जून 2026

दस्तावेज़आयोजन – लघुकथा विमर्श का दस्तावेजीकरण     Posted: August 1, 2021

आयोजन: ,संपादक द्वय: सुकेश साहनी,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य:- 220/-पृष्ठ: 108, संस्करण:2021, प्रकाशक:- अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली-नई दिल्ली 110030

            आज से लगभग  बत्तीस वर्ष पूर्व लघुकथा की दशा, दिशा और सम्भावनाओं के तारतम्य में उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक भूमि बरेली में लघुकथा-विमर्श के बहाने लघुकथाकार सुकेश साहनी और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ के सौजन्य से एक गोष्ठी आयोजित की गई। लघुकथा- जगत में यही गोष्ठी ‘बरेली गोष्ठी’ के नाम से प्रख्यात सिद्ध हुई। इस ‘बरेली गोष्ठी’ के आयोजन में तत्कालीन समय में देश के विभिन्न भू-भागों के प्रख्यात लघुकथाकार तथा लघुकथा के सिलसिले में बृहत विमर्श को निष्कर्ष प्रदान करने के अर्थ में लघुकथा के निष्णातों को आमन्त्रित किया जाकर सभी को ‘लघुकथा सम्मेलन’ के रूप में खुला मंच दिया गया था। यही ‘लघुकथा सम्मेलन’ अन्ततः ‘बरेली गोष्ठी’ का पर्याय बनकर देशभर में चर्चित हुआ है।

            ग्यारह एवं बारह फरवरी उन्नीस सौ नवासी को बरेली में सम्पन्न हो चुके ‘लघुकथा-विमर्श’ को तीन सत्रों में विभाजित किया गया था। जिसका परिणाम यह आया कि यह सम्मेलन ताबड़तोड़ रूप से निपटाया न जाकर गम्भीरतापूर्वक सम्पन्न हुआ। अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित प्रस्तुत लघुकथा सम्मेलन में जो भी लघुकथा-पाठ हुए तथा लघुकथा के विभिन्न मनीषियों ने बजरिए विमर्श लघुकथा पर जो भी महत्वपूर्ण विचार रखे, उनकी आयोजकों द्वारा ‘रिकार्डिंग’ की गई तत्पश्चात् ‘रिकार्डिंग’ सामग्री का मैन्युअल (एक छोटी किताब) आयोजन’ शीर्षक से त्वरित रूप में आयोजन-वर्ष 1989 में प्रकाशित हुई और अब सन् 2021 में इस सम्मेलन की प्रसिद्धि को सामने रखते हुए इसका द्वितीय संस्करण ‘आयोजन’ के नाम से ही प्रकाशित होकर सामने आया है। निस्सन्देह बरेली गोष्ठी को पुस्तक के आकार में समायोजित करने हेतु इसके सम्पादनकर्मी लघुकथाकार  द्वय सुकेश साहनी एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ बधाई के पात्र हैं।

            किसी भी सम्मेलन के आयोजन की महत्ता इस बात पर केन्द्रित रहती हे कि सम्मेलन में जो भी पढ़ा गया हो, उस पर विमर्श होना न केवल सम्मेलन के आयोजन की अवधारणा से जुड़ी हुई बात होती है प्रत्युत विमर्श के माध्यम से जो विधा के सम्बन्ध में उपयोगी निष्कर्ष छनकर आते हैं उन बातों से विधा के आयाम तो खुलते ही हैं साथ ही विधा-विषयक विकास के बहुतेरे सोपान भी परिलक्षित होने लगते हैं।

            बरेली गोष्ठी में निर्धारित तीन सत्रों में प्रथम एंव द्वितीय सत्र में विभिन्न लघुकथाकारों द्वारा लघुकथाएँ पढ़ी गईं एवं पढ़ी गई लघुकथाओं पर तात्कालिक रूप से लघुकथा के मर्मज्ञों द्वारा त्वरित रूप में आलोचनात्मक/समालोचनात्मक टिप्पणियाँ प्रस्तुत की गई। प्रथम सत्र में लघुकथा पढ़ने वाले लघुकथाकार राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’, जगदीश बत्रा, राजेन्द्र कृष श्रीवास्तव, सुकेश साहनी, जगवीर सिंह वर्मा, डॉ.  स्वर्ण किरण, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ :रामयतन प्रसाद यादव, डॉ. सतीश पुष्करणा एवं डॉ. शंकर पुणताम्बेकर के नाम हैं।

            उपर्युक्त लघुकथाकारेां की लघुकथाओं की त्वरित रूप में की जाने वाली टिप्पणियों में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं जो लघुकथा की संरचना विषयक नए सोपान प्रस्तुत करने वाली  है। इस अवसर पर समीक्षक के बतौर डॉ.  स्वर्ण किरण ने कहा कि, ‘‘लघुकथा की मूल सम्वेदना विभिन्न क्षेत्रों से ली जा रही है। राजनीति का प्रभाव समाज के ऊपर पड़ता है। धर्म और अन्य क्षेत्र भी ऐसे हैं जहाँ से लघुकथाकार प्रेरणा प्राप्त करते है।’’ डॉ.  अशोक भाटिया द्वारा समीक्षक के रूप में एक जरूरी विचार यह रखा गया है – ‘‘रचना लिखने से पहले रचना की तैयारी बहुत जरूरी है। वह तैयारी सड़क पर घूमकर किसी घटना को देखने वाली तैयारी नहीं होती है, यह तैयारी आपके भीतर जो अन्तद्र्वन्द्व चल रहे है, जो वैचारिक विश्लेषण चल रहा है, उसकी तैयारी है।’’ समीक्षक मनोहर सुगम का यह कथ्य महत्वपूर्ण है – ‘‘रचना रचने के पहले भावुकता और वास्तविकता दोनों को ही समग्र मानकर चलना चाहिए।’’

