नवम्बर -2018

मेरी पसन्दविधा की अद्भुत अभिव्यक्ति     Posted: November 1, 2018

आज के बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में एक जेन्यून रचनाकार की सबसे बड़ी जिम्मेवारी है मानवीय संवेदना को क्षरित होने स ेबचाए रखना। आधुनिक हिंदी साहित्य की विकास यात्रा में विगत पच्चीस-तीस वर्षों से अन्य विधाओं के साथ-साथ लघुकथा ने भी शिल्प,शैली, विषय-वस्तु, भाषा एवं संवेदना आदि के स्तर पर अपने स्वरूप को सुनिश्चित करते हुए अपनी सामाजिक उपादेयता को सिद्ध किया है। लघुआकारीय संरचना और विषयगत विविधता ने इस विधा की अद्भुत अभिव्यक्ति क्षमता के प्रति एक प्रकार की आश्वस्ति का भाव जगाया है।

इस समय पठनीयता का संकट तो है लेकिन यह स्थाई नहीं तात्कालिक है। मोबाइल और इंटरनेट ने पाठकों को श्रोता और दर्शक बनाने का उपक्रम इधर तेजी से किया है। खासकर लघुकथा तो तमाम तकनीकी संचार साधनों के जरिए जनमानस को साहित्य से जोड़ने का महत्ती उपक्रम कर रही है। समर्पित और रचनात्मक दृष्टि से सामर्थ्यवान लेखकों की एक लम्बी श्रंखला इस समय लघुकथा के सृजन और समीक्षा में सक्रिय है जिसके कारण अनेकानेक ऐसी मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक लघुकथाएँ सामने आ रही है जो देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर की उक्ति को चरितार्थ करती हैं। यही नहीं बल्कि साहित्य सामाजिक जीवन में निरंतर परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार करती है कि अवधारणा को भी पुष्ट करने में लघुकथा सक्षम साबित हुई है।

उदाहरण के तौर पर अपने समय के अनेक समर्थ-सशक्त रचनाकारों की लघुकथाआंेे को सामने रख सकते हैं, जिनकी रचनाएँ पाठकों की स्मृति में स्थायी तौर पर अपनी जगह बनाती रही हैं। मैनें अपनी पसंद की परिधि में जिन लघुकथाकारों की लघुकथाओं को सहेज रखा है, उनमें कमल चोपड़ा की ‘इतनी दूर’ डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘घर लौट चलें’ प्रतासिंह सोढ़ी की ‘इस्तीफा’, सुकेश साहनी की ‘डरे हुए लोग’, संतोष सुपेकर की ‘शहादत की रोशनी’, डॉ. शिवनारायण की ‘जहर के खिलाफ’, माधव नागदा की ‘डेड’, सतीशराज पुष्करणा की ‘मन के साँप’, सिद्धेश्वर की ‘अंतिम प्रश्न’, आदित्य प्रचण्डिया की ‘मद में मस्त’, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘ऊँचाई’, युगल की ‘पेट का कछुआ’, जगदीश राय कुलरियाँ की ‘कीमत’, विनायक की ‘नाव’, उपेन्द प्रसाद राय की ‘पेट के लिए’, बलराम अग्रवाल की ‘गोभोजन कथा’, डॉ. अखिलेश पालरिया की ‘पीर पराई’, श्यामसुंदर अग्रवाल की ‘लड़की की तलाश’ आदि प्रमुख हैैं।
इनके अलावा भगीरथ, रूपदेवगुण, राज कुमार निजात, राजेन्द ्रसाहिल, मधुकांत, मदन अरोड़ा, कुँवर प्रेमिल, कान्ता राय, लता अग्रवाल, प्रबोध कुमार गोविल तो ऐसे रचनाकारों में हैं कि जिनकी लघुकथाएँ मैं निरंतर पसंद करता रहा हूँ।

अब विपुल संख्या में जब मेरे समक्ष इतनी सारी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं ,तो उनके बीच से अपनी पसंद के सिर्फ दो रचनाओं का चयन काफी मुश्किल भरा काम है। खैर यही मुश्किल तो लघुकथा के सृजनात्मक विस्तार का परिचायक है।

