नवम्बर-2017

देशशरीफों का मुहल्ला     Posted: January 2, 2015

जाड़े की धूप में बैठकर गप्पें हाँकी जा रही थीं। चाय व समोसे के सहारे वे बातें कर रहे थे। ‘‘भई श्रीवास्तव इधर आना जरा।’’ एक आवाज गूँजी। ‘‘नहीं यार हम यहीं ठीक हैं,’’ श्रीवास्तव चाय के आखिरी  घूँट को गले तले उतारते  हुए बोला, ‘‘फार फ्रॉम दी मैडिंग क्राउड।’’ लोगों को याद आया कि वह अंग्रेजी में एम ए भी है। पर फिलहाल क्लर्की कर रहा था। बात यह थी कि श्रीवास्तव गुप्ता के साथ झुण्ड से कुछ फासले पर बैठा था। यह फासला उसने जानबूझ कर चुना था। वह गुप्ता को कुछ ऐसी बातें सुनाना चाहता था,जिसके योग्य वह झुण्ड को नहीं समझता था।

‘‘तो तुम बिल्कुल श्योर हो?’’ गुप्ता ने पूछा ‘‘हाँ यार हन्ड्रेड परसेन्ट श्योर। अब क्या कागज पर लिखकर दूँ। कमबख्त एलोग जबसे मुहल्ले में आए हैं यहाँ की हवा ही खराब हो गई है।’’ ‘पर कुछ भी कहो लड़की है मजेदार।’’’ गुप्ता ने चुटकी ली। इस पर श्रीवास्ताव गला फाड़कर हँसा। गुप्ता का घर उस लड़की के बिल्कुल बगल में था परन्तु वह इस बात पर पछता रहा था कि श्रीवास्तव का ज्ञान उससे ज्याादा है। वह भी क्यों करे। घर-गृहस्थी से फुरसत मिले तब तो इधर-उधर ताक-झाँक करे।वैसे भी उस घर के लोगों से मुहल्ले की महिलाएँ भी अप्रसन्न रहती थीं। मुहल्ले की पंचायत एवं परनिन्दा में कभी भी माँ-बेटी ने रुचि नहीं ली थी। अचार बनाने की विधि या स्वेटर के नमूने पर चर्चा तो दूर की बात थी। और तो और एक बार श्रीवास्तव की स्त्री को साफ कह दिया कि वह दूसरों की निन्दा उससे न करे। इस अशिष्टिता पर कौन अप्रसन्न न होगा। तार पर गीले कपड़े फैलाने के लिए लड़की बाहर निकली। दो-चार जोड़ी उत्सुक निगाहों की उपेक्षा करके वह वापस अन्दर चली गई। ‘‘देखा न उसे।’’ निगाहों ने आपस में बातें कीं। हाँ यार। ‘‘सच कहते थेण्ण्ण्ण्क्या खूब है।’’ श्रीवास्तव को कुछ काम था। वह मण्डली से उठकर सीधे घर चला गया। पत्नी के बाजार जाने के निर्देशों की उपेक्षा करते हुए वह आँफिस की फाइलों में डूब गया। दफ्तर से वह फाइलें यहाँ भी ले आया था। यह प्रमोशन जो भी कराए वह कम है। तभी आहट से उसकी तन्द्रा भंग हुई। पड़ोसी का लड़का था। बिन माँ का बेटा। बाप के भरोसे था।

‘‘अंकल सातवीं क्लास की किताबें आपके पास हैं?’’ बारह-तेरह साल का बालक पूछ रहा था।
‘‘नहीं यार’’, श्रीवास्तव झुँझला उठा, ‘‘तुम भी क्या…।’ वह गुस्से में कुछ और भी कहने जा रहा था लेकिन फिर रुक गया। काम के वक्त कोई डिस्टर्ब करे तो किसे अच्छा लगेगा।

पड़ोसी अग्रवाल की स्त्री दो साल पहले मर चुकी थी। वह उसे बेहद चाहता था। तब से अपने बेटे की जिम्मेवारी वह अकेले उठा रहा था। वैसे उसने एक आया रखी थी,जिस पर मुहल्ले में तरह-तरह की चर्चा व्याप्त थी। भला इतने बड़े बच्चांे को सँभालने के लिए आया का क्या काम? यह तो उसकी अपनी आवश्यकताएँ होगीं। वह लोगों से बहुत कम मिलता-जुलता था पर सामने पड़ने पर नमस्कार जरूर करता था। उसका लड़का सारे मुहल्ले का चक्कर काटता रहता था। बेचारा बिन माँ का बच्चा। सब उसे तरस भरी दृष्टि से देखते। पर मौका पाकर उसके घर के अन्दर क्या हो रहा है इसकी जानकारी जरूर लेना चाहते।
पता चला कि वह लड़का दो-तीन और घरों में किताबों की खातिर घूमा। पर विफलता मिली। क्या उसका बाप उसके लिए किताबें नहीं खरीद सकता? क्या पता वह आर्थिक कठिनाइयों में हो। खैर वह जाने। इन सब परायी बातों में कौन सर खपाता है। वह भी तब जबकि एक मसालेदार विषय सामने हो।
मालूम हुआ कि लड़की कॉलेज में पढ़ाती भी है। क्‍या पढ़ाती होगी भला। युवकों ने एक स्‍वर से वोट दिया। वह पढ़ाने के लिए थोड़े न है। वह तो देखने के लिए है।
’’सुना तुम लोगों ने! एक महत्‍वपूर्ण सूचना आयी।’’ क्‍या! उत्‍सुक निगाहों ने पूछा। ’’वह लड़की खुद गई थी अग्रवाल के घर किताब पहॅुचाने।’’ ऐसी बेहयाई! शरीफों का मुहल्‍ला ही नहीं रहा। कह रही थी कि किसी बच्‍चे को किताबों की जरुरत है तो पड़ोस में बेकार पड़े रहने से क्‍या फायदा। सातवीं क्‍लास की किताबें।
’’तो इस बच्‍चे के बहाने अब सब कुछ होगा।’’ एक वृद्ध ने आसमान की ओर हाथ उठाकर कहा। बाकी लोग शर्म और लज्‍जा से अपना सर झुका लेते हैं।

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine