समस्या वही पुरानी थी, विधवा माँ की जिंदगी दो बेटों के बीच बाँटी जा रही थी। पंद्रह-पंद्रह दिन तो ठीक थे पर इकतीसवें दिन का खर्चा कौन वहन करेगा। दोनों भाई माथापच्ची कर रहे थे, ताकि समाधान भी निकल आए और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बनी रहे।दोनो में कोई भी इतना कम सामर्थ्यवान भी नहीं था कि एक अतिरिक्त दिन माँ को खिला न सके फिर भी दोनो भाइयों में छुपी ईर्ष्या थी कि दूसरे का खर्च उससे कम न हो जाए। बड़े का सुझाव था कि इकतीस तारीख में माँ कहीं भी रहे खर्च दोनों भाई आधा-आधा बाँट लेंगे पर छोटा सहमत नहीं था। वह बड़े की चालाकियों से वाकिफ था। वह जानता था हर इकतीस तारीख को माँ उसके जिम्मे कर दी जाएगी पर खर्च देने में बड़ा किचकिच करेगा। आखिर छोटे ने ही समाधान सुझाया-दीदी के पास?..आखिर बेटी की भी तो कुछ जिम्मेदारी होती है,उसे भरपूर दहेज दिया गया है, तीज-त्योहार भर-भर झोली दिया जाता है..महीने में एक दिन माँ को नहीं रख सकती?..फिर वह रहती भी तो इसी शहर में है कहीं बाहर भी नहीं जाना।…झटपट बहन को फोन मिलाया गया। बहनोई भले आदमी थे उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए इतना ही कहा-‘हम लोगों को कोई परेशानी नहीं एक दिन रहें या एक महीना, पर माँ जी से भी पूछ लीजिए, इस उम्र में उन्हें अच्छा लगेगा बेटी के घर रहना, बहुत पुराने विचारों की हैं वे?”
-“इसमे माँ से क्या पूछना?”-दोनो भाइयों ने समवेत स्वर में कहा-‘उन्हें कोई जंगल या वृद्धाश्रम तो भेज नहीं रहे। बेटी के घर ही तो भेज रहे हैं,वह भी केवल इकतीस तारीख के दिन यानी साल में केवल सात दिन।’..दुनिया-दिखावे के लिए सर्वसम्मत-सम्मानजनक हल निकल आया, दोनों ने चैन की साँस ली। माँ से कुछ पूछा नहीं गया बस उन्हें बतला दिया गया। माँ की शंटिंग शुरू हो गई। उनका एक बैग हमेशा तैयार रहता।हर पन्द्रहवें दिन एक स्थान से दूसरे स्थान पर ठेल दी जातीं। माँ की मुस्कान गायब हो गई, वे हमेशा गुमसुम बनी रहती, पर हाँ, जब इकतीस तारीख होती, तो चेहरा थोड़ा खिल जाता जिसे देखकर दोनों ही बेटे-बहू कुढ़ जाते। ये सिलसिला दो महीने ही चल पाया। तीसरे महीने इकतीस तारीख की सुबह- सुबह छोटा बेटा माँ को दीदी के घर छोड़ कर आया पर एक घण्टे बाद अचानक ही माँ के सीने में दर्द हुआ एक हिचकी आई और प्राण-पखेरू उड़ गए। रोना-पीटना मच गया। शाम तक माँ के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ कर ली गईं। सब लोगों के साथ दोनों भाई भी शोक-मुद्रा में मुँह लटकाए खड़े थे। अंतिम यात्रा हेतु अर्थी तैयार थी…दोनों भाई माँ को कंधा देने के लिए झुके अचानक एक कड़कती आवाज हवा में गूँजी-‘रुको’….सब चौंक गए। कंधा देने के लिए अर्थी की ओर झुकते भाई अचानक खड़े होकर आवाज की ओर मुड़े…बहन चंडी बनी खड़ी थी। उसके नेत्रों से चिंगारियां निकल रही थीं । स्वर में तीखापन था-“खबरदार!जो किसी भी भाई ने माँ की अर्थी को हाथ लगाया…आज इकतीसवाँ दिन है आज माँ हमारे हिस्से में है, उसकी सारी जिम्मेदारियों से तुम लोग आज मुक्त हो। “..इतना कहते हुए उसने आगे झुक कर माँ की अर्थी अपने कंधे पर लेने का प्रयास किया और बुलंद स्वर में बोली-राम नाम..पीछे स्वर गूँजे. .. सत्य है..शव यात्रा शुरू हो गई। माँ की अर्थी में एक कंधा बेटी का भी था। दोनो भाई लुटे-पिटे से भीड़ के साथ पीछे-पीछे चलने लगे।
-0-