आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना!
अपने देश में हर दूसरा आदमी ज्ञानी, मानवतावादी, सभी इंसान बराबर हैं, सबका ईश्वर एक है, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए, जनहित सर्वोपरि आदि-आदि का उपदेश देने के लिए पाण्डित्यपूर्ण मुद्रा में दिखाई देगा। जब यह काम व्यक्ति को स्वयं करना पड़े, तब वह सब कुछ भूलने के लिए बाध्य है। न्याय का जाप करने वाले अन्याय का साथ देने के लिए सदैव कमर कसकर तैयार रहेंगे। सारा काम सुविधा और लाभ- हानि के गणित पर टिका है।
जिसके पास बड़ा पद है, उसके सगे- सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सब अपना कार्य सिद्ध करने की होड़ में लग जाएँगे। पद की शक्ति उस व्यक्ति से होते हुए, उसके आभामण्डल से घिरे सब लोगों की शक्ति बन जाएगी। सामाजिक पद पर आरूढ़ नेता, अभिनेता, अफ़सर, सबकी मनोवृत्ति पद के अनुसार बदल जाएगी।
जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्विज उच्यते।
वेदपाठात् भवेत् विप्रः, ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।। स्कन्दपुराण
ब्रह्मा द्वारा नारद को बताया गया है कि जन्म से प्रत्येक मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज (दूसरा जन्म) होता है, यानी यज्ञोपवीत संस्कार के समय व्यक्ति की तब तक की गतिविधियों को देखकर, उसे द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के रूप में निर्धारित किया जाता था। वेद के पठन-पाठन से विप्र (विद्वान्) का निर्धारण होता था और जो ब्रह्म को जानने के लिए कर्मरत रहता है, वही ब्राह्मण कहलाता है। यह विभाजन कर्म के अनुसार था, न कि जन्म के अनुसार । गीता में भी भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा है-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ [भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 41]
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्यों और शूद्रों को कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा (जन्म से नहीं) ही विभक्त किया गया है।
यहाँ एक दम सीधी बात यह है कि अपने कर्मानुसार प्राप्त गुणों से स्थिति बदली भी जा सकती है।
शक्ति प्राप्त होने पर कोई किसी पद को नहीं छोड़ना चाहता। कोई नेता बन गया, तो उसके पुत्र -पौत्र योग्य हों या अयोग्य, वे ही सत्ता पर काबिज रहें। उच्च पद पर बैठा व्यक्ति, जनहित का जाप करके, अपने और अपनी पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित गलियारा बना लेता है। नाम बताने की आवश्यकता नहीं, कुछ परिवार बरसों से यही धन्धा करके जन सामान्य को कल्याण करने और सुखी बनाने की मृगमरीचिका में भटका रहे हैं। सामान्य जन भ्रम की उसी मीलों -मील फैली तपन- भरी मरुभूमि में भूखा -प्यासा भटक रहा है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि साहित्य, कला या सामाजिक जीवन में कोई भी व्यक्ति हो, वह विशिष्ट बना रहना चाहता है। धनोपार्जन का सारा भवन उस अकिंचन पर टिका है, जो रात-दिन मेहनत करके पूरी व्यवस्था के लिए नींव का काम करता है।
अपनी बात दफ़्तर से शुरू करता हूँ-अपराजिता जग्गी की लघुकथा ‘तापमान गिर गया’ के साहब को देखिए-“उफ़ कितनी गर्मी है!” साहब माथे का पसीना पोंछते हुए बोले।
फिर घंटी बजाकर बनवारी को एयर कंडीशनर का तापमान कम करने का हुक्म जारी किया। भरी दोपहरी में नीचे जाकर एक आइसक्रीम लाने का आदेश भी साथ ही दे दिया।
सारा काम करने पर बनवारी ने, जहाँ चपरासी बैठते हैं, वहाँ कूलर लगवाने के लिए निवेदन किया किया। बाबू ने फाइल भेजी है। साहब ने बनवारी को कहकर बाबू को बुलाया और डाँट पिलाई-हमसे पूछे बिना कूलर की फाइल क्यों भेजी आपने। आज कूलर माँग रहें हैं, तो कल एयर कंडीशनर भी माँगेंगे…।’’
बड़े बाबू डाँट खाकर चुपचाप लौट गए। बनवारी सबको बता रहा है कि कूलर जल्द लग जाएगा।
दफ़्तर में काम करने वालों की स्थिति क्या होती है, इसे अर्चना राय की ‘गुमनाम’ लघुकथा से समझा जा सकता है। सिर्फ़ ईमानदारी से काम करना ही इनका दायित्व होता है। पैंतीस साल की सेवा के बाद रिटायर होने वाले रमेश को पिता के मर जाने पर चपरासी के रूप में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। वह महीने के आखिरी दिन पगार लेने आता। महीने के बाकी दिन बड़े साहब के बंगले पर घर- बाहर के सारे काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाता था।
अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी तंद्रा भंग हुई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आया। “अब हमारे बड़े साहब रमेश के लिए दो शब्द कहेंगे।”- उद्घोषक के कहने के साथ, बड़े साहब ने मोबाइल पर बात जल्दी खत्म कर, माइक को हाथ में लेकर कहना शुरू किया।
“दिनेश हमारे लिए महज कामगार ही नहीं; बल्कि हमारे घर का सदस्य रहा है।’’ -सुनकर सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा, तो वहीं दूसरी ओर रमेश को झटका-सा लगा।
“दिनेश हमारे लिए तन -मन से पूरी तरह समर्पित रहा है और हर जिम्मेदारी को निष्ठा से निभाता रहा है। “- बड़े साहब ने कहना जारी रखा।
सुनकर रमेश की आँखों में सैलाब उमड़ आया, जिसे वह रोक न सका और “साब जी,…आज तो आप कम से कम मुझे मेरे असली नाम से पुकार लेते।” घरघराती आवाज में कह रमेश फफक- फफक कर रो पड़ा।
