ओय ! गुनगुन ” अंदर जा मेरे दोस्त आने वाले हैं ” भाई ने डपटकर बहन से कहा

क्यूंय्य्य्य्यूं , मैं कोई देखमुई हूँ क्या ?
देखमुई क्या होता है ?
जैसे छुईमुई वैसे देखमुई जो देखते ही मर जाए
अभी बहस मत कर तू जितना बोला है उतना कर।
दोस्तों ने खूब गपशप की। गुनगुन ने भाई को उसकी क्लास में पढ़ने वाली लड़की के बारे में कहते हुए सुना।
” यार! मानवी भी क्या धाँसू लड़की है। देखना तुम सब एक दिन मैं ही लेकर भागूँगा उसको “
दो दिन बाद…
दादा अंदर चले जाओ आप , मेरी सहेलियाँ आने वाली हैं ।
“ओ! ओ! मैडम विक्टोरिया मैं तुम्हारी तरह कोई लड़की नहीं हूँ, जो डर के मारे अंदर छिपकर बैठ जाऊँ.अभी तो मैं यहीं रहूँगा , जब मेरा दिल करेगा तब बेशक चला जाऊँगा”
सहेलियों को मस्ती करते देख भाई भीतर चला गया । गुनगुन अपनी सहेलियों से कह रही थी- ” सौरभ कितना कूल डूड है न देखना, उसको लेकर एक दिन मैं ही भागूँगी।”
यह बात भाई के कानों तक पहुँचाने के लिए वह और जोर जोर से बोलने लगी ।
सहेलियों के जाते ही भाई ने गुनगुन को गले लगाते हुए बहुत प्यार से कहा- ” सुन ! वो सौरभ वाली बात, क्या कह रही थी तू। तू ऐसा कुछ नहीं करेगी न ? प्रॉमिस कर मुझसे । हाँ और मैं भी तुझसे प्रॉमिस करता हूँ , कभी किसी के लिए न ही ऐसा सोचू़ंगा और न ही बोलूँगा ।
-0-अंजु त्रिपाठी, शिक्षा:- पी एच डी मनोविज्ञान, यूजीसी नेट(हिंदी), संप्रति:- लेक्चरर(दिल्ली गवर्नमेंट)
काव्य संग्रह :- ख़्वाहिशों के रंग
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