बहुत समय से लगातार तेज गति से चल रही ट्रेन शाम चार-पाँच बजे के आसपास एक छोटे से स्टेशन पर देर तक रुक गई तो यात्रियों ने राहत सी महसूस की। हमारे कोच के कुछ यात्री तो खिड़की-दरवाजों से बाहर झाँकने लगे तो कुछ बाहर खड़े होकर धूम्रपान, तंबाकू, मोबाइल फोन, पानी भरने आदि में व्यस्त हो गए। बाहर घने बादल छाए हुए थे और आसपास ढेर सारे हरे-भरे पेड़ होने के कारण मौसम बड़ा सुहावना प्रतीत हो रहा था। ‘तू समझती क्या है अपने आपको?’ अचानक हमारी तरफ आती जोरदार-गरजदार आवाज सुनाई दी तो सब चौंककर उस दिशा में देखने लगे, एक छोटी सी बंद छतरी हाथ में लिए एक आदमी साथ चल रही एक औरत (जो कि उसकी पत्नी थी) को बुरी तरह डाँटता-फटकारता ट्रेन की दिशा में चला आ रहा था, ‘पहले तेरे भाई ने मेरा मजाक उड़ाया तब तूने उसका साथ दिया। अभी परसों तेरी भाभी ने मेरी इंसल्ट की, तब भी तू चुप रही। ध्यान रखना, मैं उनकी भी अक्ल ठिकाने लगा दूँगा और तेरी भी…’ उसका गुस्सा इतना बढ़ता जा रहा था लगा जैसे कुछ देर में औरत को पीटने लगेगा। औरत जार-जार रोती हुई तेज कदमों से पति के साथ-साथ चलती जा रही थी।
जैसे स्वादिष्ट पकवान खाते हुए मुँह में कोई कंकड़ आ गया हो, गरजती-बरसती वह आवाज सुनकर और ऐसा माहौल देखकर इतने खूबसूरत मौसम में भी हम देखने वालों के मुँह कड़वे हो आए। तभी जोरदार बारिश चालू हो गई। बाहर खड़े यात्री अचकचाकर कोच के अंदर आने लगे। कोच के खिड़की-दरवाजों के काँच गिराए जाने लगे। उसी समय बाहर का दृश्य देखकर हमारे हालिया तल्खी से भरे चेहरे सामान्य हो गए, होठों पर मुस्कान आ गई।
सब उँगली उठाकर एक-दूजे को बाहर का दृश्य दिखाने लगे।
हमने देखा कि बारिश चालू होते ही लड़ते-झगड़ते, औरत को मारने पर उतारू, उस आदमी ने छतरी खोलकर औरत के सिर पर तान दी थी और खुद पूरी तरह भीगता हुआ उसके साथ-साथ चल रहा था। हालाँकि उसका डाँटना-फटकारना एवं औरत का रोना-धोना अब भी जारी था,लगातार …।
-0-