दफ़्तर के लोगों से अपने घर के काम कराना अधिकारियों का मौलिक अधिकार बन गया है। ऐसे कर्मचारियों के प्रति इनके मन में अपनत्व या मानवीय सम्बन्धों की कोई ऊष्मा नहीं होती। इनका सम्बन्ध केवल यान्त्रिक होता है। जिसमें संवेदना का कोई भाव नहीं होता। अंग्रेज़ों से यह कोढ़ भारत की अफ़सरशाही में भी लग गया है। अनैतिक तो इसको कोई समझता ही नहीं। रोज़मर्रा सेवाभाव से समर्पित कर्मचारियों की पहचान व्यक्ति की न होकर, केवल बेगार करने वाले अनजाने व्यक्ति की तरह की होती है। उन्हें व्यक्ति का नाम याद रखने की ज़हमत भी नहीं उठानी पड़ती। ये कामगार, सेवा करके भी निष्ठुर शोषक प्रणाली में गुमनाम ही रह जाते हैं। ‘रमेश को दिनेश के नाम से पुकारना’ केवल क्षण भर की घटना नहीं है, जिसको अर्चना राय ने लघुकथा बना दिया है। इस घटना की तह में जो सोच अन्तर्निहित है, शोषण और संवेदनहीनता का जो वट वृक्ष पनपा है, उसकी जड़ें लम्बे समय से गहरे उतरी हुई हैं।
घटना को कागज़ों पर उतारकर, बिना किसी संवेदना के, उसे किसी प्रयोग का पुर्ज़ा बनाना, किसी निर्धारित साँचे में रखकर बिना किसी अनुभूति के लघुकथा बनाने का असम्पृक्त प्रयास करना ‘कथा’ नहीं है। ‘घटना/घटनाएँ ‘ केवल सूत्र हैं, कथा नहीं। शिल्प के सायास ‘प्रयोग’ संवेदना के बिना निष्प्राण वाग्जाल हैं। सजग रचनाकारों को इनसे बचना चाहिए। कच्चे बर्तन में पानी भरने का जो परिणाम होता है, उसी प्रकार प्रयासपूर्वक कथ्यविहीन घटनाएँ लिखने का होता है। इस तरह का लेखन न पहले परिपक्व लघुकथा के दायरे में आता था और न आज।
दफ़्तर का जंजाल एक ऐसा चक्रव्यूह है, जो इसमें घिर गया, तिकड़म के अन्तिम द्वार पर मरना ही उसकी नियति है। देश में चाहे जितना बड़ा परिवर्तन हो जाए, हमारे ये लूट -खसोट के अड्डे कम नहीं होंगे। आज़ादी के बाद भौगोलिक सीमाएँ बदलीं, और भी बहुत कुछ बदला, लेकिन अमरबेल बन हरे-भरे समाज को चूसकर नष्ट करने वाले शोषक नहीं बदले। कमलेश भारतीय की लघुकथा ‘कितना बड़ा दुख’ में नीचे के बाबुओं को सौ-सौ रुपये दे दिए गए , ताकि कोई आपत्ति न लगे। इसके बाद पाँच हज़ार रुपये और देने के लिए प्रॉपर्टी डीलर ने कहा, तो पैसा न देकर उसने सीधे तहसीलदार से मिलने फैसला किया।
पत्रकार का विजिटिंग कार्ड देखकर तहसीलदार ने चाय भी पिलाई और तुरन्त कार्य करने का आदेश दिया। पत्रकार जब कागज़ लेकर अगली विण्डो पर गया, तो वहाँ बैठी महिला ने ‘आज साहब को पता नहीं क्या हो गया है? यह दूसरी रजिस्ट्री है, जो मुफ़्त में की जा रही है।’ कहकर माथा पीट लिया।
लुटने वाले के दुःख से बड़ा लूटने वाले का दुःख है कि आखिर मुफ़्त में काम क्यों कर दिया। सरकारी नौकरी का अर्थ लूट की छूट का पर्याय हो गया है। पत्रकार को डर के मारे छूट दी गई , न कि किसी ईमानदारी के कारण। जनसामान्य को हलाल होना ही है।
समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो सुविधाओं से सदा वंचित रहा है। इसे सर्वहारा वर्ग कह सकते हैं। इसके आगे एक वर्ग वह भी है, जो स्टेटस ( आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक ),कार्य के स्तर, साधनविहीनता, जातिवाद की उपेक्षा आदि के कारण शोषित और उपेक्षित होता रहता है।
साधनविहीनता से अभिशप्त व्यक्ति, संघर्षों में यह सोचकर हार नहीं मानता कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि उसके दिन फिरेंगे, लेकिन ऐसा हरबार होता नहीं । अशोक भाटिया की लघुकथा ‘पीढ़ी-दर-पीढ़ी’ ऐसी ही लघुकथा है। इस रचना के कुछ संवाद देखिए-
उसके पिता ने उसे पढ़ाया नहीं था।
उसने सोचा—मैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।
उसने अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाया।
इसके बाद स्कूल-ड्रेस , फ़ीस और किताबों की की माँग की गई। किताबें नहीं थीं, तो पाठ याद नहीं हुआ तो सज़ा, ड्रेस भी नहीं थी, फ़ीस भी नहीं दे सका, तो नाम कट गया। स्कूल जाना भी बन्द । ‘जब वह बड़ा हुआ, तो उसने सोचा- मैं अपने बच्चों को ज़रूर पढ़ाऊँगा।’ यह करोड़ों वंचितों की नियति है। दूसरी ओर वह वर्ग है, जो इनकी सारी सुविधाओं पर डाका डालकर भी समाज में आदरणीय बना रहता है।
यह हाड-मांस का इंसान द्रवित नहीं होता। केवल जीवन-यापन के लिए संघर्ष करनेवाले अभावग्रस्त व्यक्ति के प्रति किसी की सहानुभूति हो या न हो, निर्जीव कोयले की अनुभूति मन को मथ देती है।आनन्द हर्षुल की प्रयोगवादी लघुकथा ‘कोयले की इच्छा’ पाठक को भीतर तक झकझोर देती है। कथा की कुछ पंक्तियाँ देखिए–
‘धोबी, पॉलीथिन की थैली में, कोयला लेकर अपने घर के भीतर घुसा, धोबी की बच्ची ने, कोयले को सिंघाड़ा समझा। बच्ची कूदने लगी-ताली बजा-बजाकर कि बाबू सिंघाड़ा लाए-बाबू सिंघाड़ा लाए-खुश बच्ची की, खुश-खुश उड़ती ताली, ताल की आवाज से, धोबी का घर भर गया।’
आज पैसे कम होने के कारण धोबी पॉलीथिन की थैली में दो किलो कोयला लाया था। पॉलीथिन की पारदर्शिता से कोयले को सिंघाड़ा समझ खुश होकर कूद रही थी।
बच्ची को इस तरह खुश देखकर पहली बार कोयले के भीतर सिंघाड़ा होने की इच्छा जागी।
यह लघुकथा की शक्ति और सामर्थ्य है कि छोटे से कलेवर में आनन्द हर्षुल ने विवशता का सागर समेट दिया और निर्जीव कोयले के भीतर बच्ची की खुशी के लिए काया-परिवर्तन की लालसा जगा दी।
डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय की लघुकथा- ‘किसान की रोटी’ वंचित वर्ग की विवशता का जीता-जागता चित्र है। अन्नदाता किसान खून-पसीने की कमाई से जो रोटी कमाता है, वह भाग जाती है तथा उसके पेट तक न पहुँचकर भूल-भुलैया से होती हुई पूँजीपति की तिजोरी में कैद हो जाती है। व्यवस्था इसे सुरक्षित स्थिति मानती है। किसान जब शिकायत करता है, तो थानेदार किसान को धमकाकर कहता है-“रोटी के लिए सेठ की तिजोरी से अच्छी जगह और कहाँ मिल सकती है? वहाँ है, तो सचमुच सुरक्षित है। क्यों बे किसान, अब तक तूने रोटी अपने पास रखी ही क्यों थी? कर दूँ तुम्हारा चालान, नाजायज चीज रखने के जुर्म में?”
