नवम्बर -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: November 1, 2018

1-उपेक्षित 

वह कक्षा में फर्श पर अकेला बैठा रहता था। कक्षा के लगभग सभी विद्यार्थी उसे अपने साथ बेंच पर बैठाने से कतराते थे। उसकी पैंट की दोनों जेबें उधड़ी रहती और ऊपर के दोनों बटन कमीज से नदारद। शरीर हड्डियों का ढाँचा था और दाँत पीले पड़े हुए थे। उसके करीब खड़े होने पर एक तीखी बदबू नथुनों में उतर जाती । अपने पीरियड में तो मैं उसे दूसरे बच्चों के साथ बेंच पर बैठा देता, परंतु बाद में वह फिर से फर्श पर बैठा नजर आता। पिछले कई रोज से मैं उसे अपने विषय की पाठ्य-पुस्तक लाने के लिए टोक रहा था, परंतु वह रोज एक ही जवाब देता, ।” मास्टर जी,  कल ले आऊँगा।”

उस दिन मैंने कक्षा में पढ़ाने के लिए पुस्तक खोलते हुए  सभी विद्यार्थियों पर एक नजर डाली। वह कक्षा में अकेला था ,जो फिर से किताब नहीं लाया था।

 “क्यों बे, तू आज भी किताब नहीं लाया?” मैं उस पर गरजा।”

“मास्टर जी, कल ले आऊँगा।”

उसका जवाब सुनकर मैं गुस्से से भर गया और बालों से खींचते हुए उसके गाल पर चार-पाँच थप्पड़ जड़ते हुए बोला,  ” किताब क्यों नहीं लाता तू?… क्या करता है तेरा बाप?”

 “सर, इसके माँ-बाप नहीं हैं, अपने चाचा के पास रहता है।” उसकी बगल में बैठा लड़का बोला।

 यह सुनकर मेरा गुस्सा थोडा हल्का पड़ गया ,मानों किसी ने गर्म तवे पर पानी के छींटे मार दिए हों। चेहरे पर बनावटी गुस्सा लिये मैंने फिर से उससे जवाब तलब किया,  “अबे गधे, जब तेरे पास किताब ही नहीं है, तो स्कूल में क्या करने आता है?”

 “जी..जी.. स्कूल में भरपेट खाना मिल जाता है।” उसने सुबकते हुए जवाब दिया।

उसका जवाब सुनकर मैं निरुत्तर-सा हाथ में पुस्तक थामे कुर्सी में धँस गया।

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2-दूध का गिलास

 ” मैं खाना लगाती हूँ , आप नहाकर तैयार हो जाओ “।

रमेश नहाकर गुसलखाने से निकला तो वह खाना परोस लाई ।

थाली में से रोटी का कौर तोड़ते हुए रमेश बोला,” गीता , क्या बाबू जी गए थे कल अस्पताल चेक कराने ?”

” जी , डॉक्टर ने ऑपरेशन के कारण हुई कमजोरी बताई है । माँ जी कह रही थी कि अब से अपने बाबू जी को दो वक्त दूध दे दिया करो । अब तुम ही बताओ घर में इतना दूध कहाँ से आए ?”

खाते-खाते रमेश थोड़ा रुक गया ।

” चुन्नू  भी अभी छोटा है तो उसे भी दूध चाहिए । वरना , अभी से उसमें कमजोरी बैठ जाएगी ।”

” हाँ ।”  रमेश का मन किसी उधेड़बुन में लग गया ।

शाम को ऑफिस से आकर अपना बैग पत्नी को थमाते हुए रमेश बोला,” कल से थोड़ी देरी से आया करूँगा , ऑफिस वालों ने टाइम बढ़ा दिया है ।”

” तुम और तुम्हारे ऑफिस वाले भी ना बस …..” पत्नी के चेहरे पर नाराजगी भरे भाव उतर आए ।

” अच्छा मैडम जी , अब खाना तो खिला दो ।” वह उसे रिझाते हुए बोला ।

” अच्छा एक बात और , खाना खाते ही नींद चढ़ जाती है भई , तो इस वक़्त दूध मत दिया करो छाती पर भारीपन- सा हो जाता है ।”

” और कमजोर हो जाओगे , चलो मुझे क्या लेना…।” इस बार उसके चेहरे की नाराजगी शब्दों में उतर आई थी ।

” तुम्हारे होते हुए मुझे कुछ नहीं हो सकता मैडम जी ।” रमेश ने उसे बाँहों में भरते हुए कहा ।

” ऑफिस में ओवरटाइम लगाकर कुछ आमदनी भी बढ़ जाएगी और वैसे भी इस बुढ़ापे में बाबू जी को मुझसे ज्यादा दूध की जरूरत है ।” रात को बिस्तर पर सोचते-सोचते जाने कब उसकी आँख लग गई…..

