“इतनी रात गए मुझे इस वृद्धाश्रम में बुलाया, सब ठीक तो है न सुदेश बाबू ?”
“क्षमा चाहता हूँ वकील साहब ! आपसे एक बहुत आवश्यक काम था जो आपको अचानक बुलाना पड़ा।”
“वो सब तो ठीक है, लेकिन आप सपत्नीक यहाँ वृद्धाश्रम में क्या कर रहें हैं ?”
“वो सब बाद में बताऊँगा। दरसल आपको इसलिए तकलीफ दी है कि मुझे अपनी वसीयत बदलनी है।”
“मैं मैं समझा नहीं ! बदलनी है मतलब? आपका एक ही तो उत्तराधिकारी है मनोज, आपका एकलौता बेटा I”
“हाँ ,वकील साहब सच कहा आपने I लेकिन मैं सोच रहा हूँ कि अगर उत्तराधिकारी होने के बावजूद भी अगर माता पिता बोझ लगने लगें, तो ऐसा उत्तराधिकारी मेरी इतनी बड़ी संपत्ति का बोझ कैसे उठा पायेगा ?”
-0-श्री. द्वारकाधीश मन्दिर, चौक बाज़ार, भोपाल -462001
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