अनाथाश्रम के मैनेजर ने बच्चों को नंगी ज़मीन पर लाइनों में बिठा दिया था। मैं और मेरी पत्नी बच्चों को समोसे बाँट रहे थे। समोसे बांटते हुए मैंने देखा कि एक बच्ची जिसकी उम्र दस – ग्यारह वर्ष की होगी, उदास सी हाथ में समोसा लिए बैठी थी।
“क्या बात है बेटा, आप को समोसे अच्छे नहीं लगते?”
“अच्छे लगते हैं अंकल। ”
“लेकिन तुम खा क्यों नहीं रही?” मैंने टटोला। बच्ची कुछ देर के लिए चुप हो गई, जैसे सोच रही हो कि कहे या ना कहे। मुझे उसकी आँखें गीली- सी लगीं ।
“बोलो बेटा, चुप क्यों हो गई, कुछ कहना चाहती हो?”
“अंकल हम जानते हैं हम अनाथ हैं; इसलिए आप हमारे लिए खाने पीने का सामान लाते हो। इसके लिए धन्यवाद, लेकिन… ”
बच्ची थोड़ी देर के लिए चुप हो गई। मैंने फिर उसका हौंसला बढ़ाने के लिए कहा, “बोलो बेटा, डरो नहीं।”
“अंकल कोई भी हमसे नहीं पूछता कि यहाँ हम खुश हैं या नहीं, हमें कोई परेशानी तो नहीं है, हमारी पढ़ाई कैसे चल रही है, हमें खाना ठीक से मिलता है या नहीं। हमारे पास कपड़े और दूसरे जरूरी सामान हैं या नहीं। हमें आपका प्यार, आपकी फिक्र चाहिए। जैसा आप अपने बच्चों से करते हैं। आप खाने का सामान बेशक मत लाइए, सिर्फ हमसे मिलने आते रहिए। हमें भी लगे कि हमारा भी कोई अपना है जिसको हमारी फिक्र है।” कहकर बच्ची सिसक पड़ी।
पत्नी ने झट से उसे गले लगा लिया।