जून 2026

दस्तावेज़असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ     Posted: December 1, 2019

असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ( लघुकथा-संग्रह), मूल्य: 200 रुपये,द्वितीय संस्करण: 2013, प्रकाशक: अयन प्रकाशन 1 / 20, महरौली, नई दिल्ली-110030

हिंदी-लघुकथा सन्  1874 में हसन मुंशी अली की लघुकथाओं से विकास करना शुरू करती है, उसके पश्चात भारतेंदु हरिश्चन्द्र, जयशंकर ‘प्रसाद’, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, अवधनारायण मुद्गल , सतीश दुबे से होते हुए आज सन् 2019 में नयी पीढ़ी तक आ पहुँची है। हसन मुंशी अली से लेकर नयी पीढ़ी तक आते-आते लघुकथा के रूप-स्वरूप और भाषा-शैली में अनेक प्रकार की भिन्नता दिखाई  पड़ती है, इन भिन्नताओं को लघुकथा-विकास के सोपानों  के रूप में देखा जा सकता है। इसके मथ्य नवें दशक जिसे लघुकथा का स्वर्णकाल भी कहा जा सकता है।  इस काल में जो कुछ लेखक अपनी विशिष्ट लघुकथाएँ लेकर सामने आये उनमें रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ का भी एक उल्लेखनीय हस्ताक्षर है। इन्होंने अपने समकालीनों की तुलना में बहुत अधिक लघुकथाएँ तो नहीं लिखी ;किन्तु जो लिखी  वे लघुकथाएँ उनके अब तक के एकमात्र लघुकथा संग्रह ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ में संगृहीत हैं। इन लघुकथाओं को पढ़ते समय इस बात का सहज ही एहसास होता है कि इन्होंने मात्र लघुकथाएँ लिखने के लिए लघुकथाएँ नहीं लिखीं, जब कभी इन्होंने अपने समाज में घटित होती समस्याओं और विडम्बनाओं को देखा और प्रतिक्रया  स्वरूप जब लघुकथा क रूप लेकर इन्हें बेचैन किया, तब इन्होंने  उन लघुकथाओं को लिपिबद्ध कर दिया। ऐसी स्थिति  में यह स्वाभाविक ही था कि ये लघुकथाएँ संवेदनशील होती । संवेदना किसी भी श्रेष्ठ लघुकथा का पहला गुण हैं।यूँ तो इस संग्रह में प्रकाशित प्रत्येक लघुकथा भिन्न-भिन्न कारणों से अपना महत्त्व रखती है किन्तु उनमें भी ‘ऊँचाई’, ‘ चक्रव्यूह’, ‘क्रौंच-वध’, ‘अश्लीलता’, ‘प्रवेश-निषेध’, ‘पिघलती हुई बर्फ’, ‘राजनीति’,’स्क्रीन-टेस्ट’, ‘कटे हुए पंख’, ‘असभ्य नगर’, ‘नवजन्मा’ इत्यादि लघुकथाओं ने न सिर्फ संवेदित किया अपितु मेरे मन-मष्तिष्क को झिंझोड़ कर भी रख दिया। इस कारण मैं इनके चिंतन-मनन को विवश हो गयी।

सर्वप्रथम मैं ‘ऊँचाई’ लघुकथा की चर्चा करना चाहूँगी। यह लघुकथा हिमांशु जी की न मात्र प्रतिनिधि लघुकथा है अपितु यह उनके विशिष्ट लघुकथाकार के रूप में पहचान भी है। मुझे विश्वास है कि कभी-न-कभी यह लघुकथा प्रत्येक लघुकथाकार की नज़र से गुज़री होगी और असंख्य पाठकों ने इसे पढ़ा भी होगा। इस लघुकथा मे नायक अपने पिता के आगमन पर यह सोचता है कि उसके पिता आर्थिक सहयोग के दृष्टिकोण से उसके पास आये हैं किन्तु भोजन करने के बाद उसके पिता जाते समय अपने पुत्र को बुला कर कहते हैं, “खेती के काम से घड़ी भर की फुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का  ज़ोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा।  तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं  मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।” जो बेटा अपने पिता के आगमन से ही विचलित हो जाता है, उसके पिता ने उलट अपने बेटे के लिए चिंता जताई है। और इसी लघुकथा में नायक के पिता को ऊँचाई दी है, कि उनका बेटा शहर तो आ गया, पर उसकी सोच संकीर्ण हो गयी और वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसने अपने पिता का स्वागत मन मार कर किया, ऐसे में भी पिता ने अपनी जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर नायक की तरफ बढ़ा दिए और कहा, “रख लो! तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फसल अच्छी हो गयी है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमजोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहु का भी ध्यान रखो।” बेटा परेशान है इसका एहसास पिता को है, वहीं वह यह भी जानते हैं कि पैसा देने पर उनके बेटे को उसके माता-पिता की चिंता भी होगी, इसकी वजह से वह उसको चिंतामुक्त भी कर देते हैं और अपने को सहज भी कर ले इसका अवसर भी दे देते हैं। इन  अन्तिम वाक्यों  ने इस लघुकथा को उत्कृष्ट बना दिया है। और पिता और पुत्र के बीच के रिश्ते  के अपनत्व का भी उत्कृष्ट तरीके से चित्रण करने का सद्प्रयास किया है। इस लघुकथा का कथानक न सिर्फ श्रेष्ठ है अपितु इसके शीर्षक ने भी इस लघुकथा को उत्कृष्ट बनाया है। गाँव से पलायन कर शहर में रहने से कोई अमीर नहीं हो जाता समस्याएँ यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ती, पर इंसान किस तरह स्वार्थी हो जाता है और विवश हो जाता है कि उसको अपने माता-पिता भी बोझ  लगने लगते हैं वह यह भी भूल जाते हैं कि किस तरह से उन्होंने भी परेशानियों का सामना किया होगा और वह भी निस्वार्थ भाव से। इस लघुकथा में पिता का यह कहना कि “इस बार फसल अच्छी हुई है…” से हिमांशु एक सन्देश भी देना चाहते हैं कि ‘समस्याओं से भागना कोई हल नहीं हैं ; अपितु उनका सामना करना ही हितकारी होता है’ और माता-पिता से बढ़कर इस दुनिया में कोई भी नहीं होता जो नि:स्वार्थ भावना रखता है। इसको पढ़ने के पश्चात् क्या ऐसा सबके साथ नही होता जो मेरे साथ हुआ है।

इसी प्रकार अन्य ऊपर उल्लिखित लघुकथाओं में भी देखा जा सकता है। ‘चक्रव्यूह’ में नायक  मध्यमवर्गीय परिवार से है जो अपनी  जिजीविषा के लिए दिन-रात मेहनत तो करता है, पर महंगाई की मार उसकी कमर तोड़ देती है और वह खुद को चक्रव्यूह में फँसा हुआ अनुभव करता है, इस लघुकथा की अंतिम पंक्तियाँ  देखी जा सकती हैं  ‘ एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है;जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थि-पंजर-सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टाँगों से गिरता-पड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।” इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने मध्यमवर्गीय परिवार की परेशानियों को उभारने का सद्प्रयास किया है जिसमें वह सफल भी रहे हैं।

 ‘अश्लीलता’ इंसान की विकृत सोच को दर्शाती इस लघुकथा का अंत नकारत्मकता  लिए है ;परन्तु इसके बावजूद इस लघुकथा में इंसान की दोहरी सोच और उसके मनोविज्ञान को भली-भाँति समझा जा सकता है। इस लघुकथा की प्रथम पंक्ति को देखें: ‘रामलाल कि अगुआई में नग्न मूर्ति को तोड़ने के लिए जुड़ आई भीड़ पुलिस ने किसी तरह खदेड़ दी थी….।” और इसी लघुकथा की अन्तिम पंक्तियों को भी देखें: “वह मूर्ति के पास आ चुका था। देवमणि के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। रामलाल मूर्ति से पूरी तरह गूँथ चुका था और उसके हाथ मूर्ति के सुडौल अँगों पर के केचुए  की तरह रेंगने लगे थे।”

‘प्रवेश-निषेध’  लगभग  40 साल पहले लिखी यह लघुकथा वर्तमान की राजनीति पर करारा कटाक्ष करती है। लघु आकार की होने के बावजूद इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने इस रचना में क्षिप्रता देकर उत्कृष्ट बनाने का सफलतम  सत्प्रयास किया है। इसका अंतिम वाक्य देखा जा सकता है, जब राजनीति एक वेश्या की चौखट पर आती है और दलाल उससे उसका परिचय पूछता है, दरवाज़े ओट में खड़ी वह कहती है, “ यहाँ तुम्हारी जरूरत नहीं है। हमें अपना धंधा चौपट नहीं कराना। तुमसे अगर किसी को छूत की बीमारी लग गई तो मरने से भी उसका इलाज नहीं होगा।” और वह दरवाज़ा बंद कर देती है।

‘पिघलती हुई बर्फ’ पति-पत्नी का रिश्ता अनोखा होता है, प्रकृति ने मनुष्यों को जहाँ अलग-अलग चेहरे दिए हैं वैसे ही उनके  स्वाभाव में भी भिन्नता होती है, इसके बावजूद मनुष्य को एक सामाजिक  प्राणी का दर्जा प्राप्त है। पति-पत्नी भी अपवाद नहीं हैं, छोटी-मोटी बहस के बावजूद एक दूसरे के समर्पण भाव सहज देखने को मिल जाते  है। लेखक ने इस लघुकथा के माध्यम से इस रिश्ते की नींव को मज़बूत बनाने का सार्थक प्रयास किया है जिसमें वह पूर्णतः सफल रहे हैं।

‘राजनीति’ यह लघुकथा राजनीति की पृष्ठभूमि पर लिखी एक अच्छी लघुकथा है, इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने राजनीति में पनप रही कूटनीति और बढ़ते हुए अपराध को बड़े ही करीने से उजागर किया है।