फिलहाल अपनी पसंद की दो लघुकथाओं का जिक्र करना चाहूँ तो धनश्याम अग्रवाल की ‘औरत का गहना’ तथा अशोक भाटिया की ‘कुण्डली’ ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। संभव है कि इससे भी बेहतरीन और मार्मिक क्षणों को इन रचनाकारों ने अपनी अन्य लघुकथाओं में सहेजा हो, किंतु ये दोनों रचनाएँ एक बारगी ही अन्तर्मन को छू जाती हैं। संघन संवेदना संपोषित इन दोनों ही लघुकथाओं में जीवन की विवशता का कटु एहसास मौजूद है। आर्थिक विषमता आदमी को कैसी-कैसी विवशता से गुजरने हेतु मजबूर करती है। पारिवारिक जीवन का एक कटु सत्य ‘औरत का गहना’ शीर्षक लघुकथा के जरिए स्वाभाविक सहजता और संवेदना के उच्चतम स्तर को छूती हुई अर्थाभाव में जी रहे एक गरीब परिवार की स्थिति का यथार्थ कुछ इस तरह उजागर किया है कि मन कहीं गहरे तक सिहर उठता है। विश्वसनीयता सृजन की श्रेष्ठता की पहली शर्त होती है। घनश्याम अग्रवाल ने जिस विषय को अपनी रचना में उठाया है उसे एक सिद्धहस्त रचनाशिल्पी ही अपनी घनीभूत अनुभूति की प्रभावोत्पादकता और विशिष्ट रचनाशैली से विश्वसनीय बना सकता है। घनश्याम अग्रवाल ने अपनी इस लघुकथा में एक-एक शब्द का इस्तेमाल सीढ़ी की तरह से किया है जिसपर चढ़ते हुए उसके चरमोत्कर्ष को संस्पर्श करना होता है। यह लघुकथा अपने उत्कर्ष पर एक ह्नदय स्पर्शी विस्फोट के साथ खत्म होती है किंतु उसकी अनुगूँज देर तक और दूर तक बनी रहती है। व्यवस्थाजनित आर्थिक विषमता हमें सोचने को विवश करती है। लघुकथा में प्रयुक्त संवादों से स्वतः ही वैसा परिवेश निर्मित हो जाता है जो विषय वस्तु की संवेदन से पाठकों को गहरे तक जोड़ती है। जीवंत परिवेश में ज्वलंत मुद्दा इस लघुकथा के प्राण है। इस रचना की कतिपय पंक्तियाँ देखें-

जमीला ने डॉक्टर को फीस दी। हारून के लिए फल भी लाई। डॉक्टर के जाते ही नूरा ने पूछा-‘‘अरी जमीला, मैं पूछती हूँ,ये फीस, ये दवा, ये फल, तू पैसे कहा से लाई?’’
‘‘अम्मा, मुझे कुछ काम मिल गया था।’’ यह कह जमीला औंधी पड़ सुबकने लगी। उसे नूरा के शब्द याद आए-‘हया औरत का सबसे बड़ा गहना होता है, और फिर गहने मुसीबत के वक्त ही बेचे जाते हैं।’
इस लघुकथा की अनुभूति विरल से सघन होती हुई अपने उद्देश्य तक पहुँचती है। सतह पर यह लघुकथा सिर्फ एक परिवार की गरीबी का चित्रण भर लगती है किन्तु अन्तर्धारा में यह सामाजिक जीवन में व्याप्त अर्थिक विषमता के प्रति प्रतिरोध का प्रबल भाव जगाती है। यह यथास्थिति के विरुद्ध हमारी चेतना को संघर्षोन्मुखी बनाती है।

अशाक भाटिया ‘कुण्डली’ के धार्मिक अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों से ग्रस्त समाज की मुक्ति का आह्वान किया है। हमारे देश की संस्कृति और परंपरा की नकारात्मक स्थिति को जीने वाले बुद्धिजीवी वर्ग की निष्क्रिय सोच की अभिव्यक्ति इस रचना के केन्द्र में मौजूद है। वर्षों से हम हम जिस अंधविश्वास और झूठ को सत्य मानकर उसके साथ जुड़े रहे हैं, उसी आस्था के विरुद्ध अशोक भाटिया ने ‘कुण्डली’ के जरिए एक वातावरण निर्मित किया है।

