
आसमान से बरसती चिलचिलाती धूप, पैरों तले जलती धरती, गुम हवा, गर्मी और प्यास से व्याकुल पसीने से तर-ब-तर पथिक ढूँढ रहा था जरा सी शीतल छाँह। लंबी सूखी सड़क अलसाये अजगर-सी बिछी पड़ी थी। पेड़ों का दूर-दूर तक नामो- निशान तक न था। न कोई मानुस और न चिरई की पूँछ। पथिक अपने लोटे में बचे जरा से पानी को कुछ देर और बचाए रखना चाहता था। न मालूम अभी कितनी दूर और यूँ ही तपते हुए चलना होगा।
दूर हरा-भरा एक साया-सा नजर आया तो मन में आशा जागी।
पथिक पास पहुँचा, देखा कि सूखे ठूंठ पर वह हरियाला साया-सा मंडरा रहा है। ऊपर देखा तो कुछ नहीं। फिर ये साया कैसा? किसी अनजानी आशंका से उसकी रीढ़ की हड्डी में ऊपर से नीचे तलक एक ठंडी लहर दौड़ गई। किसी तरह साहस जुटा कर काँपती आवाज में उसने धीरे से पूछा –
“कौन हो भाई?’’
सिसकियों भरी मंद आवाज उस तपते सन्नाटे को चीरने लगी।
“मुझे बचा लो…मुझे बचा लो। कबसे इंतजार कर रहा हूँ।”
पथिक घबराकर इधर उधर देखने लगा; पर कोई नजर न आया।
“बचा लो, दया करो। मैं मर रहा हूँ।“
“तुम कौन हो? नजर क्यों नहीं आ रहे? तुम हो कहाँ?” भयभीत पथिक बोला।
“मुझे बताया गया था कि उसके आने पर सबके भाग्य बादल जाएँगे। सब के साथ मैं भी झूम उठा। खुशी के गीत गाए। पर… जब वह आया तो एक-एक कर मेरे साथियों को उसकी राह का रोड़ा बता कर काट डाला गया, तरक्की के कुठार से। असहाय बन सिसक रहा हूँ, तिल तिल मर रहा हूँ। कल मेरी बारी है। कोई नहीं आया बचाने।
“बड़े स्वार्थी मालूम होते हो जी तुम। राह के रोड़े को कोई मूर्ख ही बचाता होगा। पथिक तनिक हँसा।
“अरे नादान! मैं बचाना चाहता हूँ खुद को ताकि ज़िंदा रखा जा सके उसे, जो तिल तिल कर मर रहा है…”
“मर रहा है? कौन? किसे बचाना चाहते हो तुम!”
“उस साये को जो इंसान को इंसान बनाए रखता है। मैं इंसान के इंतजार में हूँ जो मुझे बचा सके।”
“बड़े मूर्ख किस्म के मालूम होते हो जी तुम! जिसने तुमको नुकसान पहुँचाया उसी को ज़िंदा रखना चाहते हो? क्यों भला?”
“अपना तो धर्म ही है परोपकार करना, औरों के काम आना। अपना धर्म भला मैं कैसे छोड़ दूँ?”
तभी एक कार फर्राटे से धूल उड़ाती हुई बगल से गुज़र गई। कार की खिड़की से एक हाथ बाहर निकला और पानी की कुछ खाली प्लास्टिक की बोतलों को बाहर फेंक दिया। गाड़ी को आँखों से ओझल होते हुए देखता वह पथिक तनिक देर तक खड़ा हुआ सोचता रहा। कुछ देर बाद उसने उन सभी खाली बोतलों को उठाया, अपने थैले में भरा और लोटे में थोड़ा सा बचा हुआ पानी ठूँठ की जड़ में उड़ेल कर शीतलता अनुभव करता हुआ आगे बढ़ गया।
-0-©पूनम चंद्रलेखा, मेरठ
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