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3-उसका जिक्र क्यों नहीं करते 

  पार्क में एक बैंच पर चार आदमी बैठे बतिया रहे थे।

पहला : सुना है…करियाने वाले रामकिशोर की लड़की मंगल ठेकेदार के लड़के के साथ भाग गई।

दूसरा : ठीक सुना है, बेशर्म ने सारे मोहल्ले में बाप की थू-थू करा दी।

तीसरा : बस पूछो मत…उसके तो चाल-चलन और पहनावे से ही दिखता था कि एक ना एक दिन जरूर गुल खिलाएगी।

चौथा खामोश रहा।

पहला : लड़कियों के तो पंख लग गए है आजकल।

दूसरा : भई , लड़की जात…फिर भी कोई शर्म-हया नहीं।

तीसरा : खबर तो यह भी है कि शादी भी रचा ली है।

चौथा फिर खामोश रहा।

पहला : शादी भी रचाई तो गैर-बिरादरी लड़के के साथ!

दूसरा : कम से कम जात-बिरादरी का तो ख्याल कर लेती!

तीसरा : भई , मैं तो कहूँ लड़कियों को इतनी आजादी देना भी ठीक नहीं ।

चौथा अभी भी खामोश था।

पहला : अरे भाई , तू क्यों खामोश बैठा है? कुछ तो बोल।

चौथा : अकेली भागी है क्या लड़की?

दूसरा : अरे , कैसी बात करते हो! अकेली क्यों…लड़के के साथ भागी है…

चौथा : तो भाई लड़के के बारे में भी कुछ बोलो, उसका जिक्र क्यों नहीं करते…?

अब शेष तीनों खामोश थे ।

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4-स्वेटर

 ‘टन-टन…।’

 घण्टी की आवाज ने अगला पीरियड शुरू होने का ऐलान कर दिया था । लेकिन इस हाड़ कँपाती सर्दी में स्टाफ-रूम में दहकते हीटर के आगे से उठकर जाना मुश्किल लग रहा था । खैर, जैकेट की चेन को गले तक चढ़ाकर और मुँह को मफलर से ढाँप, मैं क्लास रूम को चल दिया ।

कक्षा में बल्ब की मन्द रोशनी में बच्चे फर्श पर बिछी एकमात्र दरी पर बैठे पढ़ रहे थे । इन दिनों बंद रखे जाने वाले कक्षा के दोनों दरवाजों ने बाहर से आती ठंडी हवा पर रोक लगा रखी थी। लेकिन खिड़की के झरोखों से आती हवा बच्चों के शरीर में सिहरन-सी पैदा कर रही थी । दीवार से सटकर बैठे उस दुबले से लड़के को मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा था। उसने अपने बदन को केवल एक महीन-से कमीज से ढक रखा था । वो बच्चा फैशनपरस्त था या गरीबीग्रस्त, इस बात को लेकर मैंने कोई रुचि नहीं दिखाई । हाँ, मेरे पास बेटे की वर्दी की एक पुरानी स्वेटर थी ,जो मैंने कल आधी छुट्टी में उसे बुलाकर थमा दी थी । पर आज फिर से वह केवल कमीज ही पहने था । सुबह मैंने वही स्वेटर किसी और बच्चे को पहने देखा था । मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने उसे पास बुलाकर जवाब तलब किया, ” क्यों भई , तुमने स्वेटर नहीं पहना ?”

वह गुमसुम सा स्थिर खड़ा रहा ।

 ” तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ !”

 ” नहीं…” उसने हल्के से होंठ हिला दिए ।

 ” पढ़ाई के दिन है, कहीं ठंड-वंड लग गई तो….अभी से इतना फैशन अच्छा नहीं !’

” नहीं सर ।” उसने पुनः इतना ही कहा ।

” मैंने स्वेटर तुम्हें पहनने के लिए दिया था , किसी और बच्चे को देने के लिए नहीं !” मैंने बात पर जोर डालते हुए कहा ।

 ” सर , वो मेरे छोटे भाई ने पहन रखा है ।” वह दबी आवाज में बोला ।

 ” और तुम बिना स्वेटर के रहोगे?”

 ” नहीं सर , छोटे भाई को सर्दी ज्यादा लगती है । गर्म बनियान में भी उसे ठंड लगती है, पर मुझे ज्यादा ठंड नहीं लगती ।” उसने मुँह दूसरी तरफ घुमाते हुए कहा।