किसान ने थानेदार के पैर पकड़ लिये, ‘‘माई-बाप! इस बार तो माफ कर दो। आगे से ऐसी गलती नहीं करूँगा।’’
किसानों से सस्ते भाव में फसल खरीदकर उसे महँगे भाव में बेचने वाले मालामाल हो रहे हैं। मेहनत करने वाला किसान अभावग्रस्त होकर जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं कर पा रहा है। राजनीति में पलते हुए सफ़ेदपोश डाकू आम आदमी का कौर छीनकर उससे काला धन कमा रहे हैं। बेशर्मी तो यहाँ तक बढ़ गई है कि यदि कोई व्यवस्था उन पर कार्यवाही करती है, तो वे स्वयं को पीड़ित बताने में भी शर्म महसूस नहीं करते। व्यापार, दुकानदारी या कोई संस्थान चलाना अर्थार्जन के कार्य हैं, रहे होंगे कभी। जिनकी एक भी फ़ैक्टरी नहीं, कोई नियमित व्यवसाय नहीं, उनके पास अरबों की अकूत सम्पत्ति का होना अपराध ही नहीं, लोकतन्त्र और न्याय-तन्त्र का उपहास भी है।
डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय ने व्यंजना के माध्यम से इस लघुकथा को निखारा है। अल्पतम शब्दों में पूरे कथ्य को तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘किसान की रोटी‘ का भाग जाना, जैसे प्रयोग लेखकीय क्षमता सिद्ध करते हैं। यहाँ एक बात लघुकथा के विषय में कहना समीचीन होगा-अपराजिता जग्गी, अर्चना राय, कमलेश भारतीय, और अशोक भाटिया की लघुकथाएँ कथ्य का सूत्र नहीं छोड़ती हैं। चारों का कथ्यों में आया एक भी शब्द अनावश्यक नहीं। हर संवाद कसा हुआ है। आनन्द हर्षुल और डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय की लघुकथाएँ प्रयोग को सिद्ध करने के लिए प्रयासपूर्वक माथापच्ची करके लिखी हुई रचनाएँ नहीं हैं; बल्कि इनमें कथ्य को तीव्रता प्रदान करने वाला प्रयोग सहज एवं स्फूर्त है।
छोटा-मोटा काम करके जीविका चलाना कठिन ही नहीं , चुनौतीपूर्ण भी है। शोषित और वंचित व्यक्ति सन्ताप झेलने के लिए ही बना है। शोषक अनेक रूप धारण करके ईश्वर की तरह सर्वव्यापक है। पवन जैन ने ‘एक टोकरी सब्जी’ के माध्यम से सब्जी बेचने वाली की जिस विवशता को चित्रित किया है , वह सड़कों-गलियों में लगने वाले छोटे- छोटे दुकानदारों की व्यथा-कथा है। बाज़ार तक पहुँचने तक की शोषण- कथा विभिन्न चरणों में इस प्रकार घटित होती है-
1- पेसेंजर ट्रेन में टोकरी से झाँकती ककड़ी को निकालते हुए रेलवे पुलिस के सिपाही ने पूछा “यह किसकी टोकरी है?”
2-फुटपाथ पर टोकरी रखकर बैठने को हुई कि पीछे से आवाज गूँजी: “ऐ बाई! इधर कहाँ बैठ रही, मेरी दुकान के सामने?” सवा किलो ककड़ी को एक किलो तुलवाकर, ‘अभी देते हैं’ का आश्वासन देकर वापिस अपनी दुकान जमाने में लग गया।
3-एक अधेड़ नजरों से उसका जायजा लेने लगे और छोटी ककड़ी उठाकर मुँह में डालते हुए “ककड़ी क्या भाव? ताजी है …, नई आई हो…!” प्रश्नों को उछाल दिया।
4-“ये लो बाई बैठकी की रसीद।’’–नगरपालिका कर्मचारी ने रसीद बढ़ाते हुए कहा।
” अभी बोहनी तक नहीं हुई।’’ कहने पर उसने भी नरमी दिखाई, “थैली में आधा किलो ककड़ी डाल दे, अभी आते हैं, तब तक फुटकर रखना।’’
यही नहीं-1-ग्राहकों के मोल-भाव, जुमले और नसीहते सुनते–सुनते टोकरी खाली होने लगी।
2-दिनभर की धूप से सब्जी को तो बचाए रखा, लेकिन ‘लिजलिजी छुअन और टटोलती नजरों की जलन से’ कुम्हला गई।
3-पेट भर भोजन करके नहीं; बल्कि-पेट में दो समोसे डालकर सपनों की डोर पकड़े वापसी को शाम की गाड़ी में सवार हो गई।
4-रोटी की जुगाड़ में की गई जद्दोजहद के लिए ‘‘किसानों को सीधे खरीदार से जुड़ना चाहिए, किसानों को लागत मूल्य का दो गुना मिलना चाहिए, छोटे किसानों से मोलभाव नहीं करना चाहिए…।’’ ये नारे बेमानी सिद्ध हुए हैं।
शोषण केवल सब्जी तक ही सीमित नहीं। सब्जियों के अतिरिक्त जो शोषण हुआ, जो बेमोल बिक गया, उसे बताना कठिन है।
सहृदय पाठक इस लघुकथा के प्रत्येक वाक्य के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेगा। समवेदना की यह शक्ति इस लघुकथा का प्राणतत्त्व है। इस तरह के रचनाकर्म के लिए पहले कथ्य को गहन अनुभूति की धीमी-धीमी आँच में तपाना पड़ता है। पहले दिन की शाम से लेकर बाज़ार से लौटने तक की छोटी-छोटी घटनाओं का ताना -बाना कथ्य को जीवन्त और अनुभूत सत्य का आकार देता है। प्रयासपूर्व गढ़ी हुई घटनाओं को या सुनी-सुनाई बातों को लिख देना, लघुकथा नहीं है। लघुकथाकारों की एक बेलगाम भीड़ इसी महायज्ञ में लगी हुई है। अपच का वमन कर देना, लघुकथा नहीं। निष्प्राण घटनाओं को कोई शीर्षक देकर लिख देना, मन की भड़ास हो सकती है, लघुकथा नहीं। छोटी-छोटी सामान्य घटनाएँ एक दूसरे से जुड़कर किस प्रकार प्रभावी कथ्य बनती हैं, इस लघुकथा से सीखना चाहिए।
