“दीदी, मैं परसों गाँव जा रही हूँ ।’’
“क्यों? फूला कितने दिनों के लिए जा रही हो।”
“दीदी, बस दुआ करो, अब की बार हमारे ये सरपंच का इलेक्शन जीत जाएँ ।फिर तो बस आप लोगन को मिठाई खिलाने ही आऊँगी”
“हाँ! हाँ क्यों नहीं, जरूर दुआ करूँगी। अच्छा, फूला झाडू बर्तन के लिए झुग्गियों से अपनी कोई जानकार लड़की तो रखवा जा।”
“हाँ! हाँ दीदी शाम को लाती हूँ।“
फूला गाँव चली गई। फिर कोई छ: सात महीने बात पता चला कि फूला का पति इलेक्शन जीत गया। करीब एक साल के बाद अचानक फूला मिठाई का डिब्बा लेकर आई।
“आओ, सरपंचनी जी ”
“अरे, दीदी आप भी बस ये सरपंच हो गए। टाइम ही ना मिला आने का।आप लोगन से मिलने का बहुत मन था। सोचा आज मिल आऊँ।”
“बैठ चाय बनाती हूँ”
“अरे नहीं, दीदी सभी के घर थोड़ी –थोड़ी कर बहुत चाय हो गई।”
“दीदी एकउ बात पूछनी थी क्या आपकी सोसाइटी में रात को हमारी स्कार्पियो रखने की परमिशन मिल जाएगी।अब झुग्नि में कहाँ रखेगे । गाँव से उसी में आये। जरा अपने गार्ड को बोल दो ना।”
“अरे वाह! वाह! फूला, स्कार्पियो………………..!!”
“हाँ दीदी अपनी है। आप जानो गाँव में सरपंच के कितने काम होवे हैं।”
फिर फूला काफी देर तक अपने गाँव के किस्से सुनाती रही । मेरा दिमाग तो जैसे एक ही सुई पर अटक गया था। हम दोनों पति पत्नी सरकारी नौकरी में हैं और अभी हाल ही में हमनें दस साल की नौकरी के बाद,बैंक से लोन लेकर आल्टो कार ली है।
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