‘स्क्रीन-टेस्ट’ फ़िल्मी दुनिया हमेशा आकर्षण का केंद्र रही है, नाम और शोहरत पाने की लालसा में और जल्द-से-जल्द अमीर बनाने की चाहत में युवा- वर्ग इस ओर आकर्षित हो जाती है, परन्तु इस चकाचौंध के पीछे के दलदल में फँस कर रह जाती है, जहाँ से वापिस आना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन- सा हो जाता है। इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने एक सकारात्मक   सन्देश भी दिया है-‘सफलता पाने के लिए कोई शॉर्टकट रास्ता  नहीं होता’।

‘कटे हुए पंख’  आपात्काल में  लिखी गई अर्ध ‘मानवेतर’ शैली की लघुकथा  है । यह राजनीति और सामंतशाही की प्रवृत्ति को चित्रित करती है । किस तरह से ऊँचे  व्यक्ति पैसे और सत्ता के दम पर अपने से नीचे के लोगों को कुचलकर अपना साम्राज्य  स्थापित करना चाहते हैं । वे किसीकी भी परवाह किये बिना अपने स्वार्थ को सिद्ध करते है। इस लघुकथा के अंत से इस बात की पुष्टि होती है : ‘परन्तु तोता उड़ न सका। धीरे-धीरे-से  पिंजरे के पास बैठ गया था; क्योंकि उसके पंख मुक्त होने से पहले ही काट दिए गए थे।

‘असभ्य नगर’ आज के भौतिक और भूमंडलीकारण के चलते पशु-पक्षियों के जीवन को भी खतरा हो गया है। परन्तु यह भी सच है कि इस आपा-धापी में हम अपना सुख-चैन भी खो चुके हैं, एक तरफ जहाँ हम जंगलों को काटते जा रहे हैं और बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी इमारतें  बनाते जा रहे हैं, हमारे भीतर की संवेदना खत्म  होती जा रही है। हिमांशु जी ने इस मानवेतर लघुकथा के माध्यम से एक सार्थक सन्देश देने का सत्प्रयास किया है। इस लघुकथा की अन्तिम पंक्ति में पूरी लघुकथा का सार मिल जाता है, ‘उल्लू ने कबूतर को पुचकारा- “मेरे भाई, जंगल हमेशा नगरों से अधिक सभ्य रहे हैं। तभी तो ऋषि-मुनि यहाँ आकर तपस्या करते थे।” इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने पर्यावरण के नष्ट होने पर अपनी चिंता जताई है और जिससे यह सिद्ध होता है, कि हिमांशु जी न सिर्फ सामाजिक परन्तु वह प्रकृति-प्रेमी भी दिखाई पड़ते हैं ।

‘नवजन्मा’ लड़की बचाओ पर आधारित एक उत्कृष्ट लघुकथा है, जिलेसिंह जिसके घर में एक पुत्री-रत्न की प्राप्ति हुई है, उसके घर वाले निराश होकर उसको शिकायत करते है और लड़की होने के नुकसान  गिनवाते हैं, वो कहते हैं  औरत ही औरत की दुश्मन होती है, इस लघुकथा में इसका चित्रण बहुत ही करीने से हुआ है, जिलेसिंह की दादी और बहन दोनों ही लड़की पैदा होने का शोक मनाते हैं, वहीँ दूसरी ओर जिलेसिंह पहले तो तनाव में आ जाता है ;परन्तु अपनी पत्नी और पुत्री का चेहरा देखकर उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है और वह बाहर से ढोलियों को लेकर आता है और नाचने लगता है तथा ढोलिए को खूब तेज़ ढोल बजाने के लिए प्रेरित करता है। इस लघुकथा के माध्यम से हिमांशु जी ने लड़का और लड़की के भेद को मिटाने का सकारात्मक सन्देश दिया है।

इन लघुकथाओं के अतिरिक्त अन्य सभी लघुकथाएँ आलोचना की दृष्टि से मत-भिन्नता का शिकार हो सकती हैं, किन्तु पाठकीय दृष्टि से उनपर प्रश्नचिह्न लगाना कठिन है। यों भी आजतक कोई कृति ऐसी प्रकाश में नहीं आई है, जो एक मत से  निर्दोष सिद्ध हुई हो। तो इस कृति से ही हम ऐसी आशा क्यों करें कि यह निर्दोष है। इसकी विशेषताओं में  विषय की विविधता  और भाषा- शैली है ।

लघुकथा संग्रहों में ऐसे संग्रह नगण्य ही हैं जिनके  दूसरा  संस्करण भी प्रकाशित हुए हों। इस संग्रह का दूसरा संस्करण प्रकाश में आया है, जो इस बात का द्योतक  है कि इस संग्रह को  पाठकों ने भरपूर स्नेह दिया है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अन्य अनेक चर्चित संग्रहों की तरह से नयी पीढ़ी के लिए यह भी  एक आदर्श संग्रह साबित होगा।

       -0-कल्पना भट्ट ,श्री द्वारकाधीश मंदिर ,चौक बाज़ार ,भोपाल 462001 (मो 9424473377)

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