मार्च-2017

पटना में 27 वाँ अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन सम्पन्न     Posted: December 30, 2014

पटना में 27 वाँ अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन सम्पन्न
कभी भले ही इसे फ़िलर के रूप में प्रयोग किया जाता रहा हो; किन्तु आठवें दशक के बाद से क्रमश: इसके विकास ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब यह विधा साहित्य की किसी भी विधा के समक्ष ससम्मान खड़ी हो सकती है। ये शब्द थे पटना विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी–विभागायक्ष एवं वर्त्तमान में विधान पार्षद् डॉ रामवचन राय के ,जिन्हें वे पटना के यूथ क्लव में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मच के तत्वावधन में आयोजित 27वें अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन का दिनांक 09 नवम्बर 2014 को उद्घाटन करते हुए बोल रहे थे।
समारोह की अध्यक्षता मंच के अध्यक्ष एवं चर्चित कथाकार एवं आलोचक डॉ सतीशराज पुष्करणा ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि आज के लेखक एक जगह बैठकर साहित्य या इसकी विधाओं पर चर्चा नहीं करते। पत्र–पत्रिकाओं के अंक एवं विशेषांकों पर भी खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ नहीं रखते। यही स्थिति लघुकथा की भी है।
1.1-CHARCHA MENलघुकथा यदि आज विकास करते हुए यहाँ पहुँची है ,तो उसके विकास में लघुकथाओं का आपस में विचार–विमर्श की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए मंच के महासचिव डॉ ध्रुव कुमार ने कहा कि हम इस मंच एवं लघुकथा को और अधिक विकास देते हुए और आगे ले जाना चाहते है, आवश्यकता है आपके सहयोग की। समय–समय पर हम मंच के तत्वाधन में गोष्ठियों करते हैं और लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर खुलकर चर्चा करते है। इस चर्चा में हम चाहते हैं लोग खुलकर भाग लें।
मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली से पधारे चर्चित लघुकथाकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने कहा कि निराशा की कोई बात नहीं है। लघुकथा पर प्रत्येक स्तर पर कार्य हो रहा है और बिहार की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित चर्चित कथाकार डॉ उषा किरण खान ने कहा कि लघुकथा आकार में छोटी भले ही है किन्तु यह विधा इतनी आसान नहीं है; क्योंकि इसमें एक–एक शब्द बहुत सावधानी से खर्च करना पड़ता है। डॉ जिया लाल आर्य ने कहा कि बिहार के लिए गर्व की बात है कि यह 27 लघुकथा सम्मेलन हुए। देशभर के लघुकथाकारों का सम्मान करने का हमें सुअवसर मिला। आठवें दशक से पूर्व भी यहाँ भवभूति मिश्र, रामेश्वर नाथ तिवारी, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, शिव पूजन मिश्र, शिव पूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, कामता प्रसाद सिंह राम, डॉ मधुकर गंगाधर, राधाकृष्ण जैसे मनीषी कथाकारों ने वर्तमान लघुकथा को नींव रूप में लघुकथाएँ दीं। मुंबई से पधारी कथाकार डॉ संतोष श्रीवास्तव ने कहा यह निर्विवाद है कि लघुकथा की विकास–यात्रा में बिहार को उल्लेखनीय भूमिका रही है।
इस अवसर पर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच की पत्रिका ‘सर्जना’ के दूसरे अंक का लोकार्पण मंच द्वारा किया गया। इसके अतिरिक्त सर्वनारायण दास के मैथिली लघुकथा संग्रह, डॉ सुधा गुप्ता के हाइबन–हाइकु–संग्रह]सफ़र के छाले हैं, कृष्णा वर्मा के हाइकु संग्रह ‘अम्बर बाँचे पाती’ आलोक भारती के लघुकथा–संग्रह ‘सच की खोज’ इत्यादि अन्य अनेक पुस्तकों का लोकापूर्ण उपस्थित मनीषियों के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु, डॉ संतोष श्रीवास्तव, रेखा रोहतगी, डॉ शंकर प्रसाद, डॉ सिद्धेश्वर काश्यप, रत्न सम्मान एवं अनिल रश्मि को ‘संभावना सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इस प्रथम सत्र का संचालन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की पूर्ण निदेशक डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र ने किया।
दूसरे एवं तीसरे सत्र में डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र, डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉ पुष्पा जमुआर, डॉ मिथिलेश अवस्थी, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डॉ अनीता राकेश और डॉ सिद्धेश्वर कायश्प ने अपने आलेखों के सारांश पढ़े जिस पर रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, डॉ संतोष श्रीवास्तव, रेखा रोहतगी और आभारानी ने इन पठित आलेख–सारांशों पर विद्वतापूर्ण गंभीर चर्चा की। दूसरे सत्र का संचालन किया डॉ सतीशराज पुष्करणा और तीसरे सत्र का संचालन डॉ अनीता राकेश ने किया। चौथे और अन्तिम सत्र डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉ अनिता राकेश की उपस्थिति में आरंभ हुआ जिसमें डॉ ध्रुवकुमार, डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र, डॉ अनिता राकेश, अनिल रश्मि, वीरेन्द्रकुमार भारद्वाज, प्रभात कुमार धवन, श्रीकांत व्यास, डॉ नरेश पाण्डेय चकोर, योगेन्द्र प्रसाद मिश्र, सिद्धेश्वर, बिन्देश्वर प्रसाद गुप्त, हरिनारायण सिंह ‘हरि’, लता पाराशर, राजकुमार प्रेमी, डॉ संतोष श्रीवास्तव, रेखा रोहतगी, डॉ मधुवर्मा, डॉ मिथिलेशकुमार अवस्थी, अश्विनी आलोक, इत्यादि लगभग चालीस लघुकथाकारों ने अपनी एक–एक लघुकथा का पाठ किया तथा उन पठित आलेखों पर विद्वतापूर्ण टिप्पणी की रामेश्वर काम्बोज ””हिमांशु””, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, और डॉ सिद्धेश्वर काश्यप ने। टिप्पणी कर्त्ताओं ने पठित लघुकथाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि यह सुखद है लघुकथा में अब जहाँ नये–नये विषय प्रस्तुत हो रहे हैं, वहीं नये और सटीक शिल्प भी उपस्थित हो रहे हैं। नये लोग भी इसके सृजन के प्रति गंभीर हैं यदि श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिख रहे हैं। इन नये लेखकों से ये संभावनाएँ स्वत: बन जाती है कि आने वाले समय में ये लोग लघुकथा को और आगे ले जाने में सक्षम हो सकेंगे।
डॉ ध्रुव कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि हमें प्रसन्नता है कि इस 27वें सम्मेलन में पूरे उत्साह से भाग लेकर इसे सफल बनाया। हमें आशा है भविष्य में भी आपका स्नेह एवं सहयोग इसी प्रकार बना रहेगा और हमलोग आपके सुझावों का लाभ उठाते हुए मंच की भावी गतिविधियों द्वारा लघुकथा को और अधिक समृद्ध बना पाने की दिशा में क्रमश: अग्रसर होते रहेंगे।
1.2-CHARCHA MEN10 दिसम्बर को राष्ट्रीय पुस्तक मेला में भी लघुकथा –पाठ तथा पठित रचनाओं पर विचार –विमर्श हुआ।
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प्रस्तुति- डॉ सतीशराज पुष्करणा

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    पटना में 27 वाँ अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन सम्पन्न
    गिद्दड़बाहा में 23वाँ अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन, सम्पन्न

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj49@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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