डॉ.उपमा शर्मा
‘नन्हीं रुचिका का अभिनय बहुत दमदार रहा। फिल्म में बड़े-बड़े कलाकारों के रहते भी उसने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। दर्शकों का मन मोह लिया। उसके नाम की बड़ी चर्चा है। आपको कैसा लग रहा है?’ एक टी.वी चैनल का संवाददाता रुचिका की माँ से पूछ रहा था।
‘बेटी की कामयाबी से जो खुशी मिली, उसे बयान करना कठिन है। माता-पिता जब बेटा-बेटी के नाम से पहचाने जाते हैं ,तो उन्हें बहुत गर्व होता है।’ शैली ने खुश होते हुए जवाब दिया।
‘अभी रुचिका बहुत छोटी है। वह अपना ध्यान पढ़ाई में लगाएगी या फिर अभिनय जारी रखेगी?’
‘पढ़ाई भी करेगी, लेकिन अगर कहीं अच्छी फ़िल्म में रोल मिला ,तो जरूर करेगी।’
‘शैली जी, क्या मैं रुचिका से बात कर सकता हूँ?’
‘हाँ, क्यों नहीं…रुचिका बेटे, जरा इधर आना।’
दूसरे कमरे से रुचिका आई तो संवाददाता बोला, ‘रुचिका बेटे, कैसी हो?’
‘ठीक हूँ अंकल।’
‘अच्छा यह बताओ, आपको क्या-क्या अच्छा लगता है?’
‘मुझे…रिया, दिया के साथ खेलना, पार्क में जाना और साइकिल चलाना…और खूब सारा पिज्जा खाना बहुत अच्छा लगता है।’
‘और आप बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?’ संवाददाता ने मुस्कराते हुए पूछा।
‘मैं तो टीचर बनूँगी, टीचर न सबको डाँट सकती है…’ बोलते हुए उसकी नज़र अपनी माँ की ओर गई तो वह सकपका गई, ‘…नहीं अंकल…मैं तो न…बड़ी कलाकार बनूँगी, दीपिका जैसी।’ घबराते हुए रुचिका अटक-अटक कर बोली।
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