जी.टी. रोड पर बने उस ढाबे वाले को उसने चाय का आर्डर दिया। सर्द रात थी और ड्राइविंग करते हुए कुछ थकान भी हो गई थी। नींद भगाने और कुछ देर आराम करने के लिए यह ढाबा बढ़िया जगह थी।
कुछ ही देर में काँच के मैले से गिलास में एक लड़का चाय रख गया। थोड़ी ही देर बाद फिर वही लड़का उससे पूछने आया, ‘‘कुछ और लेंगे साब!’’
उसने मना कर दिया। लेकिन तभी गौर से उस लड़के को देखा था। उम्र लगभग दस साल, देखने में हष्ट-पुष्ट, लेकिन मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए। सर्द रात में भी उसने सिर्फ निक्कर और कमीज़ पहनी हुई थी। और हाँ, बार-बार वह झुककर अपनी दाहिनी टाँग खुजा जा रह था। उसने गौर से लड़के की टाँग की तरफ देखा तो पाया, वहाँ एक बड़ा सा जख्म था, जिसमें मवाद पैदा हो गया था। न जाने क्यों, एक दम उसे खयाल आया कि इस जख्म की वजह से लड़के की टाँग भी काटनी पड़ सकती है। उसने लड़के से इलाज के बारे में पूछा। लड़के ने बताया कि बीच-बीच में एकाध बार दवाई लगाई थी। उसने तुरन्त अपनी गाड़ी से फस्ट-एड बॉक्स निकालकर लड़के की टाँग पर पट्टी की और जाते-जाते ढाबा मालिक को खूब डाँट-फटकार कर लगातार इलाज़ करवाने के लिए कह दिया। ढाबा मालिक उस आदमी को अच्छी तरह जानता था। वह एक अफसर था, जो अकसर रात को इस ढाबे से चाय पीता था। दबंग इतना था कि न तो ड्राइवर रखता था और न अंगरक्षक। बस मन आया ,तो अपनी कार लेकर निकल पड़ता। सो ढाबा मालिक ने अगले ही दिन नियमित रूप से अपने उस नौकर की टाँग का इलाज करवाना आरम्भ कर दिया। अगली बार उस अफसर ने भी जब यह देखा तो खुश हुआ।
महीना खत्म होने पर जब लड़के ने ढाबा मालिन से वेतन माँगा, तो मालिक को खूब गुस्सा आया, बोला, ‘‘एक तो अपनी मवाद भरी टाँग दिखा-दिखा कर हमारे ग्राहक खराब किए, उस पर दवाई का खर्च! फिर तनख्वाह भी माँगते हो?’’अहसानफरामोश कहीं के! ‘‘तुम्हारे वेतन जितना खर्च तो तुम्हारे इलाज पर हो चुका।’’
लड़के को अफसोस हुआ कि उसने अफसर को अपनी घायल टाँग क्यों दिखाई!
अफसर खुश था कि एक गरीब बच्चे का इलाज उसकी वजह से हो पाया।
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