वर पक्ष द्वारा लड़की-लड़के की कुण्डली का मिलान हो जाने के बावजूद लड़की की माँ अलग से लड़की और उसके होने वाले पति की कुण्डली का मिलान करके संतुष्ट होना चाहती है। इसी प्रयोजन से लड़की का पिता जो कि इस परंपरा का पक्षधर नहीं है ,फिर भी पत्नी के कहने पर कुण्डली मिलान हेतु पड़ोसी मुहल्ले में रह रहे पंडित के घर पहुँचता है। वहाँ वह पाता है कि पिछले वर्ष ही पण्डित की जिस लड़की का विवाह हुआ था। ‘कुण्डली’ मिलान की सही स्वीकृति मिल चुकने के बाद भी वह विधवा हो चुकी थी। इस स्थिति को देखकर उसके भीतर कुछ सवाल उठते हैं और कुण्डली मिलान के प्रति उसका मोह पूरी तरह से भंग हो जाता है। यह लघुकथा कुण्डली मिलान की एक अनावश्यक परम्परा के विरूद्ध वैचारिक परिवर्तन की दिशा में रचनात्मक पहल है। एक जेन्यून रचनाकार अपनी रचना के जरिए कतिपय ऐसे सच को उजागर करता है जो ढका हुआ होता है और वर्षों-बरस जन-जीवन को प्रभावित करता रहता है। अशोक भाटिया ने एक तथ्यहीन, अप्रामाणिक परंपरा से मुक्ति हेतु हमारी चेतना को जागृत करना चाहा है।

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1-औरत का गहना- घनश्याम अग्रवाल

इदरिस बहुत बीमार था। सात बच्चों का बोझ ढोते-ढोते उसे पता ही नहीं चला, कब मामूली खाँसी धीरे-धीरे उसकी साँसों में समा गई!
अबकी बार खाँसी का दौरा उठा तो नूरा काँप गई। उसे प्राइवेट डॉक्टर को बुलाना ही होगा, मगर उसकी फीस? अचानक उसकी निगाह उँगली में पड़े पुराने चाँदी के छल्ले पर गई। ये छल्ले इदरिस ने उसे सुहागरात को दिए थे। कहा था-‘‘नूरा, ये मेरे प्यार की निशानी है, इन्हें कभी जुदा मत करना।’’ जब देनेवाला ही जुदा हो जाए तो ये किस काम के।
थोड़ी देर बाद नूरा की उँगली में छल्लों की जगह दस-दस के दो नोट थे। एक घण्टे बाद डॉक्टर ने ये नोट लेते हुए कहा-‘‘तुमने बहुत देर कर दी, खुदा पर भरोसा रखो।’’
डॉक्टर के जाते ही नूरा इदरिस के पास आकर उसकी छाती सहलाने लगी। इदरिस का ध्यान उसकी उँगली पर गया। वह बोला-‘‘अरे, तुम्हारे छल्लों का क्या हुआ? लगता है, तुमने बेच दिए। ले-दे के यही तो एक गहना था तुम्हारे पास।’’
‘‘ये क्या कहते हैं आप? हया औरत का सबसे बड़ा गहना होता है, और फिर गहने मुसीबत के वक्त ही तो बेचे जाते हैं, अच्छे हो जाना, फिर आ जाएँगे।’’
इदरिस न अच्छा हो सकता था और न हुआ।
इदरिस के चले जाने के बाद नूरा टूट गई। जब घर के डिब्बे खाली हों तो पेट कैसे भर सकता है। नूरा सोचती ही रही, न जाने कब हारून बड़ा होगा, अभी तो बारह बरस का ही है। जमीला भी तो सयानी हो गई। जवानी गरीबी-अमीरी कुछ नहीं देखती, बस चढ़ी ही चली जाती है। इदरिस था तो आधा पेट तो भर जाता था, अब उसके भी लाले पड़ गए। इदरिस का खयाल आते ही उसे हारून याद आया।
एक दिन हारून को हल्का-सा बुखार हो आया, साथ ही कुछ खाँसी भी। नूरा ने गौर से देखा, न केवल हारून का चेहरा, बल्कि उसकी खाँसी भी इदरिस से मिलती-जुलती है। उसके कानों में प्राइवेट डॉक्टर के शब्द गूँज उठे-‘तुमने बहुत देर कर दी।’
‘‘या अल्लाह, रहम कर मेरे हारून पर।’’ नूरा बुदबुदा उठी। अपनी उँगलियों को देखकर बोली-‘‘अब तो छल्ले भी नहीं हैं, समझ में नहीं आता, क्या करूँ?’’
‘‘तू फिक्र मत कर अम्मा, अब देर नहीं होगी। प्राइवेट डॉक्टर जरूर आएगा।’’ जमीला ने अम्मा को हिम्मत दी।
शाम को डॉक्टर आया। सुई लगाते हुए बोला-‘‘घबराने की कोई बात नहीं। मैं ठीक वक्त पर आ गया। ये जल्दी ही ठीक हो जाएगा।’ जमीला ने डॉक्टर को फीस दी। हारून के लिए फल भी लाई। डॉक्टर के जाते ही नूरा ने पूछा। ‘‘अरी जमीला, मैं पूछती हूँ, ये फीस, ये दवा, ये फल, तू पैसे कहाँ से लाई?’’
‘‘अम्मा, मुझे कुछ काम मिल गया था।’’ यह कह जमीला औंधी पड़ सुबकने लगी। उसे नूरा के शब्द याद आए- ‘हया औरत का सबसे बड़ा गहना होता है, और फिर गहने मुसीबत के वक्त ही तो बेचे जाते हैं।’