पर खिड़की से आती ठंडी हवा से उसके चेहरे पर उभरे रोंगटे साफ नजर आ रहे थे।

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5-संवेदना

 जनवरी का महीना था । कड़ाके की सर्दी से खून नसों में जमा जा रहा था  । न्यू ऑफिसर कॉलोनी के बड़े से गेट के पास बनी पोस्ट में ड्यूटी पर तैनात  कांस्टेबल बीच-बीच में उठकर गश्त लगा आता। रात गहरा रही थी और रजाइयों में दुबके पड़े कॉलोनी वासियों को नींद  अपने आगोश में लिए थी । दूर-पास से आती कुत्तों के भोंकने की आवाज बीच-बीच में सन्नाटे को तोड़ रही थी । इन सब के बीच कांस्टेबल की नजर पार्क में बनी छतरीनुमा छत के नीचे बेंच पर लेटे एक व्यक्ति पर पड़ी । झींगुरों की आवाज के बीच ‘टक-टक’ करते उसके कदम उसके पास जाकर ठहर गए । बेंच पर, खुद को फ़टे से कम्बल में लपेटे बड़ी- बड़ी उलझी दाढ़ी, चीकट बाल और मैले-कुचैले कपड़ों वाला एक भिखारीनुमा व्यक्ति अधलेटा सा पड़ा था । वह बेंच पर डंडा बजाते हुए गरजा :

” चलो उठो यहाँ से । इधर सोना मना है ।”

वह हड़बड़ा कर उठा । हाथ में डंडा थामे खाकी वर्दीधारी को देख वह बिना कुछ कहे वहाँ से खिसक गया ।

दूसरी रात भी  वह व्यक्ति उसी बेंच पर लेटा था । उसके पास जाकर कांस्टेबल कड़क अंदाज में बोला :

“चलो उठो यहाँ से । कल बात समझ नहीं आई थी ? कोई पियक्कड़ मालूम पड़ते हो ?”

“साहब , पियक्कड़ नहीं, बेघर हूं । ठण्डी ज्यादा थी तो ….।”

वह इससे ज्यादा नहीं कह पाया और शरीर को कम्बल से ढाँप पाँव घसीटता हुआ वहाँ से चला गया ।

अगली रात दाँत किटकिटाने वाली ठण्ड थी।  बर्फीली हवा शरीर में सिरहन पैदा कर रही थी । गश्त लगाते कांस्टेबल की नजर फिर से उस भिखारीनुमा व्यक्ति पर पड़ी जो बेंच पर गठरी बना लेटा था । वह एक क्षण के लिए उस ओर मुड़ा;  पर कुछ सोचकर उसके पाँव वहीँ ठिठक गए । वह उस तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और कुछ देर पहले  सड़क किनारे सुलगाये अलाव पर हाथ सेंकने लगा ।

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6-सलीब पर पिता

 आज मदनलाल जी को मालिक के बेटे ने ऐसी झाड़ पिलाई, उनकी आँखें छलछला आईं। किसी पार्टी का ऑर्डर डिलीवर नहीं हो पाया था,  नतीजन वो उन पर राशन-पानी लेकर चढ़ गया। न कहने वाली भी कितनी-ही खरी-खोटी सुनाकर वह अपने केबिन में चला गया।

 ‘‘बुढ़ापे में दिमाग सठिया गया है। मैं कितना कहता हूँ कि एक्स्टेंशन किसी को मत दो।’’ अन्दर वह अपने बाप पर बरस रहा था, ‘‘हम व्यापार करने को बैठे हैं या धर्मादा चलाने को… अभी इसका हिसाब साफ करो और दफा करो।”

  केबिन से निकलकर ये तीर उनके कलेजे में आ गुभे। उनका मन हुआ कि जिल्लतभरी इस नौकरी को तुरन्त लात मार दें। रिटायरमेंट के पहले भी वे इस तरह बेइज्जत होते आए थे, लेकिन अब तो दोनों बेटे अच्छी कंपनी में सेट हो गए हैं और बढ़िया कमा रहे हैं। अगर उन्हें इस अपमान के बारे में पता चल गया तो कल से कतई यहाँ नहीं आने देंगे। रिटायरमेंट के बाद वे एक्सटेंसन पर हैं; शायद तभी नजरों में खटकते हैं। उन्होंने मन बना लिया कि आज शाम घर जाकर सब-कुछ साफ-साफ बयान कर देंगे; और वही उन्होंने किया भी। सारा दुखड़ा बेटों के आगे रो दिया।

 ‘‘पिताजी, प्राइवेट नौकरी में तो यह सब चलता रहता है ।’’ बड़े बेटे ने हँसते-हँसते ज्ञान दिया, ‘‘अगर मालिक कुछ नहीं कहेगा ,तो उसे मालिक कौन कहेगा…..! जैसे अब तक करते आए थे, वैसे ही—बस, एक कान से सुनते और दूसरे से निकालते रहिए।”

 “वैसे भी, आपको कुछ दे ही रहे हैं न ! वरना रिटायरमेंट के बाद कौन किसी को नौकरी पर रोकता है।” उसके बाद छोटे बेटे के शब्द उनके माथे से टकराए।

  वे उन दोनों को देखते रह गए—एकदम मूक।

  अगली सुबह, भरे मन से फैक्टरी की ओर चल दिए। लेकिन, आज से उन्हें बेटों के भविष्य के लिए नहीं, खुद अपने लिए तिरस्कृत होना था।

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