जून 2026

देशअप मार्केट     Posted: September 1, 2019

               शाम होने को थी। एक अखबार के दफ्तर में ‘नये जमाने’ के सम्पादक अपने सहकर्मियों के साथ अगली सुबह के अखबार के बारे में प्लान कर रहे थे।

          सम्पादक ने पूछा, ‘‘देश-विदेश का तो होगा क्या, सिटी की क्या खबरें हैं प्यारो?’’

          एक सहकर्मी, ‘‘आज तो नगर निगम के खिलाफ प्रदर्शन के सिवाय और कोई बड़ी खबर नहीं है भाई साब, क्राइम भी निल है।’’

          सम्पादक, ‘‘कुछ नहीं है तो फिर अखबार कैसे बिकेगा? ये नाली,खडंजा, सफाई के लिए प्रदर्शन के समाचार कब तक लीड बनाओगे। मैंने तुम लोगों से कल वेश्याओं पर एक बढ़िया स्टोरी के लिए कहा था, वह भी तैयार नहीं हुई। काल गर्ल्स वाला मामला भी रुका पड़ा है। कैसे नाकारा लोगों के बीच आ गया हूँ मैं।’’ सभी सहकर्मी चुप। सम्पादक ने गुस्से से मेज पर हाथ मारा कि तभी एक और पत्रकार तेजी से कमरे में आया।

          पत्रकार,‘‘सर, अभी-अभी सेन्ट्रल मार्केट में रेप की खबर है। रेप तो कल रात हुआ था, पर पता अभी चला है।’’

          सम्पादक,‘‘फिर रेप, वैरी गुड, आज का खेल हो गया। लेकिन ये बताओ महिला किस वर्ग की है। कोई मजदूरनी-वजदूरनी है या फिर ठीकठाक केस है। पिछली बार तुम लोगों ने एक डाउन मार्केट रेप पहले पेज पर डलवा दिया था। ऐसा इस बार नहीं होना चाहिए।’’

          पत्रकार, ‘‘नहीं सर, ऐसा नहीं है। पीड़िता कालेज की छात्रा है। खूब हंगामा हो रहा है।’’

          सम्पादक, ‘‘क्या…अच्छा…मजा आ गया। यही सिटी का लीड समाचार रहेगा। प्वाइंट नोट करो, हार्ड न्यूज के अलावा मुझे इस-इस एंगल पर खबरें चाहिए।’’

          कुछ सहकर्मी नोटबुक लेकर तैयार हो गए।

          सम्पादक, ‘‘एक तो बैकग्राउंडर निकलवा लो, जिसमें यह दिखाओ कि इस साल अब तक शहर में ऐसी कितनी घटनाएँ हुई हैं। फिर उसी के आधार पर खबर का हैडिंग देंगे, जैसे शहर में हर 73 घंटे में एक महिला बलात्कार की शिकार। (दूसरे सहकर्मी की तरफ इशारा करके) तुम पीड़ित छात्रा से बात करो। इसके अलावा कुछ नामी मनोविश्लेषकों से बात करो, वे इस तरह की बढ़ती घटनाओं के बारे में क्या कहते या कहती हैं। (तीसरे सहकर्मी) पुलिस की कार्रवाई पर एक खबर दो, एक खबर अलग से पूरे घटनाक्रम पर दो। पूरा एक पेज ही रेप के नाम कर देते हैं। मुझे नहीं लगता कि हमारे सामने वाला अखबार इतना कुछ सोच पाएगा। जाओ, जुट जाओ प्यारो।’’ सभी सहकर्मी उठने लगे। ‘सिटी डेस्क इंचार्ज अखिलेश पांडे को मेरे पास भेजो।’ सम्पादक ने एक सहकर्मी को रोककर कहा।

          ‘‘जी भाई साहब!’’ अगले ही क्षण पांडे हाजिर थे।

          ‘‘पांडे जी काम में मन नहीं लग रहा क्या। कुछ सीखेंगे या नहीं। मैंने कितनी बार  कहा है कि अखबार में डाउन मार्केट फोटो नहीं जाएगी, फिर भी आपने आज के सिटी एडीशन में दो-दो गलतियाँ कर डालीं। एक आपने आग तापते रिक्शाचालकों की फोटो छापी और फिर अगले ही पेज पर चारे का गट्ठर ले जाती महिला की। आप अखबार का कीमती स्पेस क्यों बरबाद कर रहे हैं?’’

          ‘‘वो भाई साहब, ठंड बढ़ गई है ना तो गरीबों के लिए अलाव की समस्या के साथ आग तापने की फोटो लगाई थी। उधर गाँवों मंे चारे की समस्या है तो दूसरी फोटो…..’’ पांडे जी का जवाब बीच में ही कट गया।’’

          ‘‘भाड़ में जाएँ ये समस्याएँ। देखो पांडे मेरे सामने गरीब-गरीब करोगे तो फिर गरीब ही रहना। अगले साल वेतन बढ़ाने की बात मत करना। आप लोग कुछ सीखेंगे या नहीं। आगे से अखबार में इस तरह के फोटो छापो तो फिर शाम को इस्तीफा भी लिखकर साथ में लाना।’’

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