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2-कुण्डली -अशोक भाटिया

‘आज फैसले का दिन है। लेकिन समझ नहीं आता, कैसे क्या किया जाए !’ करमचंद सोचता जा रहा है।
दरअसल उसकी बेटी के लिए एक रिश्ता आया है। सब चीज़ें ठीक लग रही हैं। उम्र, कद-काठी, देखने में भी अच्छा है। पढ़ाई और सैलरी के बारे उनके पड़ोसी चावला जी से भी सारी रिपोर्ट ठीक-ठाक मिली है।
चाय पीते हुए दोनों सोच रहे हैं – कैसे क्या करें? पहला रिश्ता है, वो भी बेटी का।
रीना ने कहा – शुकर हाउ, सब कुछ ओ.के.हो गया है। मेरा विचार है कि अब देर न करें। बस एक बार आप पं. रामप्रसाद से मिल आओ। गुण तो मिला लिए थे, अब बारीकी से जांच लें। तभी अगला कदम उठायें।’
करमचंद ने कहा – लडके वालों ने कुंडली मिलाकर ओ.के.कर दिया –बहुत है। तुम जानती हो, अपना इन चीज़ों में विश्वास नहीं है।’
-देखो, पहला रिश्ता है। उम्र-भर का साथ होता है। मन में कोई वहम नहीं रहना चाहिए।’ रीना ने बिस्कुट की प्लेट आगे बढाते हुए कहा था। यही बात बेटी भी दोनों से कह चुकी थी।
करमचंद सोच में पड़ गया था। सरदार कौन-सी कुंडली मिलते हैं? वो क्या तरक्की नहीं कर रहे? सब गुण और कुंडलियाँ धरी रह जाती हैं। वह रीना से बोला – तुम्हें मालूम है न! हमारे पिचाली वाले सब गुण वगैरा मिलाकर ही बहू लाये थे। फिर भी तलाक हो गया। बताओ, क्या मतलब है कुंडली मिलाने का?’
रीना ने भी फौरन कहा था –‘उन्होंने ऐरे-गैरे को कुंडली दिखाई होगी। रामप्रसाद तो जाना-माना ज्योत्षी है। ’वह चाय का आखरी घूँट पीकर बोली थी –‘बस आप अभी चले जाओ। आधे घंटे का ही रस्ता है …
आज फैसले का दिन है। करमचंद सोचता जा रहा है….उसके लिए यह सबसे मुश्किल काम है। आज तक वह समाज में इसे पाखंड कहकर इसकी खिलाफत करता रहा है…..कोई जान-पहचान का मिल गया तो क्या कहेगा?….क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हें!…रिश्ता तो अच्छा है, लेकिन वह कुंडली…
वह ज्योतिषी के यहाँ पहुंचा तो भीड़ न पाकर हैरान भी हुआ और खुश भी। नमस्ते करके उसने अनमने भाव से दोनों बच्चों की कुंडली के कागज़ उनके सामने रख दिए और हाथ बांधकर बैठ गया।
पं. रामप्रसाद ने कागज़ उलटे-पलते, फिर उँगलियों पर गिनती करने लगे। तभी भीतर से उनकी बेटी पानी लेकर आई। उसे सफेद कपड़ों में देख करमचंद को ताज्जुब हुआ।
-पंडत जी यह क्या? बिटिया की तो पिछले साल ही शादी हुई थी!’
रामप्रसाद पीड़ा से दहल गए-आप देख ही रहे हैं। विधि का विधान कौन टाल सकता है?’
करमचंद सोच में पड़ गया। क्या कहे, क्या करे? वह सिर खुजलाने लगा। फिर उठकर बोला- पंडितजी, बच्चों की कुंडली लौटा दीजिए।’
कागज़ लेकर वह तीर की तरह उनके घर से बाहर निकल आया।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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