कुलीन वर्ग में ऐसे बहुत मिल जाएँगे, जो धन, पद, पुरस्कार या प्रतिष्ठा पाने के लिए कितना भी नीचे गिर सकते हैं। आशा से अधिक मिल जाने पर भी उनकी लिप्सा का अन्त नहीं। सभी क्षेत्रों पर दृष्टिपात करके देख लीजिए, अकूत धन मिल जाने पर भी अनैतिक साधनों से धनकुबेर बनने की होड़-सी लगी है। इस होड़ में मन का चैन और आँखों की नींद भी गँवानी पड़ जाए, तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भोजन ठीक से भले ही हज़म न हो, गरीबों की पाई-पाई चट करके आने वाली पीढ़ियों के लिए नोटों का पहाड़ खड़ा करने में कुछ लोग पीछे नहीं। जीवन की विषम परिस्थितियों में केवल दो जून की रोटी का कठिनता से जुगाड़ हो जाए, तो समझो बहुत कुछ हो गया। इतने पर भी यदि कोई शोषित और वंचित होकर भी अपना स्वाभिमान बचाए रखता है, न धैर्य खोता है, न स्वाभिमान, तो समझ लीजिए, यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
रामकरन की दो लघुकथाएँ ‘हार’ और ‘काँटा’ इसका जीता जागता उदाहरण हैं। हार के जिस मोची के ‘पास दो पॉलिश की डिब्बी थी–एक काली, दूसरी लाल, एक निहाई, कैंची और कुछ चमरौधे बस।’ उसका स्वाभिमान देखिए, वह केवल सैंडल के तल्ले को सिल सकता है, चिपकाने का साधन उसके पास नहीं; इसलिए वह दूसरे मोची के पास जाने का इशारा करता है। मोची को पचास रुपये देकर वह चिपकाने वाला गोंद मँगा लेता है। मोची ने उस दिन उन्नीस रुपये कमाए। उसी में घर चला लेता है। राशन कार्ड पर अनाज मिल जाता है। दो किलो आलू दो दिन काम आ जाता है। बच्चों की पढ़ाई भी हो जाती है; क्योंकि “फीस नहीं देना पड़ता। सरकारी में हैं। खाना भी मिलता है।’’ सामने वाला भाई फल खिला देता है। सैंडल ठीक कराने वाला बार-बार कुछ न कुछ पूछकर उसको हीनताग्रस्त करके पराजित करना चाहता है।
मोची न गुस्सा करता है, न झुँझलाता है, न उसके मन में कोई असंतोष था। अभाव के बीच भी मोची शान्त और वह साधन सम्पन्न होने पर भी उद्विग्न। ‘‘कितना दूँ?” पूछने पर वह बोला– ‘‘जो मर्जी।’’
‘जो मर्जी’ कहकर मोची ने जैसे उसको धोबी पाट मारकर चित्त कर दिया हो।
रामकरन की ‘काँटा’ में भी सर्वहारा के स्वाभिमान को उकेरा गया है।
बारहों महीने व्यस्त रहकर काम करने वाला किसान, पाँच बीघे के खेत में काम करता है। नपे-तुले संवादों से कथा आगे बढ़ती है।
“खाने भर का अनाज हो जाता है। बेचने के लिए नहीं बचता। खेत भी गल्ले पर है, यानी खेत भी उस खेतिहर का नहीं।
किसी पाटीदार के पास भी अपना खेत नहीं। फिर भी सब किसान हैं, खेती करते हैं। जब नाम पर खेत नहीं, तो सरकारी अनुदान भी नहीं मिलता। सवाल-दर सवाल किसान बताता है कि उसके परदादा के पास भी खेत नहीं था। भगवान ने कुछ को दिया है, उनको नहीं दिया।
“भगवान ने आपको क्यों नही दिया?” का उत्तर दिया-“अब नही दिया, तो नही दिया। क्यों नही दिया, ये वही जाने,” वे मुस्कुरा कर बोले।
भगवान ने उनको क्यों नहीं दिया, इस पर किसान झल्ला उठता है- “भगवान के नाम पर संतोष तो करने दीजिए…कहाँ सिर फोड़ लूँ…।’’
अभावग्रस्त जीवन में परिश्रम से अगर किसी तरह गुज़ारा हो जाता है, तो किसान उसी से सन्तुष्ट हो जाता है। कथा का मुख्य बिन्दु है कि अभाव क्या है? असन्तुष्टि का भाव ही अभाव है। जिनके पास जीवन -यापन के जितने अधिक साधन होते हैं, उनका असन्तोष भी उतना ही गहरा होता है। पशु भी पेट भरने पर खाना बन्द कर देता है; लेकिन असन्तोष और अतृप्ति के पाश में जकड़ा मनुष्य ‘और अधिक -और अधिक’ पाने के लिए सारे सुख -चैन को तिलांजलि दे देता है। दूसरों का कौर छीनने वालों की अतृप्ति पागलपन तक बढ़ जाती है। यहाँ सन्तोष का अर्थ यह कदापि नहीं कि कर्म करना छोड़ दीजिए। सन्तोष का तात्पर्य है ‘जीवन-यापन की वह मनःस्थिति, जिसमें व्यक्ति अपने कार्य और उसके परिणाम स्वरूप प्राप्त जीवन को जीभर कर जी रहा है। वह उद्विग्न नहीं, बल्कि अपने जीवन से सन्तुष्ट है। भोजन की तृप्ति, नींद का आनन्द , मन की अनुद्विग्नता खरीदी नहीं जाती; बल्कि आत्मतोष से निर्मित करनी पड़ती है।’
संवादों की सार्थक शृंखलाबद्धता कथा के विकास को ही नहीं, लेखक के गम्भीर आशय को भी पूरी त्वरा के साथ प्रस्तुत करती है। यह रामकरन की लघुकथाकार के रूप में सफलता है।
संवाद यदि पूरी तरह अनुस्यूत न हों, संवादों में संवेदना की ऊष्मा न हो, तो वे कथा की निर्मिति में सहायक नहीं हो सकते। किसान के संवाद, जीवन की भट्टी के ताप से तपे हुए हैं, जो ‘काँटा’ लघुकथा को सार्थकता प्रदान करते हैं। कोरे वर्णन, सपाट और भरती के संवाद, केवल घटना को कथा समझने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है; जिसके कारण कथा की अनुपस्थिति का संकट निरन्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसी रचनाओं में कथारस की बात करना बेमानी हो जाता है। जब कथा ही नदारद है, तो कथारस कहाँ से आएगा?
