मोहल्ले में किसी से मेलजोल भी नहीं बढ़ाया। वे बहुत ऊँचे पद पर नहीं थे, फिर भी मोहल्ला उन्हें अपने स्तर का नहीं लगा। ट्रांसफर के बाद अच्छे मोहल्ले में मकान मिला नहीं, सो मजबूरी में एक बार यहीं ले लिया। पिछले माह ही पड़ोस का रामबिलास आया और बोला, ‘‘रिश्तेदार आए हैं, गैस खत्म हो गई….सिलैंडर है? तो….।’’ जान न पहचान, कैसे दे देते सिलंडर? जवाब दे दिया। फिर ‘बेटी की शादी  है’ के नाम पर बार-बार कुछ-न-कुछ माँगने आते रहे। श्रीमती जी हर बार गोलमोल-सा जवाब देती रहीं।

मिश्रा जी ने जल्दी में स्कूटर बाहर निकाला, मगर वह भी ऐन मौके पर जवाब दे गया। बहुत कोशिश की लेकिन स्कूटर-टस-से-मस नहीं हुआ। ‘‘क्या बात हो गई, मिश्रा जी?’’ अचानक रामविलास के बोल कानों में पड़े।

उनकी श्रीमती जी ने घबराहट में सारी स्थिति बयान की।

रामबिलास ने जल्दी -से अपना स्कूटर निकाला। बबलू और मिश्राजी को पीछे बिठाया और अस्पताल की ओर चल दिया। समय से उपचार होने से बबलू अगले दिन ही ठीक हो गया।

मिश्रा जी व उनकी पत्नी रामबिलास से आँख नहीं मिला पा रहे थे, ‘‘हम तो आपके अपने भी न थे, फिर भी आपने पैसे भी दिए और सारी रात अस्पताल में भी रहे…..।’’

‘‘पड़ोसी भी अपने ही होते है…और अपने ऊपर से थोड़ा न गिरते हैं, जरूरतों के वक्त… और आँखों में मोतियाबिंद न हो ,तो जल्दी पहचाने जाते हैं।’’ रामबिलास ने मन ही बात कह ही दी।

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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