विल्कुल वैसा ही आसमानी रंग,वैसा ही डिजाइन और वैसी वुनाई देखकर उनको धक्का लगा। मन की चोट से आँखें भर आईं और वह मन-ही-मन कहने लगीं, “अगर नहीं पहनना था तो इतनी मेहनत करवाने की क्या जरूरत थी? वारें तो बहुत बड़ी-बड़ी करके गया था।” बेटे की कही वात उन्हें याद आई, “माँ इस वार मुझ आसमानी रंग का स्वेटर बुनकर देना। तुम्हारे हाथ से जो सफाई और फिटिंग आती है, वह तो रेडीमेड स्वेटर में भी नहीं, कहकर वह उनसे लिपट गया था। यह सोचते ही उनके चेहरे पर मुस्कान की एक महीन-सी किरण चमकी और अगले ही पल उदासी में विलीन हो गई।
ड्राइवर अपनी धुन में कार चला रहा था। साहब ने सुबह ही कह दिया था कि हर हाल में पाँच बज तक माँ को लेकर आ जाना। उन्होंने एक नज़र ड्राइवर की ओर डाली। मन हुआ पूछे- यह स्वेटर तुम्हें किसने दिया, ‘लेकिन अगले ही पल स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर खोजने हुए उन्होंन खुद से कहा, ‘और किसने दिया होगा, वहीं बड़े घर से आईं हुई महारानी ने कहा होगा देने को और हमारा सपूत तो है ही बीवी का गुलाम, विना सोचे-समझे दे दिया होगा। एक गहरी साँस लेकर उन्होंने खुद से कहा, ‘बीवी के आने के बाद माँ की क॒द्र तो वैसे भी कम हो जाती है। माँ तो बस बोझ लगती है।
अगर पहले पता होता, तो में कभी बरेली नहीं आती।’ इससे पहले यह सोचकर उनकी आंखें छलछलातीं ड्राइवर ने कार बंगले के आगे रोक दी। उन्होंने खुद को सँमाल लिया। बंगले का दरवाजा खुला और आठ वर्षीय पौत्र अपनी दादी से लिपट गया। अब तक वे भी कार से वाहर आ चुकी थीं। बच्चे का हाथ पकड़कर वे बंगले में आ गईं।
ड्राइंग रूम में पहुँचते ही बहू ने उनके पैर छुए। फीकी-सी मुस्कान के साथ औपचारिक रूप से ‘खुश रहो’ कहकर वे वहीं सोर्फ पर बैठने लगीं कि बहू ने उनके कमरे में जाने का निवेदन किया। वे उदास मन और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चल दीं। कमरे में पलंग पर बैठी ही थीं कि वह चाय- नाश्ता लेकर आ गई। मन तो नहीं था लेकिन चाय की तलब के कारण मना नहीं कर सकी और चुपचाप चाय का प्याला लेकर चुस्कियाँ लेने लगीं। बहू अपने काम में लग गई। उनके मन में अभी तक आसमानी रंग का वह स्वेटर घूम रहा था जो ड्राइवर ने पहना हुआ था। उन्होंने अपने बेटे से यह वात पूछने की ठानी कि जब उसे स्वेटर पहनना नहीं था तो क्यों उसने दिखावे के लिए उनसे स्वेटर वुनने को कहा। मन में विचार उठने लगे, ‘ड्राइवर के लिए तो वाजार से लाकर भी दिया जा सकता था। क्या माँ क॑ प्रति प्यार बस दिखावा था। उस स्वेटर को बुनने में कितनी परेशानी हुईं में ही जानती हैं। एक तो अब शरीर साथ नहीं देता, ऊपर से बेटे की पसंद के आसमानी रंग की ऊन मिलनी मुश्किल थी। फिर भी कैसे-न-कैसे वाजार जाकर उसकी पसंद के आसमानी रंग की ऊन खरीदकर लाई। फिर उसे बुनने में कितना समय लगा। रात को जब तक नींद नहीं आती, वह स्वेटर बुनती रहती थी। पर उसका मोल क्या मिला? इतने मन से व॒ना स्वेटर उसने ड्राइवर को दे दिया। विना यह सोचे कि जब माँ देखेगी तो उसके दिल पर क्या वीतेगी? पर माँ की परवाह किसे है। आज के समय में?’एक बार फिर हृदय पर चोट लगी। भर आई आँखों और नाक से बहते पानी को धोती के पल्लू से पोंछा। टी.वी पर चल रहे कार्यक्रम में उनका मन नहीं लग रहा था। टी.वी की आवाज कम करके उन्होंने सिर पलंग के सिरहाने लगाकर आँखें वंद कर लीं। वाहर आहट होते ही उन्होंन झट से आँखें खोल दीं। बाहर से आती आवाजों से उन्हें आभास हुआ कि बेटा ऑफिस से आ गया। वह जानती थीं कि बेटा सीधे उनके कमरे में ही आएगा, इसलिए वह ठीक से बैठ गई और टीवी पर आँखें गड़ा दीं। उनका अनुमान सही था, बेटा तुरंत उनके कमरे में आया और पैर छूकर उनके पास बैठ गया। मन तो नहीं कर रहा था कि बेटे से वात करें; लेकिन जैसे ही बेटे के कपड़ों पर नजर पड़ी, बह चौंक गईं, ‘‘अरे, आसमानी स्वेटर तो इसने भी पहन रखा है। फिर ड्राइवर ने… होंठों पर भरपूर मुस्कान बिखर गई। चेहरा ऐसे चमक उठा जैसे बादलों के पीछे से सूरज निकलते ही पूरा वातावरण चमकने लगता है। एकाएक उनके मुँह से निकल गया, “अरे! यह तो वही स्वेटर है।”
हाँ माँ, यह वहीं स्वेटर है जो तुमने बुनकर भेजा था। और पता है माँ…. बेटे ने चहक कर कहा, “तुम्हारा यह स्वेटर और इसका दिजाइन इतना पापुलर हो गया कि कॉलोनी के कई लोगों ने तो बनाया ही, मेरे ड्राइवर ने भी अपनी माँ से बनवा लिया,” कहकर उसने जोर का ठहाका लगाया। उसकी हँसी में उनका स्वर भी शामिल था।
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