वंचित वर्ग के लिए बहुत बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। जितने गलीज़ काम हैं, वे सब उसके जिम्मे हैं। वह हमारे लिए उस समय महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि जन सामान्य उनको नहीं कर सकता। जब उसको मेहनताना देने का अवसर आता है, उस समय उसे न्यूनतम कैसे दिया जाए, यह विचार उद्वेलित कर जाता है। ‘फाँस’ लघुकथा में सुदर्शन रत्नाकर ने गटर की सफ़ाई करने वाले के लिए इसी मनोवृत्ति को उजागर किया है। दुर्गन्ध इतनी थी कि उबकाई आ जाए। एक हज़ार रुपये से कम का काम नहीं। तीन आदमी काम में लगे हैं। ‘उसने पर्स से पाँच सौ, का एक, दो सौ-सौ के तथा एक सौ रुपये के नोट निकाल कर अपने हाथ में रख लिये।’ काम की प्रगति के साथ यहीं से बदलाव शुरू हो गया। पानी थोड़ा आगे जाने लगा, तो हज़ार के बदले पाँच सौ का विचार आ गया। ‘एक ने हाथ नाली में डाला और उसमें फँसी ईंट का टुकड़ा बाहर निकाल दिया। पानी तेज़ गति से मेन होल में जाने लगा’ की स्थिति में पहुँचते ही, पाँच सौ भी अधिक लगे, तो तीन सौ बहुत हैं’ का विचार आ गया। उनको तीन सौ दे दिए। उनके जाने के बाद मन में यह फाँस अटक गई कि दो सौ रुपये बहुत थे। सुदर्शन रत्नाकर ने इस कथा में मेहनताना देने के विचार को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करके जीवन्त कर दिया है। किसी विस्फोट की तरह या हड़बड़ी में कुछ भी अचानक नहीं हुआ। रचना में कोई संवाद नहीं। केवल वैचारिक ऊहापोह के विश्लेषण से लघुकथा अपने चरम पर पहुँचती है। शीर्षक हर स्तर पर लघुकथा को सार्थकता प्रदान करता है। ऐसी लघुकथाएँ लम्बे आत्मचिन्तन और गहन मन्थन से निःसृत होती हैं।
सुदर्शन रत्नाकर की ‘साँझा दर्द’ के, चारपाई बुनने वाले के पास काम ही नहीं क्योंकि पॉश कॉलोनी वाले चारपाई ही नहीं रखते। वह आगे बढ़ा तो गंदे नाले के पार की बस्ती में एक झोपड़ी के बाहर ही जंग लगी स्टील की चारपाई दिख गई वह खुश हुआ कि यहाँ काम मिल जाएगा; लेकिन चारपाई बुनने वाला और चारपाई वाला मज़दूर दोनों पात्र अभावग्रस्त हैं। पहले को काम की कमी , दूसरा ठण्ड में अर्थाभाव के कारण सीलन -भरी जमीन पर सोने के लिए बाध्य है। उसके पास चालीस रुपये भी नहीं कि चारपाई की मरम्मत करा सके। बात न बनने पर खाँसता हुआ मज़दूर लेट गया। चारपाई बुनने वाले के लिए अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति है। ‘भूख के मारे उसके पेट में कुलबुलाहट हो रही थी’ ऐसी स्थिति में बिना कुछ लिये मरम्मत करके चारपाई भीतर रख दी। वह ‘‘चारपाई ठीक करवा लो” की आवाज़ लगाता हुआ आगे बढ़ गया। उसके चेहरे पर गहरे संतोष था। यही मानवीयता का भाव, उस अभावग्रस्त चारपाई बुनने वाले के व्यक्तित्व को ऊँचाई प्रदान करता है।
व्यक्ति के बदलने पर स्थितियाँ किस प्रकार बदल जाती हैं, इसे अशोक भाटिया की लघुकथाओं में देखा जा सकता है। ‘एहसास’ इनकी बहुत छोटी -सी लघुकथा है। स्टेटस की समस्या हर जगह देखने को मिल जाएगी। इस कथा में निहित व्यंग्य भी देखने योग्य है।
‘कुत्तों की प्रदर्शनी थी। मैं भी देखने पहुँच गया। कुछ देर बाद नौकर कुत्ते लेकर आए। मैं एक सोफे पर बैठा ही था कि मैनेजर ने कहा कि सोफे कुत्तों के लिए हैं। इसलिए मुझे उठना पड़ा।
प्रदर्शनी खत्म हुई, तो मैं चाय पीने के लिए एक खोखे पर पहुँच गया। मुझे देखकर कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों में से एक-दो अपनी मैली धोतियाँ समेटते हुए उठ गए।
कुर्सी पर बैठते हुए मेरे सामने प्रदर्शनी का वह दृश्य घूम गया।’
कुत्तों की प्रदर्शनी, तो सोफ़े कुत्तों के लिए थे। मैनेजर के कहने पर उसे उठना पड़ा। भला कुत्तों की प्रदर्शनी में किसी भले आदमी का क्या काम ! प्रदर्शनी खत्म होने पर जब वह चाय पीने के लिए खोखे पर पहुँचा, तो कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों में से एक-दो अपनी मैली धोतियाँ समेटते हुए उठ गए। ‘मैली धोतियाँ’ के माध्यम से लेखक ने पहले से बैठे एक-दो लोगों के स्तर को रेखांकित किया है। उनका कुर्सी छोड़कर उठना वैसा ही है , जैसा कुत्तों के लिए निर्धारित सोफ़े पर किसी भले आदमी का बैठना। एहसास का साम्य दर्शाने वाली दोनों स्थितियाँ कथा को महत्त्वपूर्ण बनाकर व्यंजित करती हैं।
अशोक भाटिया की ‘तीसरा चित्र’ लघुकथा कला के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र के वैषम्य को चित्रित करती है। पहले चित्र में अमीर और स्वस्थ बच्चे को नौकर की गोद में दिखाया गया था। रौब में भी बच्चे के चेहरे पर असन्तोष का भाव तन्मयता से दिखाया गया था। दूसरे चित्र में मध्यवर्गीय बच्चा ‘माता पिता का हाथ पकड़कर खड़ा है और अपना परिचय खुद ही दे रहा है। बच्चे को सुंदर कपड़े पहनाकर माता- पिता भी बहुत खुश हैं। बेटे के बनाए आखिरी चित्र को पिता ने देखा। धीमे से बोले –“तुमने इस चित्र में जान फूँक दी है, मिट्टी के ढेर पर बैठा दुबला सहज बच्चा… हवा में बिखरे बालों में से झाँकती चमकीली आँखें…, जेब में मिटटी भरते उसके हाथ…।
पिता ने पूछा कि पहले दो चित्र रंगों से बनाए, लेकिन तीसरा चित्र काली पेंसिल से क्यों बनाया? चित्रकार बेटे का उत्तर सोचने पर मजबूर करता है- “पिताजी, इसकी बारी आई, तो सब रंग खत्म हो चुके थे।’’, बेटा धीमे से बोला।
अभावग्रस्त बच्चों का चित्र अधिक सहज और अनूभूतिपरक बना ; क्योंकि वह कलाकार की यथार्थ अनुभूति के अधिक निकट था।
कलाकार और कलाकृति के सन्दर्भ में डॉ. उपमा शर्मा की दो लघुकथाएँ उद्धृत की जा सकती हैं-अन्तर्दृष्टि और मूल्यांकन। कला प्रदर्शनी में लगे अनगिनत चित्रों में एक चित्र अनुपम रंगों के सौन्दर्य से ध्यान खींच रहा था, पर वहाँ भीड़ नहीं थी। कलाकार पहली बार आया था। सलौनी का ध्यान उस पर गया। रंग-संयोजन सार्थक और प्रभावशाली था; लेकिन वहाँ एक भी दर्शक नहीं था। सलौनी के पूछने पर– ‘‘तुम्हें अपनी कला की उपेक्षा देख बुरा नहीं लग रहा चित्रकार!”
