‘अनबन’लघुकथा का पाठ डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 29 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-
अनबन
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी
अधिकार तथा कर्त्तव्य, जब तक साथ-साथ रहे, तब तक समरसता की धारा बहती रहे। अधिकार के आत्म-केन्द्रित होने पर कर्त्तव्य ने उसे सचेत किया, किन्तु हठी अधिकार न माना,‘‘मैं ही सब कुछ हूँ। मेरे ही इंगित पर दुनिया चलती है। जय और पराजय मेरी ही क्रीड़ा हैं।”
कर्त्तव्य को यह दम्भ असह्य हो गया, ‘‘यदि मैं न होता तब तुम उस शक्ति का प्रयोग कहाँ करते? अस्तु अब भी मान जाओ।”
‘‘नहीं, कभी नहीं। आखिर मैं कौन हूँ? पहचानो।” अधिकार ने कर्त्तव्य की उपेक्षा कर उसका साथ छोड़ दिया। अब दोनों आमने-सामने रह रहे हैं।
समरसता की धार सूख चुकी हैं। अधिकार के द्वार पर दम्भ और दुराग्रह पहरा दे रहे हैं। सूर्योदय के समय भी अधिकार घोर निद्रा में निमग्न है ; किन्तु कर्त्तव्य के घर जागृति का उजाला है। धूल का कहीं नाम नहीं है। सारे कार्य यथापूर्व चल रहे है। कर्त्तव्य से सब आपसी अनबन का कारण पूछते हैं, तब वह उत्तर देता है-“अधिकार सुरापान से जड़वत् हो गया है। बुद्धि विभ्रम ने उसे मेरी अवनानना सिखाई है। इसी कारण यह अनबन है। किन्तु मेरे अस्त्त्वि को भूलकर वह मिट जाएगा।”
कर्त्तव्य ने समझाया, किन्तु अधिकार की निद्रा नहीं टूटी। कर्त्तव्य विघ्न-बाधाओं के प्रस्तर, हटाकर, तब नूतन मार्ग बनाने लगा।
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विमर्श
डॉ भगवानशरण भारद्वाज
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की रचना के लिए रूप कथा या बोध कथा जैसा नाम देना पड़ेगा।
डॉ.सतीशराज पुष्करणा
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की लघुकथा ‘अनबन’ को यदि नीति कथा के रूप देखा, समझा जाए ,तो यह एक अच्छी नीति कथा है, किन्तु लघुकथा कदापि नहीं कहा जा सकता।
डॉ.स्वर्ण किरण
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की लघुकथा ‘अनबन’अधिकार और कर्त्तव्य जैसे भावात्मक पात्रों के बीच सवाद पर आधारित है और एक प्रयोग है। इसका संदेश साफ है, यह आम पाठकों को आसानी से समझ में आता है।
रामयतन यादव
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की लघुकथा ‘अनबन में अधिकार और कर्त्तव्य के बीच बढ़ती दूरी को व्यक्त किया है। भाव को चरित्र बनाकर प्रतीकात्मक शैली में कथानक को प्रस्तुत करना अद्भुत रचनात्मक प्रतिभा पर ही निर्भर करता है, किन्तु प्रतीकात्मक शैली में डॉ0 सतीशराज पुष्करणा ने ‘ड्राइंगरूम’तथा सुकेश साहनी ने ‘गोश्त की गंध लिखकर जो लोकप्रियता प्राप्त की है। वैसी लोकप्रियता और सफलता महाश्वेता चतुर्वेदी जी को नहीं मिल पाई, क्योंकि ‘ड्राइंगरूम’और ‘गोश्त की गंध’के माध्यम से अपने सूक्ष्म दृष्टिकोण का परिचय दिया है, जो सराहनीय है।
जगदीश कश्यप
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की लघुकथा ‘अनबन’ में मानसिक भावो को प्रमुख पात्र के रूप में प्रस्तुत करना लघुकथा की इतर विशेषता है। महाश्वेता जी ने इस तथ्य का अहसास कराया है। दृष्टांत परम्परा का एक और अच्छा उदाहरण ।
डॉ.शंकर पुणतांबेकर
डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी की लघुकथा ‘अनबन’अधिकार ओर कर्त्तव्य का मानवीकरण पर लिखी गई है। अच्छी लघुकथा कही जा सकती है ,यदि इसे थोड़ा और चुस्ती के साथ पेश किया जाए। कथ्य की दृष्टि से यह लघुकथा सार्वभौम विडम्बना को उजागर करती है जहाँ अधिकार कर्त्तव्य के प्रति उपेक्षाभाव रख अपने दम्भ और दुराग्रह में खोया हुआ है। व्यवस्था का सही संतुलन कर्त्तव्य-अधिकार के एक दूसरे के प्रति सहयोग भाव में है जो आज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता, साम्यवादी देशों में भी नहीं।
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