हालिया वर्षों में नई पीढ़ी के लघुकथाकारों के सर्जन की प्रगति बेहद उत्साहित करने वाली रही है। फुटकर लघुकथाओं के साथ अविराम साहित्यिकी के ‘लघुकथा: अगली पीढ़ी’ स्तम्भ, ‘नई सदी की धमक’ संकलन तथा कुछ विशिष्ट आलेखों के लिए समालोचना कर्म के निर्वाह हेतु नई पीढ़ी की अनेक लघुकथाओं से गुजरते हुए मैंने देखा है कि नई पीढ़ी के कई लघुकथाकारों ने अपने लघुकथा-सृजन को परिपक्वता के स्तर तक पहुँचाने के लिए काफी समर्पण भाव से परिश्रम किया है। बड़ी बात यह है कि ये लघुकथाकार सर्जन के साथ लघुकथा के उत्थान और निरंतरता के लिए क्रमशः लघुकथा के सभी सोपानों पर आगे बढ़ रहे हैं। लघुकथा सम्बंधी गतिविधियों में सक्रियता के साथ समीक्षा-समालोचना और सम्पादन के क्षेत्र में भी इस पीढ़ी ने अपनी प्रतिभा के उदाहरण प्रस्तुत करना आरम्भ कर दिया है।
लघुकथा सर्जन और संपादन का ऐसा ही एक उदाहरण लघुकथा संकलन ‘आस-पास से गुजरते हुए’ के रूप में सामने आया है। इसमें नई पीढ़ी के 124 लघुकथाकारों की एक-एक लघुकथा के साथ इसके सम्पादन का जिम्मा भी इसी पीढ़ी की दो उत्साही लघुकथाकारों-ज्योत्स्ना कपिल एवं उपमा शर्मा ने उठाया है। यद्यपि समग्रतः चयनित लघुकथाओं और संपादन-दोनों के स्तर पर परिपक्वता को लेकर गुंजाइश होने से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन कई बेहतरीन लघुकथाओं की प्रस्तुति और अल्पानुभव के सापेक्ष साहस और समर्पण के लिए ज्योत्स्ना एवं उपमा, दोनों अच्छे अंको की हकदार हैं। कई अच्छी लघुकथाएँ संकलन में हैं, तो कई रचनाकारों को प्रोत्साहन की दृष्टि से साथ लेने, जिसे मैं सकारात्मक संपादकीय नीति का हिस्सा मानता हूँ, का निर्वाह संकलन में किया गया है।
संकलन की अधिसंख्यक लघुकथाएँ अपना प्रभाव छोड़ने में समर्थ हैं। इनमें विषय-विविधता के साथ मनुष्य को प्रभावित करने वाले उसके परिवेश के यथार्थ चित्र देखने को मिलते हैं। कई लघुकथाओं में मानवीय समस्याओं (छँटता कोहरा / कुणाल शर्मा, ब्रह्मराक्षस / डॉ। संध्या तिवारी आदि) और संवेदनाओं (सयाना होने के दौरान / दीपक मशाल, नारियल / गीता सिंह, उमड़ते आँसू / नयना (आरती) कानिटकर, फर्ज / नरेन्द्र सिंह ‘आरव’ आदि) की गहन प्रस्तुति है। कुछ लघुकथाएँ (शयनेषु रम्भा / डॉ। कुमार सम्भव जोशी, एटीएम कार्ड / प्रमोद जैन, सुलगते आँसू / महिमा श्रीवास्तव वर्मा आदि) नई सदी में मानवीय जीवन में आ रहे बदलावों के प्रतिबिम्बों को समेटे हुए है। कुछ ऐसी संकल्पनाएँ, जो मनुष्य और उसके समाज की बेहतरी का चित्र प्रस्तुत करती हैं, भी संकलन की लघुकथाओं (धारा के विरुद्ध / सुनील वर्मा, कदम / शोभा रस्तोगी, दृष्टिकोण / मधु जैन, हिस्सा / किरण पांचाल, दृढ़ निश्चय / कमल नारायण मेहरोत्रा, संतुलन / डॉ। संगीता गाँधी आदि) में देखी जा सकती हैं। मानवीय विकृतियों को उकेरती कुछ लघुकथाएँ (पेट / योगराज प्रभाकर, हिजड़ा / उपमा शर्मा, कब तक? / ज्योत्स्ना कपिल, राखी / नमिता दुबे आदि) भी ध्यान खींचती हैं। शिल्प के स्तर पर मुन्नू लाल की ‘पात्रों का विद्रोह’ भी अच्छी लघुकथा है।
वर्तमान के आँचल से सिर निकालती संभावना भविष्य की बुनियाद होती है। लघुकथा का सुनहरा भविष्य उसकी अगली पीढ़ी की आकांक्षाओं और समर्पण में निहित है, यह अब किसी से छुपा नहीं है। नई पीढ़ी की लघुकथाओं का यह प्रतिनिधि संकलन भी इसी की गवाही देता है। प्रूफ थोड़ा और अच्छे से देखा जाना चाहिए था। प्रकाशकों को ऐसे संकलनों में लेखकों के संपर्क और फोटो देने की परिपाटी भी आरम्भ करना चाहिए. एक बात और नए लघुकथाकार सम्पादन के क्षेत्र में काम करने के लिए भी कमर कस चुके हैं, अच्छी बात है, किन्तु वे इस तथ्य पर भी विचार करें कि सर्जन की तरह संपादन के लिए भी अध्ययन-मनन तथा संपादन-कर्म के निर्वहन में कुछ अधिकारों के निडर उपयोग की भी आवश्यकता होती है।
आस-पास से गुजरते हुए: लघुकथा संकलन। संपादन: ज्योत्स्ना कपिल एवं उपमा शर्मा। प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1 / 20, महरौली, नई दिल्ली-30. मूल्य: रु 280 / – संस्करण: 2018. पृष्ठ: 136.
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