वह सामान्य रहा। चित्रकार का मानना था कि अगर कला का सच्चा पारखी एक भी हो, तो कला को सार्थक मानना चाहिए। ‘चित्र में बहती हुई बूँद सीपी के अंदर गिर पड़ी थी, जो मोती बनने की प्रक्रिया में थी’ सीपी में बूँद का गिरना ही बूँद की सार्थकता है। बूँद का मोती बनना ही सच्ची कला है। दूसरी लघुकथा मूल्यांकन में डॉ. उपमा शर्मा ने बताना चाहा कि कला केवल निर्मित चित्र नही, बल्कि कलाकार के व्यक्तित्व का भी दर्पण है। हृदय की उदारता ही सच्ची कला है। घोषित परिणाम के अनुसार ‘संपदा जी और अभिनव जी दोनों को बराबर नम्बर मिले हैं। अब दर्शकों को अपना-अपना मत देना है। चित्रकारों को भी अपना मत स्वयं या दूसरे के लिए देना था। सम्पदा की दृष्टि से दूसरा चित्र उसके चित्र से तनिक भी कमतर न था। किसी कलाकार के लिए सुन्दर चित्र बनाना ही महत्त्वपूर्ण नहीं, दूसरों की कला के प्रति सराहना और सम्मान का दृष्टिकोण रखना, कला का उदात्त रूप है। उसे पता चला कि जिस कलाकार ने दूसरा चित्र बनाया, उसके तो हाथ भी नहीं थे। उसने केवल पैरों से ही वह चित्र बनाया था।
‘संपदा ने दो पल सोचा और अपना मत उस चित्रकार के पक्ष में डाल दिया।’ इस लघुकथा में लेखिका ने इस विचार को स्थापित किया है कि गुणग्राहकता ही सच्ची कला है।
सभी लोग कलाकार का सम्मान करें, यह सम्भव नहीं। रतन चंद ‘रत्नेश‘ की ‘पेंटिंग’ लघुकथा इसका सशक्त उदाहरण है। लोग अपनी कार्यसिद्धि के लिए कलाकारों की सहायता लेते हैं। उनके लिए कला या कलाकार महत्त्वपूर्ण न होकर, केवल अपना कार्य महत्त्वपूर्ण है। ‘निर्देशक को एक ही चिन्ता खाए जा रही थी। वे मंच पर ड्राइंग-रूम की दीवार पर कुछ बेहतरीन पेंटिंग्स टाँगना चाहते थे, ताकि मंच जीवंत हो उठे।’ निर्देशक ने अपने परिचित से आग्रह करके उनकी पेँटिंग ले गए। नाटक सफल हुआ। निर्देशक ने कहा-‘नाटक की सफलता में सिर्फ मेरा ही हाथ नहीं, उन कलाकारों का भी उतना ही योगदान है, जिन्होंने अपनी अभिनय कला की छाप छोड़ी। बहरहाल उन पेंटिंग्स के बारे में आपका क्या ख्याल है?’
‘कौन-सी पेंटिंग?’ आगंतुकों ने एक दूसरे को प्रश्नभरी निगाहों से देखा।
निश्चित रूप से निर्देशक को झटका लगा होगा। नाटक के दृश्य को विश्वसनीय बनाने के लिए, जिन पेण्टिंग का उपयोग किया था, उन पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। समक्ष होते हुए भी कलाकार का नेपथ्य में चले जाना, खटकने वाली बात है। परिदृश्य में नाटक का यथार्थ प्रभाव सृजित करने के लिए कलाकृतियों के माध्यम से जो कार्य किया गया, उस पर ध्यान न जाना निर्देशक को खटक गया। ‘रत्नेश‘ जी ने कथ्य का विकास कुशलतापूर्वक किया।
इस सदी का सर्वाधिक पीड़ादायक परिवर्तन है कि अब बच्चे, बच्चे नहीं रहे, बूढ़े हो गए हैं। संचार माध्यमों की भीड़ का आक्रामक प्रहार, एकल परिवार और अभिभावकों की व्यस्तता और विवशता, स्कूलों द्वारा की जा रही रस्मदायगी ने बच्चों की सहजता छीन ली है। उनके बेरौनक चेहरों से भोलापन नदारद है, उनकी दूधिया मुस्कान दम तोड़ती जा रही है। बड़े-बुज़ुर्गों से किस्से सुनने की उनका उत्कण्ठा गायब है। उग्रता और प्रतिरोध की शिकन उनके माथे पर देखी और पढ़ी जा सकती हैं। फिर भी कहीं-कहीं सहजता बची है। कहाँ पहले रविवारी समाचार-पत्रों में बच्चों का एक पूरा पृष्ठ होता था। आज के दिन वह सब सिरे गायब है। लघुकथाओं में भी बाल अनुभूतियों को लेकर रची जाने वाली रचनाओं का नितान्त अभाव है। बाल मनोविज्ञान को जाने बिना, बड़ों को पात्र बनाकर उपदेश ठूँस देना हास्यास्पद है। बालसुलभ कथ्य की तलाश और उसका निर्वहन सरल नहीं है।
इस सन्दर्भ में डॉ. अशोक भाटिया की ‘नाराज़ी का अधिकार’ और डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की ‘बदला’ लघुकथाएँ विचारणीय हैं, जिनमें बालसुलभता को बिना किसी तामझाम या उपदेश के चित्रित किया गया है। ‘नाराज़ी का अधिकार’ में बेटी नाराज़ थी। पापा ने केबल की तार काट दी, इसलिए। पिता आश्वासन देते हैं-‘स्कूल के टैस्ट हो जाएँ, फिर लगा देंगे।’ फिर भी बेटी चुप और नाराज़। पिता उसके छोटे भाई के पास सोने चले गए। बेटी को लगा कि पिता उसे अधिक प्यार करते हैं। यह भी एक कारण है; लेकिन बेटी की समस्या अलग तरह की है। वह मासूमियत से कहती है-‘पर मुझे सोने से पहले आपको लातें जो मारनी थीं। उसके बिना मुझे नींद नहीं आती।’ यह अकेला वाक्य लघुकथा को जीवन्त बना देता है। बेटी की इस बात को सुनकर पापा के साथ बेटी भी हँस पड़ती है।
‘ बदला’ लघुकथा का बाल मनोविज्ञान कुछ अलग है। अपनी माँ उमा को रचना बताती है – ‘‘करती तो हूँ सारा काम। सब्जी बनाने के लिए टमाटर नहीं ला के दिए थे। आपके साथ कपड़े भी तो धुलवाए थे।’’
‘‘पढ़ भी लिया कर।’’ कहने पर- ‘‘कर तो लिया स्कूल का काम।’’ मशीन से कपड़ा पकड़ने की शैतानी पर एक थप्पड़ खा जाती है। इसी बीच में कोई दरवाज़ा खटखटाता है। रचना एकबार कहने से दरवाज़ा नहीं खोलती। गुस्से से मम्मी की तरफ देखा। दोबारा कहने पर उठी और पापा के दोस्त के लिए दरवाजा खोला।
