जून 2026

संचयनआइटम     Posted: July 1, 2015

आइटम
””सारी उम्र बीत गई रे छोरी नु ही साड़ी पहनते हुए। इब इस उम्र में क्या सूट पहरूँगी। यह सुत्थन वाले सूट ब्याह के बाद कोणी पहरे जावे म्हारी बिरादरी में। ब्याह के बाद छोरी की चाहे जित्ती भी उम्र हॉवे उसे साड़ी ही पहननी हॉवे और सर पर पल्लू उतरने न पावे। इब तो तू चाहवे के मैं सलवार सूट पहर लू। ना मेरे से कोनि हॉवे येह। जा मैं कमरे से बाहर ही ना निकलूँगी जिब तेरी सहेलियाँ आवेगी।” कहते-कहते मिथलेश ने अपनी साड़ी को और कसकर लपेट लिया, और अपने मन-ही-मन कुढ़ती रही,””यह आजकल की बहुएँ, हमने इनको नहीं टोका कि यह न पहनो वह न पहनो और यह शहर आकर बेशरम-सी घूमती रहती हैं बिना पल्लू के। कही बाँह नंगी तो कही टाँग। अरे! तुमको कह दिया कि जो मर्जी करो तो अब
हम पर ही जबरदस्ती करोगी कि अम्मा सीधे पल्ले की साड़ी न पहनो। अम्मा सर पर पल्लू न रखा करो हमारे दोस्तों के सामने। अब यह सलवार सूट की जिद, मुझे अब नहीं रहना इसके घर। एक तो पहले ही महरी और मिसराइन का काम सौंप रखा है उस पर अब नई जिद।” पानी पीने रसोई की तरफ
बढ़ी तो बहू की सहेलियों की हँसी सुनाई दी- ””यार क्या आइटम है तेरी सास, कसम से!”
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