गढ़वाली अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
अपड़ी अलमारी का लॉकर पेट रखीं क्वी चीज जब घौरवळी थैं नि मिल्दी त वा लॉकर कु सैरू सामान भैर निकाळी देंदी। ये सामान म एक छुटि-सी चाँदी की डब्बि बि रैंदी। सुंदर अर कलाकारी वाळी डब्बि। यीं डब्बि थैं वा भौत सम्भाळी क रखदि। डब्बि पर वीं कु छट्टु सी जंदा बि लगयूँ छौ । मि थै य बच्चों थैं त वां पर हाथ बि नी लगाण देंदी। वा बुल्दि , “याँ का पेट म्यारू अनमोल खजानु च, जब तक ज्यूँ दि छौं कै थैं छूण बि नी देण मिन।”
एक दिन घौरवळि कतामति म अपडू लॉकर बंद कन्न भूलि गे। म्यारा मन म वीं चाँदी की डब्बी पेट रख्यूँ घौरवळी कु अनमोल खजानू देखणै की भौत इच्छा ह्वे ग्याई। मिन डब्बी भैर गाड़ी। मिन वा डब्बि हलकै कि देखि। डब्बि बिटि सिक्कों कि खकणाटै कि हळकि आवाज सुणे। मि थैं लगी, घौरवळी का डब्बि पेट ऐतिहासिक महत्त्व का सोना या चाँदी का कुछ सिक्का सँभाळिक रख्यां होला। म्येरि हौर बि इच्छा बढी गे। कन सिक्का छन? कतगा सिक्का छन? उंकी कतगा कीमत होलि? भौत प्रश्न दिमाग म में ऐ गेनि। थोड़ा खोजण पर डब्बि का जंदा की ताळी भी मिल गई।
डब्बि ख्वेली त उख बिटि एक थैली निकळि। कपड़ै की एक पुरणी थैली मिली। थैली मिन पछाणी दे। य मेरी सासू न दे छै, मेरी घौरवळी थैं। जब सासू मुन्नि छै और हम वीं तैं मिन्ना वास्ता गे छा। आँसून भ्वरी आँख्यों अर कौंपदा हाथुन वींन थैली घौरवळि थैं पकड़ै छै। वींका बोल आज बि मि थैं याद “लि बेटी! तेरी ब्वे मुं त बस ई च है देणौ खुणि।’
मिन थैली खोलिक पलटाई त घौरवळि कु अनमोल खजानु मेज माँ फ्वळै गे। मेज म जु कुछ पड़ी छौ, वाँ माँ अच्क्याला का कुल आठ इ सिक्का छा–तीन सिक्का द्वी रुप्या वाळा, तीन सिक्का एक रुप्या वाळा अर द्वी सिक्का पचास पैसा वाळा। कुल मिलैक दस रुप्या।
मि देर तक उं सिक्कौं थैं देखणू रयों । फिर मिन एक-एक करिक सब्बि सिक्कों थैं बड़ा ध्यान से थैली म वापस धैरि देन, जां से कि कै पर भी हळकी-सी बि रगड़ नि लगी जाउ।
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