‘‘कौन था?’’ पूछने पर रुखाई से बताया-‘‘अंकल थे।’’
साथ ही बोली, ‘‘मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।’’
यह था मम्मी से खाए थप्पड़ का प्रतिकार। इस प्रतिकार में कोई छल-छद्म नहीं था, थी केवल रूखेपन से की बालसुलभ प्रतिक्रिया-‘‘मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।’’ डॉ. दीप्ति ने इस एक वाक्य से ‘बदला’ लघुकथा को विश्वसनीय ही नहीं, अनुभूतिपरक भी बना दिया है।
बाल मज़दूरी कराना भले ही अपराध की श्रेणी में आता हो, देश के लाखों बच्चे , जिन्हें पढ़-लिखकर कुछ बनना था, बाल मज़दूर के रूप में शोषण का शिकार हैं। उनसे कठोर परिश्रम कराया जाता है।सामान्य नींद लेना भी उनके भाग्य में नहीं। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘किरचें’ क्रूर शोषण का रूह कँपाने वाला चित्र है। आदि कुमारी पर भक्तों की भीड़ के कारण वह बाल मज़दूर कई दिन से सो नहीं पाया था। ऊपर से दूकानवाले की चिल्लाहट और क्रूरता। लड़के की लाल सुर्ख आँखें नींद की वजह से मुँदी जा रही थीं। उसके सामने जूठे गिलासों का ढेर लगा हुआ था। झपकी लगने से गिलास हाठ से छूटकर टूट गया। दूकानदार का थप्पड़ पड़ा। क्रूरता इतनी की उसके चारों तरफ़ किरचें फैला दी। नींद के झोंके में उसका हाथ किरच के चुभने से घायल हो गया। साबुन के घोल में न डुबोकर उसने केवल पानी से ही धोकर गिलास का ढेर लगा दिया और वहीं किरचों के बीच बेसुध होकर सो गया।
जहाँ परिवार में कोई आय का साध नहीं होता, कमानेवाले हाथ नहीं होता, वहाँ बालश्रम घर-परिवार के पोषण के लिए विवशतावश किया जाता है। जीवन-यापन के इस संघर्ष में अपनी जिम्मेदारी का एहसास करने वाले बच्चे समय से पहले ही जवान हो जाते हैं। साहनी जी की ‘स्कूल’ लघुकथा इसी श्रेणी में आती है। पिता नहीं हैं, माँ दरियाँ बुनकर घर का खर्चा चलाती है। बेटे ने कुछ काम ज़िद की जिसके लिए वह टोकरी-भर चने लेकर घर से निकला। बेटे को अकेले नींद भी नही आती, इसलिए माँ के पास ही सोता है। तीन दिन से घर नहीं लौटा। माँ की व्याकुलता स्टेशन मास्टर के सामने प्रकट होती है। गाँव के अन्धकार और सन्नाटे से भरे स्ट्रेशन पर वह व्याकुलता से आने वाली पैसेंजर ट्रेन का इन्तज़ार करती है। ट्रेन आने पर –‘एक आकृति दौड़ती हुई उसके नज़दीक आई। नज़दीक से उसने देखा। तनी हुई गर्दन…बड़ी-बड़ी आत्मविश्वास से भरी आँखें… कसे हुए जबड़े… होठों पर बारीक मुस्कान…।’
माँ को देखकर बेटे की गम्भीर बात-“माँ तुम्हें इतनी रात गए यहाँ नहीं आना चाहिए था!” से लगा कि तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया? ‘स्कूल’ कोई प्राइमरी या जूनियर स्कूल नहीं (अनजाने में कुछ पाठक शब्द के अभिधेय अर्थ तक ही सीमित रह जाते हैं), बल्कि जीवन की वह पाठशाला है, जिसके हम सभी विद्यार्थी हैं। हर व्यक्ति, मृत्यु पर्यन्त जीवन के संघर्षों से कुछ न कुछ सीखता है। यही प्रत्येक व्यक्ति का स्कूल है। इस लघुकथा का शीर्षक ‘स्कूल’ रोज़मर्रा प्रयोग में आने वाला शब्द न होकर, जीवन जीने की शैली को व्यक्त करता है। परिस्थितियाँ और दायित्व चना बेचने वाले संघर्षचेता लड़के को आत्मविश्वास से भर देते हैं।
सुकेश साहनी की अन्य लघुकथा ‘प्रक्षेपण’ में रोहित की मनःस्थिति का सूक्ष्म चित्रण है। उसे रमन अंकल के यहाँ से रोज़-रोज़ अखबार माँगकर लाना पसन्द नहीं। कारण-जब वह अखबार माँगने जाता है, तो उसे उस परिवार की उपेक्षा-भरी दृष्टि का सामना करना पड़ता है। परिवार के दबाव में उसे जाना पड़ता है। रोहित के परिवार वाले उसकी मनोदशा नहीं समझ पाते हैं। पापा की जलती हुई आँखें उसे रमन अंकल के घर जाने को बाध्य करती हैं। रोहित माँगकर अखबार नहीं लाना चाहता; क्योंकि ऐसा करने से उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है। घर के सभी सदस्य उसे कामचोर, बहानेबाज बताकर प्रताड़ित करते हैं। लेखक ने रमन की स्थिति को बताने के लिए –‘बरामदे में उनका झबरा कटोरे से दूध पी रहा था’ का प्रसंग इस कथा में जोड़कर कुत्ते की हैसियत का संकेत किया है। बच्चे को केवल बच्चा नहीं समझना चाहिए। बड़ों की तरह उसका भी आत्मसम्मान महत्त्वपूर्ण है।
बच्चे के विकास और मानसिक पोषण और व्यवहार पर माता-पिता के कार्यकलाप और व्यवहार का सीधा प्रभाव पड़ता है। किट्टी पार्टी में-‘संस्कारों के निर्वहन में माँ की भूमिका’ पर चर्चा की गई।शिल्पा को रास्ते में कोई वाहन नहीं मिला, जिसके कारण वह थक गई थी। घर पहुँचकर अपने नौकर चन्दन को आवाज़ लगाई, जिसको उसने सुना नहीं, तो वह चिल्लाई–‘चन्दन, ओ चन्दन, मर गया क्या ?’’ वह दौड़कर पानी का गिलास ले आया। इसी बीच उसका चार वर्षीय बेटा नितिन भी स्कूल से आ गया था। बस्ता फर्श पर पटककर वह भी चिल्लाया- ‘मम्मी, मुझे रोटी दो, भूख लगी है।’ माँ के न सुनने पर-‘मम्मी, ओ मम्मी ! जागी हो या मर …… ।’
शिल्पा तमतमाकर बोली- ‘बावा, ये क्या तरीका है मम्मी से बोलने का ?’
नितिन ने जब गले से लिपटकर भोलेपन से कहता – ‘मम्मी, मुझे रोटी दे दो, भूख लगी है’ शिल्पा को चंदन से हुआ अपना वार्त्तालाप स्मरण हो आया। छोटे बच्चे अनुकरण से बहुत -सी बातें अनायास सीखते हैं। उन्हें सही-गलत का उस समय पता नहीं होता; अतः बड़ों को अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए।
संग्रह- वृत्ति बच्चों का विशेष गुण है। वह कंकड़ -पत्थर हों या कुछ और। जिन चीज़ों से बच्चों का लगाव होता है, वही उनके लिए बहुमूल्य होती हैं। छोटी से छोटी वस्तु से उनका लगाव, उन्हें जीवन-जगत् के इस सत्य से परिचित कराता है कि वस्तु की उपयोगिता उसके लगाव से जुड़ी है। मनुष्य में यह भाव ही अतीत की स्मृतियों को सहेजकर रखने की प्रेरणा देता है। यह भाव न होता, तो आज हमारे प्राचीन स्मारक न होते, हमारी समृद्ध संस्कृति न होती, हमारे प्राचीन तीर्थ न होते। उर्मि कृष्ण की ‘अमानत’ बाल मनोविज्ञान पर केन्द्रित लघुकथा है। नए मकान में जाने के लिए कवि शिवा का सामान ट्रक में लद चुका है। चार साल की गुड़िया को आवाज़ दी, तो वह फ़्रॉक में कंकड़–पत्थर का बोझा लिये धीरे से बाहर आई। सरिता ने उसको डाँटा और झोली के पत्थर बिखेर दिए। माँ की इस प्रतिक्रिया से आहत गुड़िया बिखरे पत्थरों को देख फूट–फूटकर रो पड़ी। पिता ने हस्तक्षेप किया-‘‘– ये उसके बचपन की अमानत हैं, तुम्हारे ट्रक–भर सामान से ज्यादा कीमत है गुड़िया के लिए इन पत्थरों की।’’
सरिता को अपनी गलती का अहसास हुआ। तीनों मिलकर बिखरे पत्थर करने लगे तो गुड़िया खुशी लौट आई।
।कबीर कहते हैं- ‘मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक’। कबीर का यह परामर्श उनके लिए है, जो संयम के साथ साधना करना चाहते हैं। वह तभी सम्भव है, जब मन पर नियन्त्रण हो। सामान्य जीवन में तो मन की बात सुननी भी होती है, कोई बात मन में ठुके, तो करनी भी होती है। मन की सारी दुर्बलताएँ मनुष्य को उसकी शक्ति और सीमा का अनुभव कराती हैं। बस मन कभी पराजित न हो; क्योंकि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।’ यह भी कबीर ने ही कहा है। ये दोनों विचार एक दूसरे के विपरीत लगते हैं, पर हैं नहीं। मन किसी से मिलाना है , तो तब जो मन के अनुरूप लगेगा, जिससे अपनेपन का एहसास होगा, उसी से आत्मीयता हो सकेगी। डॉ. सुषमा गुप्ता ने ‘कैमिस्ट्री’ लघुकथा में इस कथ्य को बखूबी प्रस्तुत किया है।
मोहनदास की घर के गेट के सामने वाली पटरी पर बैठे रामदीन मोची से आत्मीयता है। दोनों अपने सुख-दुख की बातें एक दूसरे से कर लेते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उनके पास कुछ काम भी नहीं है। पत्नी की मृत्यु के बाद वे अकेले पड़ गए हैं। बस वक्तकटी के लिए रामदीन मोची से बतिया आते हैं। अकेले अपने मन की बात किसी और से भी करें, तो कैसे। बहू सीमा को यह आत्मीयता पसन्द नहीं। उसके आपत्ति करने पर पति उसे समझाता है- ‘‘माँ के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं। अब तुम और मैं तो दफ़्तर चले जाते हैं, तो समय काटने उसी से बतिया आते है।’’
सीमा मुस्कुराकर स्वीकार कर लेती है कि ‘कैमिस्ट्री हो तो ऐसी।’ सामंजस्य के इस मनोविज्ञान को समझना होगा। चाहे जितने भी बड़े भौतिक साधन क्यों न हों, कोई भी आदमी दिनभर चुपचाप नहीं बैठ सकता। जिसके सामने मन में उठती तरंगों को व्यक्त किया जाए, ऐसा कोई हमदर्द तो चाहिए। संवादहीनता की स्थिति में जीवन नीरस हो जाएगा।
डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘मोहपाश’ लघुकथा जीवन को उद्वेलित करने वाली घटनाओं के प्रभाव को रेखांकित करती है। यह कथा गहरे अवसाद में डूबे एक पिता की विभ्रम की मनःस्थिति का मार्मिक चित्र है। पति-पत्नी के ये संवाद देखिए-
“आ गया लगता है। जा दरवाज़ा खोल दे।’’
“नहीं जी, कोई नहीं आया।’’
“अरे खिड़की पर लाइट चमकी अभी गाड़ी की। देख ध्यान से वही होगा। कार साइड लगा रहा होगा।’’
खुद ही जाकर देखता और स्वीकार करता है कि ‘बाहर तो कोई नहीं है पर लाइट तो हमारे गेट पर ही चमकी थी।’
वह बेहद निराश हो बोला।
“XX
“चलो अब सो जाओ। जब आना होगा आ जाएगा। बहू खोल देगी अपने आप। यूँ ही बेटे के मोह में रात काली करते हो।’’
“क्या करूँ, नींद ही नहीं आती वह जब तक घर नहीं आता।’’
पानी लेने के लिए बहू रसोई में आती है, तो दोनों को सोने को कहती है-‘‘कल इनकी बरसी है। आने जाने वालों का ताँता लगा रहेगा फिर आराम नहीं मिलेगा आप दोनों को।’’
लाइट फिर चमकी खिड़की पर और बूढ़ा फिर सजग हो गया कि शायद अब की ……।
जवान बेटे की मृत्यु से संतप्त बूढ़ा पिता, विभ्रम की स्थिति में जी रहा है। खिड़की पर लाइट के चमकते ही उसे लगता है कि बेटा ऑफ़िस से आ गया है। पिता की इस करुणा-विगलित मनःस्थिति को सुषमा गुप्ता ने मार्मिक संवादों के माध्यम से जिस प्रकार कथ्य सम्प्रेषित किया है, वह पाठक को बरबस द्रवित और विचलित कर देता है। यह लघुकथा अवचेतन मन की बहुत- सी दुखती पर्तों को एक-एककर खोलती है।
-0- क्रमशः