
लघुकथा आज के समय की सबसे लोकप्रिय विधा है। लघुकथा समाज में फैली विसंगतियों, संवेदनाओं से पाठकों को रूबरू करवाती है। आज पाठक लघुकथा केवल इसलिए नहीं पढ़ते हैं कि वह आकार में छोटी होती है, वरन इसलिए भी पढ़ते हैं कि उनकी सुप्त चेतना को एकदम जाग्रत कर देती है। मेरा मानना है कि एक सार्थक लघुकथा वह होती है, जो अनुभव, संवेदना के साथ रची जाती है, और पाठकों के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख देती है। इसके द्वारा कम शब्दों में बड़ा संदेश दिया जाता है।
मैं अपनीपसंद की दो लघुकथाओं के बारे में यहाँ जिक्र करना चाहता हूँ।
पहली लघुकथा है- स्मृति शेष रवि प्रभाकर जी की ‘दंश’। आज बच्चियाँ न घर में सुरक्षित है और ना ही बाहर। समाज में रिश्तों को तार-तार करने वाली घटनाएँ हो रही हैं। इसीलिए लोग अपनी बच्ची को किसी पुरुष रिश्तेदार के पास अकेला छोड़ने से भी डरते हैं। इन्हीं भावों को प्रकट करती ये लघुकथा कम शब्दों में बहुत कुछ कहती है और समाज के नैतिक पतन पर करारा व्यंग करती है।
दूसरी लघुकथा है- सन्तोष सुपेकर जी की ‘105 नम्बर’। यह लघुकथा एक हृदय स्पर्शी रचना है। इसमें सब्जी बेचने वाला 105 नम्बर मकान वाले बुजुर्ग ग्राहक से इसलिए चिढ़ता है, क्योंकि वह उससे जबरदस्ती दो-पाँच रुपये का धनिया मुफ्त में ले लेता है। लेकिन जब वह बुजुर्ग सब्जी वाले को झमाझम बारिश में भीगता हुआ देखता है, तो उसे चिन्ता होती है। फिर वह सब्जी वाले को एक नया रेनकैप और रेनकोट देता है और कहता है- “ये लो मेरी तरफ से, बोनस में।” यह देख सब्जी वाले की उस बुजुर्ग के प्रति सोच बदल जाती है और उसे पहली बार वह बुजुर्ग और उसका मकान नम्बर 105 अच्छा लगने लगता है। इस लघुकथा में एक अभिनव प्रयोग किया गया है। क्योंकि इसमें एक सब्जी वाले को प्रथम पुरुष में रखा गया है, कभी किसी मजदूर को नहीं रखा जाता। हमेशा किसी बाबू, अधिकारी या अन्य को रखा जाता है। मैंने भी कुछ लघुकथा में इसी तरह का अभिनव प्रयोग किया है।
1-दंश/ रवि प्रभाकर
“बहन! आज मुझे काम से लौटने में देर हो जाएगी, तब तक तुम मुन्नी को अपने पास ही रखना।” उस विधवा ने हाथ जोड़ते हुए अपनी पड़ोसन से आग्रह किया।
“पर अब तो तेरा देवर भी गाँव से आया हुआ है, तो फिर…।”
“इसीलिए तो तुम्हारे पास छोड़ रही हूँ।”
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2-105 नम्बर/ सन्तोष सुपेकर
‘105!’ इस कॉलोनी में सब्जी बेचते हुए एक मकान के बाहर लगा, ये बड़ा सा लाल रंग से लिखा हुआ नम्बर देखते ही मुझे चिढ़ सी होने लगती है। झमाझम बारिश में ठेला धकाते और गीला मुँह पोंछते हुए मैंने सोचा, ‘इस नम्बर से ही नफरत हो गई है मुझे। रोज जैसे ही मैं यहाँ से गुजरता हूँ, इस 105 नम्बर बंगले से एक बुड्डा बाहर निकलता है और सब्जी लेने के बाद दो-पाँच रुपये का धनिया जबरदस्ती मुझसे ले जाता है, फ्री में! और बोलता है, बोनस में! हुंह शरम नहीं आती इन अमीरों को। हम गरीबों से क्या कोई बोनस लेता है?… धनिया कौनसा सस्ता आता है? पर क्या करूँ? सब्जी बेचना है तो..’ मैंने फिर कह मुँह बिचकाया।
‘आज क्या बात है?’ मकान की ओर देखते हुए मैं बुदबुदाया, ‘मेरी चिल्लाहट सुनकर भी बाहर नहीं आया बुड्डा? बारिश के कारण अंदर पड़ा होगा, चलो अच्छा है, आज तो बला टली…’ लेकिन नहीं, बला टली नहीं थी, उसी समय 105 नम्बर का कम्पाउण्ड गेट खुला और वही बुड्डा छतरी हाथ में लिये बाहर निकला पर यह क्या? उसके दूसरे हाथ में आज प्लास्टिक की एक थैली थी, जिसमें कोई नीले रंग की चीज़ थी।
‘नहीं-नहीं, आज सब्जी नहीं लेनी। मैं रोज़ देखता हूँ तुम बरसात में गीले होते हुए सब्ज़ी बेचते रहते हो। महामारी का टाइम है भैया। भीगने से कहीं तुम्हें बुखार हो गया तो सब कोरोना ही समझेंगे, सो तुम्हारे लिए ये… ये रेनकैप और रेनकोट खरीद लाया हूँ, बिल्कुल नया ! अब इसे पहनकर सब्जी बेचना। ये लो, मेरी तरफ से…. बोनस में!’ और कहकर वो बु…, नहीं- नहीं, वे बाबूजी, ठहाका मारकर हँस पड़े।
बरसती बूँदों के बीच मुझ पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया और अपनी सोच पर शर्माते हुए, कृतज्ञ नज़रों से उन्हें देखते हुए, मैं भी मुस्कुरा उठा।
पहली बार मुझे वे अच्छे लगे, और उनके मकान पर लगा, वह 105 नम्बर भी।
रचनाकाल-2021
-0– राम मूरत ‘राही’, 168-बी, सूर्यदेव नगर, इन्दौर – 452009 (म.प्र.)
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