            द्वितीय सत्र में लघुकथाकार गम्भीरसिंह पालनी, डॉ.  महाश्वेता चतुर्वेदी, कुलदीप जैन, विनोद कापड़ी ‘शान्त’, कन्हैयालाल विद्यार्थी, एस. कालरा, रमेश गौतम, बलराम अग्रवाल, जगदीश कश्यप, अशोक भाटिया ने अपनी-अपनी लघुकथाएँ पढ़ीं। विमर्श सत्र में इन पढ़ी गई लघुकथाओं पर विभिन्न आलोचकों द्वारा त्वरित रूप में टिप्पणियाँ की गईं। डॉ.  स्वर्ण किरण ने अपनी समीक्षात्मक दृष्टि रखने से पूर्व पश्चिम के विचारक टाल्सटाय के कला पर प्रेषित विचार रखते हुए उनकी कही तीन बातों की चर्चा की है; (1) सरलता, (2) विचित्रता और (3) सम्प्रेषणीयता।’’ लघुकथा को कालखण्ड मानते हुए लघुकथा के मूल्यांकन के लिए इन तीन बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।’’ डॉ.  बलराम अग्रवाल का यह कथन कि, ‘‘लघुकथा में भाषा को अलंकृत करने की कोशिश उसकी गति में अपेक्षाकृत शिथिलता ही लाती है। लघुकथा लेखक के लिए ज्यादा जरूरी है, शब्द की शक्ति, उसके वजन को जानना, बल्कि यथानुसार उसे आयाम भी देना।’’ इस अवसर पर डॉ.  सतीशराज पुष्करणा की महत्वपूर्ण बात यह रही कि, ‘‘सातवें दशक में लघुकथा को यदि पुनर्जीवन मिला, तो आठवें दशक में उसकी अपनी एक पहचान बनीं और नवें दशक में आकर उसका परिवार हुआ और नवीन कथ्यों के साथ-साथ उसके शिल्प विधान में भी परिवर्तन हुए। लघुकथा व्यंग्य की अनिवार्यता को तजकर संवेदनात्मक तथा मनौवैज्ञानिक रूप धारण करके कला के क्षेत्र में विस्तार पाने लगी।’’

            लघुकथा पर हुए उक्त विभिन्न विमर्श लघुकथा की रचना-प्रक्रिया, के विषय में मार्गदर्शन कराते हुए लघुकथा लेखन विषयक महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक बातें, लघुकथा के युक्तियुक्त कलेवर आदि के विशिष्ट परिशिष्ट खोलता है।

            बरेली गोष्ठी में रखा गया तृतीय सत्र उपस्थित लघुकथाकारेां द्वारा लघुकथा-पाठ का महत्वपूर्ण सत्र रहा है।

            बरेली गोष्ठी पर केन्द्रित पुस्तक ‘आयोजन’ लघुकथा पर आयोजित सेमीनार की एक बृहत शाब्दिक रिपोर्ट की तरह है। यह पुस्तक लघुकथा लेखन की तहजीब अथवा शिष्टता का भान कराने वाली, नई पीढ़ी के लिए लघुकथा-लेखन की प्राविधिक शर्तों का ज्ञान कराने वाली, और लघुकथा की समीक्षा बिन्दुओं से पहचान कराने वाली, अग्रणी पुस्तक है। साथ ही यह पुस्तक सर्वोपरी रूप में लघुकथा पर आयोजित होने वाले सेमीनारों को दिशा देने वाली सचेतक भी है कि जब कभी  जहाँ भी लघुकथा पर सेमीनार हो उनकी जिल्दबंद शाब्दिक ‘रपट’ जरूर प्रकाशित होनी चाहिए। ताकि लघुकथा-इतिहास के पास ‘सनद’ बनी रहे।

            अंत में, निष्कर्ष रूप में बरेली गोष्ठी में सम्पन्न हुए ‘लघुकथा विमर्श’ कार्यक्रम का संग्रह रूप में ‘आयोजन’ पुस्तक का द्वितीय संस्करण आना न केवल पुस्तक के महत्व को बढ़ाता है अपितु प्रस्तुत पुस्तक का लाभ नये पाठक/लघुकथाकार उठायेंगे, इसी आशा में सम्पादक द्वय सुकेश साहनी तथा रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ पुनश्चः दोनों ही बधाई के पात्र हैं।

-0-डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ,शशीपुष्प, 74 जे/ए स्कीम नं. 71,इन्दौर, मोबाइल 9329581414

Email – dubeypurushottam24@gmail.com

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine